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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०९

तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०९
[तब तक उसको मनुष्य ही कहा जाता है] इसी प्रकार जब
तक यह प्रारब्ध देह बना हुआ है, तब तक चिदाभासता बनी
ही रहेगी [प्रारब्ध कर्मों के नष्ट होने तक उसे चिदाभास ही
कहना पड़ेगा ।]
रज्जुज्ञानेऽपि कम्पादिः शनैरेवोपशाम्यति ।
पुनर्मन्दान्धकारे सा रज्जुः क्षिप्तोरगी भवेत् ॥२४४॥
रज्जु का ज्ञान हो जाने पर भी जैसे भय या कम्प आदि
धीरे धीरे ही शान्त होते हैं, सहसा नहीं। जब तो मन्द अँधेरे
में उस रज्जु को फिर फेंक दिया जाता है तब वह फिर सांप सी
दीखने लगती है ।
एवमारब्धभोगोऽपि शनैः शाम्यति नो हठात् ।
भोगकाले कदाचित्तु मर्त्योहमिति भासते ॥२४५॥
इसी प्रकार अज्ञान चाहे निवृत्त भी हो चुका हो, परन्तु
प्रारब्ध भोग तो धीरे धीरे ही शान्त हुआ करता है । वह हठ
करने से सहसा शान्त नहीं हो जाता । कभी कभी तो भोग-
काल में उसे यह भी विपरीत भास हो ही जाया करता है कि
'मैं मर्त्य हूँ—।' [उसका यह भास ज्ञान होते ही नष्ट नहीं
होता, यह भी धीरे धीरे, ही मिटा करता है ।]
नैतावतापराधेन तत्वज्ञानं विनश्यति ।
जीवन्मुक्तिव्रतं नेदं किन्तु वस्तुस्थितिः खलु ॥२४६॥
['मैं मर्त्य हूँ' ऐसा भान हो जाना यद्यपि ज्ञानी का अपराध
समझा जाना चाहिये परन्तु] इतने छोटे से अपराध से तत्व-
ज्ञान का नाश नहीं हो जाता है । क्योंकि—यह अपनी मनुष्य
बुद्धि को हटा देना रूपी जीवन्मुक्ति नाम का कोई व्रत

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नियम से करने योग्य काम] नहीं है, जो साधकों को परवश
करना पड़ता हो। किन्तु यह तो वस्तुस्थिति ही है कि तत्वज्ञान
से भ्रान्तिज्ञान भाग जाता है।
तत्वज्ञान का अभ्यास करते करते साधक ने जिन विपरीत
भावनाओं को मार भगाया है, वे कभी कभी इस देहादि समु-
दाय पर, फिर अधिकार पाने का उद्योग करेंगी ही। वे यदि
कभी कभी लौट कर आ जाती हैं तो आया करें। उनको फिर
फिर मार भगाना चाहिये। इन भावनाओं को भगाने में कुछ
समय भी लगता होता है और प्राणियों के स्वभावानुसार
इसका भिन्न-भिन्न क्रम भी होता है।
दशमोऽपि शिरस्ताडं रुदन् बुद्ध्वा न रोदिति ।
शिरोव्रणस्तु मासेन शनैः शाम्यति नो तदा ॥२४७॥
जो दसवां अब तक सिर पीट पीट कर रो रहा था, वही
दसवां, ज्ञान हो जाने पर रोना तो तुरन्त रोक देता है, परन्तु
सिर पीटने से उसके सिर में जो घाव हो गया था, वह तो
कहीं महीनों में जाकर अच्छा हो पाता है। वह तुरन्त अच्छा
नहीं होता ।
दशमामृतिलाभेन जातो हर्षो व्रणव्यथाम् ।
तिborder धत्ते, मुक्तिलाभस्तथा प्रारब्धदुःखिताम् ॥२४८॥
दसवें के न मरने के लाभ को सुनकर जो हर्ष होता है
वह हर्ष घाव की पीडा को भुला देता है। ठीक इसी प्रकार
जीवन्मुक्ति भी प्रारब्धदुःखों को ढक लेती है [ जीवन्मुक्ति
मिलने पर जो हर्ष होता है, उसके सामने, प्रारब्धदुःखों की
कुछ गिनती ही नहीं रह जाती। ऐसी अवस्था में ज्ञान हो जाने