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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् १८३

चित्रदीपप्रकरणम् १८३
में किये बैठा है। 'सर्वेश्वर' वह है जिसने इस बाह्य जगत् पर
आधिपत्य जमा रक्खा है। वायु को बहने का, अग्नि को जलने
का, सूर्य को चक्कर काटते रहने का, मृत्यु को मारने का आदेश
जो दिया करता है वही 'सर्वेश्वर' है। वही एक तत्व शरीरों के
अन्दर रहकर उनका नियमन करके 'अन्तर्यामी' कहा जाता
है। वही एक तत्व शरीरों से बाहर सब भूत भौतिक पदार्थों का
नियमन करके 'सर्वेश्वर' कहाने लग जाता है।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासन इति श्रुतिः ।
अन्तः प्रविष्टः शास्तायं जनानामिति च श्रुतिः ॥१८१॥
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृते तिष्ठतः
(बृ. ३-८-९) इस श्रुति में ईश्वर को बाह्य नियामक किंवा
'सर्वेश्वर' कहा है। अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् इस श्रुति में
ईश्वर को अन्दर का नियामक किंवा 'अन्तर्यामी' बताया
गया है।
जगद्योनिर्भवेदेष प्रभवाप्ययकृत्वतः ।
आविर्भावतिरोभावावुत्पत्तिप्रलयौ मतौ ॥१८२॥
उत्पत्ति और विनाश दोनों ही को करने वाला होने से,
यही जगत् का योनि है। यहां उत्पत्ति और प्रलय का अभिप्राय
आविर्भाव और तिरोभाव है [यों तो उत्पत्ति और विनाश किसी
वस्तु का होता ही नहीं, केवल इतना ही होता है कि कभी वह
वस्तु प्रकट हो जाती है और कभी तिरोभूत हो जाती है।]
आविर्भावयति स्वस्मिन् विलीनं सकलं जगत् ।
प्राणिकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारितः ॥१८३॥
जैसे लपेटा हुआ चित्रपट जब फैला दिया जाता है तब

१८४ पञ्चदशी
अपने में छिपे हुए चित्रों को प्रकट कर देता है [बनाता नहीं]
इसी प्रकार यह ईश्वर अपने में विलीन हुए सम्पूर्ण जगत् को
प्राणियों के कर्मों के अनुसार, आविर्भूत कर दिया करता है।
पुनस्तिरोभावयति स्वात्मन्येवाखिलं जगत् ।
प्राणिकर्मक्षयवशात् संकोचितपटो यथा ॥१८४॥
जिस प्रकार लपेटा हुआ कपड़ा, अपने चित्रों को छिपा लेता
है, इसी प्रकार जब प्राणियों के भोगदायी कर्म क्षीण होजाते हैं
तब फिर यही ईश्वर अपने आपे में ही इस सम्पूर्ण जगत् को
छिपा बैठता है।
रात्रिद्यसौ सुप्तिबोधा वुन्मीलननिमीलने ।
तूष्णींभावमनोराज्ये इव सृष्टिलयाविमौ ॥१८५॥
ये सृष्टि तथा प्रलय तो ठीक ऐसे ही हैं जैसे कि दिन और
रात, स्वप्न तथा जागरण, उन्मेष और निमेष, चुपचाप रहना
और मनोराज्य करना होता है। [ये काम जीव के हैं तथा सृष्टि
प्रलय आदि ईश्वर के काम हैं।]
आविर्भावतिरोभावशक्तिमत्वेन हेतुना ।
आरम्भपरिणामादिचोद्यानां नात्र संभवः ॥१८६॥
आविर्भाव और तिरोभाव दोनों ही शक्तियों वाला होने के
कारण, आरम्भवाद और परिणामवाद आदि की तो संभावना
ही नहीं है। अद्वितीय पदार्थ आरम्भक नहीं हो सकता तथा
निरवयव का परिणाम होना भी सम्भव नहीं है। केवल विवर्त-
वाद ही एक निष्कण्टक मार्ग है।
अचेतनानां हेतुः स्याज्जाड्यांश नेश्वरस्तथा ।
चिदाभासांशतस्त्वेष जीवानां कारणं भवेत् ॥१८७॥