पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
3. Pancha Kosha Viveka
[ ३ ]
पंचकोशविवेक का संक्षेप
पंचकोशविवेक नाम के तीसरे प्रकरण में बताया गया है
कि देह, देह से अन्दर प्राण, प्राण से अन्दर मन, मन से अन्दर
कर्ता [विज्ञान], कर्ता से अन्दर भोक्ता [ आनन्दमय ] बस यह
परम्परा ही तो आत्मा के छिपने की 'गुहा' कहाती है । इस
गुहा में जो ब्रह्म तत्व छिप सा गया है, उसे तो हम तभी जान
सकते हैं, जब कि पहले इन ऊपर के पांचों कोशों का विवेक कर
लें । इस लिये आइये अब नारियल के छिलकों की तरह उन
पांचों कोशों को ही छील कर फेंक दें और गुहाहित ब्रह्मतत्व के
दर्शन करें—
यों तो जैसे ये अन्न, प्राण, मन, बुद्धि और आनन्द नाम
के कोश, आत्मतत्व को ढके बैठे हैं, प्रकट नहीं होने दे रहे हैं,
ठीक उसी तरह ये उसका दर्शन कराने में साधन भी तो हैं । ये
बन्ध भी करते हैं और मोक्ष भी दिलाते हैं । नारियल का छिलका
जैसे नारियल को ढके रहता है, इसी प्रकार नारियल को पाने
की जगह भी तो वही है । जिन पंचकोशों ने आत्मतत्व पर
परदा डाला है, उस तत्व के दर्शन भी तो उन्हीं के अन्दर होते
हैं । यदि ये पंचकोश न हों, तो किसी को आत्मतत्व का ध्यान
भी नहीं आ सकता । उस ब्रह्मतत्व के दर्शन की रीति यह है
कि देह से लेकर आनन्द पर्यन्त जो भी पदार्थ दीख रहे हैं, वे
सब इस प्रकरण में कही रीति से आत्मा नहीं है । किन्तु इन सब
को देखने वाला, स्वयं कभी भी न दीखनेवाला, जो तत्व है,
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वही तो आत्मा है। आत्मा के न दीखने का यह कारण कदापि
नहीं है कि आत्मा नाम का कोई पदार्थ है ही नहीं, किन्तु उसके
न दीखने का कारण यह है कि वह तो स्वयं ही दीखनारूप है।
जैसे गुड़ को मीठा नहीं किया जा सकता, इसी प्रकार आत्मा
को भी देखा नहीं जा सकता। यों भले ही वह आत्मतत्व किसी
के अनुभव में न आता हो, परन्तु उसकी ज्ञानरूपता में तो लेश-
मात्र भी ठेस नहीं लग सकती है। जिस मूर्ख को तो सब के
जानने वाले उस ज्ञान का ही अनुभव किसी भी तरह न होता
हो, उस मिट्टी के ढेले को भला कौन समझा सकेगा ? जो मन्द
पुरुष ज्ञान को ही नहीं समझ रहा है,उसको ज्ञात [ज्ञान के विषयों ]
का अनुभव भी कैसे हो सकेगा ? “मेरे मुँह में जीभ नहीं है”
यह बात जितनी अयुक्त है, उतनी ही अयुक्त यह बात भी है
कि'मैं ज्ञान को नहीं जानता हूँ। विचार करो कि हमको कभी
घड़े का ज्ञान, कभी वस्त्र का ज्ञान और कभी रूपादि विषयों
का ज्ञान होता है, अपने योगयुक्त मन से ज्ञान के विषय इन
घड़े आदि पदार्थों की उपेक्षा [ अनादर ] कर दो, इन घटादि
सभी पदार्थों में, माला में सूत्र की तरह, जो ज्ञान या चैतन्य
शान्त भाव से अनुगत होकर विराज रहा है, उस शान्त ज्ञान
तक जब दृष्टि पहुँच जाय तब समझ लो कि यह ज्ञान ही ब्रह्म-
तत्व है। यह तत्व स्वयंप्रकाश भी है। इस सब पसारे के दीखने
से पहले यह दीखता है। जब यह आत्मा 'देखने की इच्छा'
नाम की अनुमति दे देता है, तब यह पसारा पीछे से दीखने
लगता है। बात तो यहां तक है कि यह पसारा उसके ही दीखने
से दीखता है। यह आत्मा स्वयं किसी को न दीखता हो [जैसा
कि सुषुप्ति में हो जाता है ] तो यह पसारा दीख ही नहीं सकता।
पंचकोशविवेक का संक्षेप १९
पंचकोशविवेक का संक्षेप १९
इस पसारे का दीखना सवा सोलह आने इसके दीखने के अधीन
है। यों इस सारे जगत् का साक्षी जो ज्ञानरूप आत्मा है वह
शुद्ध अवस्था में तब ही दीख सकेगा जब कि इन पांचों कोशों का
परित्याग पूर्णतया कर दिया जायगा। अर्थात् इनको आत्मा
समझना छोड़ दिया जायगा। इन सब कोशों को चमकाने वाला
जो ज्ञान नाम का प्रकाश है, वही तो हमारा अपना स्वरूप है।
अविचारपूर्ण दृष्टि के रहते रहते ही दीख पड़नेवाले देहादियों
को जब अनात्मा समझ लिया जाता है, तब विचारक के सामने
आत्मतत्व स्वयमेव आ खड़ा होता है। उस समय उसको चाहो
