पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextचित्रदीपप्रकरणम् १४९
[जब बाहर के पदार्थों का ज्ञान होता है, तब मन उत्पन्न
हो जाता है। जब बाहर के पदार्थों का ज्ञान नहीं होता जब केवल
अपने आपे का बोध ही रहता है तब बुद्धि का राज्य रहता
है । बुद्धि का काम आपे को जानना है मन का काम बाहर
के पदार्थों की देख भाल करना है !]
अहंप्रत्ययबीजत्व मिदंवृत्तेरिति स्फुटम् ।
अविदित्वा स्वमात्मानं बाह्यं वेत्ति न तु क्वचित् ॥७१॥
[मन और विज्ञान का कार्यकारणभाव इस श्लोक में
बताया गया है ] यह ‘इदंवृत्ति’ [ बाहर के पदार्थों की
प्रतीति ] ‘अहं प्रत्यय’ से [ मैं इस ज्ञान के अन्दर से ] उत्पन्न
हुआ करती है । जभी तो अपने आपे को पहले बिना जाने
कहीं भी कोई बाह्य पदार्थ को नहीं जानता। [तात्पर्य यह कि
पहले अहंवृत्ति [ मैं भाव ] उदय हो लेती है, तब पीछे से
इदंवृत्ति पैदा हुआ करती है। यों इन दोनों में कार्य कारण
भाव है।]
क्षणे क्षणे जन्मनाशावहंवृत्तेर्मितौ यतः ।
विज्ञानं क्षणिकं तेन, स्वप्रकाशं स्वतो मितेः ॥७२॥
इस अहंवृत्ति का जन्म और नाश क्षण क्षण में होता
रहता है । कभी यह पैदा होती है, क्षण भर बाद फिर मर
जाती है । यों अनुभव से विज्ञान (अहंवृत्ति) की क्षणिकता
सिद्ध हो जाती है । अपने से ही प्रमित होने के कारण यह
विज्ञान स्वयं प्रकाश भी है । [क्योंकि यह ज्ञान ही अपने
आपको जानता है, इसलिये यह स्वयं प्रकाश है ।]