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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९३

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ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९३
प्रतिवादी को नरक मिलता है तथा अनेक योनियों में दोष देखने
पड़ते हैं [उसे अनेक तिर्यगादि जन्मों में कभी इष्ट का वियोग
होगा और कभी अनिष्ट की प्राप्ति होगी। यही शाप ज्ञानी लोग
दिया करते हैं। उनके 'प्रियं त्वां रोत्स्यति' कहने का यही अभिप्राय
होता है।]
ब्रह्मविद् ब्रह्मरूपत्वादीश्वर स्तेन वर्णितम् ।
यद्यत् तत्तत् तथैव स्यात् तच्छिष्यप्रतिवादिनोः ॥७०॥
[ईश्वरोह तथैव स्यात् बृ-१-४-८ इस वाक्य में कहा गया है
कि] ब्रह्मज्ञानी को अपने ब्रह्मत्व का अनुभव हो गया है। इस
से वह ईश्वर पद को पाचुका है। अब वह अपने शिष्यादि के
प्रति जो [भली या बुरी] बात कहता है, उस ज्ञानी का जो शिष्य
है, या जो प्रतिवादी है, उन दोनों को उसका कहा हुआ इष्ट
या अनिष्ट अवश्य ही प्राप्त हो जाता है। [यों ज्ञानी का कहा
हुआ एक ही वाक्य शिष्य के लिये उपदेश और वादी के लिये
शाप रूप हो जाता है]
यस्तु साक्षिणमात्मानं सेवते प्रियमुत्तमम् ।
तस्य प्रेयानसावात्मा न नश्यति कदाचन ॥७१॥
['आत्मानमेव प्रियमुपासीत, स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य
प्रियं प्रमायुकं भवति' (बृ-१-४-८) इस वाक्य में कहा गया है
कि] जो शिष्य आत्मा को ही निरतिशय प्रेम का पात्र समझ
कर सदा आत्मा की सेवा करता है [किंचा सदा आत्मस्मरण
रखने लगता है] उसका प्रिय माना हुआ यह आत्मा, वैसे कभी
भी नष्ट नहीं हो जाता, जैसे प्रतिवादी का माना हुआ प्रिय नष्ट

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४९४ पञ्चदशी
हो जाता है [ किन्तु वह तो सदानन्द रूप हो कर भासने
लगता है ]
परप्रेमास्पदत्वेन परमानन्दरूपता ।
सुखवृद्धिः प्रीतिवृद्धौ सार्वभौमादिषु श्रुता ॥७२॥
[यों यहां तक यह सिद्ध हो चुका कि] निरतिशय प्रेम का
विषय होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है । [ तैत्तिरीय और
बृहदारण्यक श्रुतियों में बताया गया है कि] चक्रवर्ती राजा से
लेकर हिरण्यगर्भपर्यन्त पदों में जहां जहां प्रीति की वृद्धि
होती है, वहां वहां सुख की भी वृद्धि होती है । यों जब प्रीति
की निरतिशयता भी समझ में आसकती है तब आनन्द की
निरतिशयता भी समझी जा सकती है । [ राजा को अपने
उपकरणों (साधनों) में प्रीति अधिक होती है तो उसे सुख भी
अधिक ही होता है ]
चैतन्यवत् सुखं चास्य स्वभावश्चेच्चिदात्मनः ।
धीवृत्तिष्वनुवर्तेत सर्वास्वपि चितिर्यथा ॥७३॥
शंका यह होती है कि—यदि चैतन्य के समान सुख या
आनन्द भी चिदात्मा का स्वभाव हो, तो जैसे सब बुद्धिवृत्तियों
में चैतन्य की अनुवृत्ति होती है वैसे सब बुद्धिवृत्तियों में
आनन्द की भी अनुवृत्ति होनी चाहिये ।
मैव मुष्णप्रकाशात्मा दीपस्तस्य प्रभा गृहे ।
व्याप्नोति नोष्णता तद्वच्चित्तेरेवानुवर्तनम् ॥७४॥
यह शंका न करनी चाहिये । दृष्टान्त में देख लो कि—
दीप के दो स्वरूप हैं एक 'उष्ण' दूसरा 'प्रकाश' । घर में जब
दीपक जलता है तब उसकी प्रभा तो घर को व्याप्त कर लेती