'तो 'कुछ नहीं' कह दो या 'आत्मा' कह दो या कुछ भी मत कहो।
आत्मतत्व का वर्णन करने में अध्यात्मशास्त्र ने 'नेति नेति' की
निराली भाषा का उपयोग इसी भाव से किया है। सम्प्रदायवाले
इस प्रकरण में एक गाथा कहा करते हैं—किसी मेले में कोई स्त्री
पुरुष बिछड़ गये थे। राज-पुरुषों ने सारे मेले को घेरकर एक द्वार
में से निकाला और द्वार पर खड़ी की हुई स्त्री से पूछते गये कि
क्या यह तुम्हारा पुरुष है? वह सब का निषेध करती गयी 'कि
यह मेरा पुरुष नहीं है।' जब तो उसका पुरुष आया, तब वह
कुछ भी न बोली किन्तु चुपचाप खड़ी रह गयी। कुछ न बोल
कर ही उसने अपने पुरुष को राजपुरुषों को बता दिया। इसी
प्रकार जितना कुछ निषेध किया जा सकता है, उस सब ही का
निषेध कर देने पर, जो तत्व शेष रह जाता है, वही तो आत्मा
है। यही 'नेति नेति' का सरल भाव भी है। यों यह तत्व सत्य
पदार्थ है यह सिद्ध हो चुका। इसकी ज्ञानरूपता भी सिद्ध की
जा चुकी। यही तत्व अनन्त भी है—औरों का तो कहना ही
क्या है, सबसे तीव्र गति वाली कल्पना को भी यदि हजारों वर्ष
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पंचदशी
देश और काल के विस्तृत मैदान में दौड़ते जांय, फिर जहां हम
पहुँच सकेंगे, वहाँ भी और उससे आगे भी यह ज्ञान रहता है।
यों इसमें देश और काल की कोई मर्यादा ही नहीं है। यह ज्ञान
सर्वरूप भी है—पदार्थों को दिखाने वाला सूर्य का प्रकाश जैसे
पदार्थों के ही आकार का हो जाता है, या जैसे पदार्थों के अन्दर
रहनेवाले पांच भूत पदार्थों के ही आकार के हो जाते हैं, इसी
प्रकार यह ज्ञान भी सब पदार्थों के रूप का हो जाता है। यह तो
सब पदार्थों का आत्मा है क्योंकि यह उनके अन्दर बैठा बैठा सब
को दिखाता रहता है। यों यह तत्व प्रत्येक पहलू से अनन्त है।
यह एक ही तत्व कभी तो 'ईश्वर' हो जाता है और कभी 'जीव'
बन जाता है। जगत् की निर्माणशक्ति जब हमारे ध्यान में आती
है तब ईश्वर रूप में यही तत्व हमें याद आता है। जब पांचभौतिक
शरीर की ओर हमारा ध्यान जाता है तब यही तत्व हमें जीव मालूम
पड़ने लगता है। तात्पर्य यह है कि जो जो उपाधियां हमें दीखती हैं
उन सभी के साथ यह तत्व अठखेलियां करता रहता है—यह उन
सभी में रमा हुआ रहता है। जब हम न तो सृष्टि को देखें और न
शरीरों का ही ध्यान करें, तब तो केवल अनन्त व्यापक चेतना का
ही अखण्ड साम्राज्य हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है। तब
योगी के अवाक् रह जाने की ऊँची से ऊँची अवस्था आती है।
ईश्वर और जीव दोनों ही तत्व अपनी अपनी उपाधि के कारण
से ही हैं। ये दोनों उपाधियुक्त चेतना हैं। जो महापुरुष इन
उपाधियुक्त चेतनाओं को छोड़कर निरुपाधि चेतना से आँख भिड़ा
देगा, जिस साधक का यह त्राटक कभी भी खण्डित नहीं होगा,
जो साधक बड़े बड़े साम्राज्यों को चलाता हुआ भी इस व्यापक
चेतना को नहीं भूलेगा, जिस महापुरुष के अन्तस्तल में यह बात
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बैठ जायगी कि इस ईश्वरभाव और जीवभाव का जन्म तभी होता
है जब हम शक्तियों और कोशों की ओर को ध्यान दे बैठते हैं,
यदि हम इन दोनों की ओर को ध्यान बँटाना ही छोड़ दें तो
फिर ब्रह्मभाव ही शेष रह जाता है। ऐसा ज्ञान पाते ही साधक
लोग पूर्ण रूप से ब्रह्म हो जाते हैं। अपनी उपाधियों को तोड़
फोड़कर अपने व्यापक रूप को कमा लेते हैं। वेदान्तसम्प्रदाय
में बताये हुए चारों साधनों से युक्त जो अधिकारी लोग उपर्युक्त
प्रकार से पांचों कोशों का विवेक करके, उस गुहाहित ब्रह्म का
साक्षात्कार कर लेते हैं तो यह बात बेझिझक कही जा सकती
है कि वे तो ब्रह्म तत्त्व ही होगये हैं। 'न जायते म्रियते वा
विपश्चित्' ऐसे ज्ञानी पुरुष का फिर मरना जीना छूट जाता है।
क्योंकि ब्रह्म का तो जन्म ही नहीं होता है। उसने तो विवेक
के द्वारा अपने अमर ब्रह्मभाव को जगा लिया है।