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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१३

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ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१३
विचार करें तो उन्हें मोटा और गोल रूप अलग दिखाई दे
तथा स्पर्शादिरूपी मिट्टी अलग दीखने लगे और घट नाम की
कोई वस्तु ही वहाँ न रह जाय । ]
कुलालव्यापृतेः पूर्वो यावानंशः स नो घटः ।
पश्चात्तु पृथुबुध्नादिमत्वे युक्ता हि कुम्भता ॥३४॥
[घट के व्यवहार के अविचारमूलक होने का कारण यह
है कि] कुलाल के व्यापार से पहले जो मिट्टी का भाग है,
वह तो घट है ही नहीं। कुलाल आकर जब मिट्टी पर कुछ
व्यापार कर लेता है और जब मोटे गोल आदि आकार वाली
कोई चीज़ बन जाती है तब उसे ही ‘घट’ कहना ठीक हो
जाता है ।
स घटो न मृदो भिन्नो वियोगे सत्यनीक्षणात् ।
नाप्यभिन्नः पुरा पिण्डदशायामनवेक्षणात् ॥३५॥
वह घड़ा मिट्टी से भिन्न नहीं है। क्योंकि मिट्टी से पृथक्
करके उसे देखा ही नहीं जा सकता। और न वह घड़ा मिट्टी
से अभिन्न ही होता है, क्योंकि पहले जब पिण्डदशा थी तब
तो वह दीखता ही नहीं था। [यों वह घड़ा पारमार्थिक पदार्थ
नहीं है, उसे तो अनिर्वचनीय शक्ति ने बना कर खड़ा कर
दिया है।]
अतोऽनिर्वचनीयोऽयं शक्तिवत् तेन शक्तिजः ।
अव्यक्तत्वे शक्तिरुक्ता, व्यक्तत्वे घटनामभृत् ॥३६॥
इस कारण जैसे शक्ति अनिर्वचनीय है, वैसे ही घट भी
अनिर्वचनीय है। इसी से कहते हैं कि यह ‘घट’ शक्ति से ही
उत्पन्न हुआ है। किसी को ‘शक्ति’ और किसी को ‘घट’ कहने
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५१४ • पञ्चदशी
का कारण यह है कि--जब तक अव्यक्त अवस्था रहती है,
तब तक उसे 'शक्ति' कहते हैं। जब व्यक्तावस्था आ जाती है
तब उसी का 'घट' नाम पड़ जाता है।
ऐन्द्रजालिकनिष्ठापि माया न व्यज्यते पुरा ।
पश्चाद् गन्धर्वसेनादिरूपेण व्यक्तिमाप्नुयात् ॥३७॥
ऐन्द्रजालिक में रहने वाली माया भी मणिमन्त्रादि का
प्रयोग करने से पहले पहले व्यक्त नहीं होती। पीछे से तो
गन्धर्व सेना आदि के रूप से प्रकट हो जाया करती है [इससे
यह समझ लो कि माया पहले अप्रकट रहती है और पीछे से
प्रकट हो जाती है।]
एवं मायामयत्वेन विकारस्यानृतात्मताम् ।
विकाराधारमृद्वस्तुसत्यत्वं चाब्रवीच्छ्रुतिः ॥३८॥
'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छा० ६-४-१)
इस श्रुति ने इसी सब विचार को लेकर मायामय [अर्थात् माया
का कार्य] होने से, विकार [अर्थात् कार्यों] को तो अनृत
[मिथ्या] कहा है तथा घटादि विकारों के आधार मिट्टी की ही
सत्यता का वर्णन किया है।
वाङ्निष्पाद्यं नाममात्रं विकारो,नास्य सत्यता ।
स्पर्शादिगुणयुक्ता तु सत्या केवलमृत्तिका ॥३९॥
‘वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छा०६-४-१)
इस श्रुति ने कहा है कि ये जितने कार्य दीख रहे हैं ये सब
वाणी से बोले जान वाले नाम ही नाम तो हैं। ये घटादि कार्य
सत्य नहीं हैं (नाम के सिवाय इनका पारमार्थिक रूप कुछ भी