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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् १९१

चित्रदीपप्रकरणम् १९१
ईश [ अन्तर्यामी ] हिरण्यगर्भ, विराट्, ब्रह्मा, विष्णु, महेश,
इन्द्र, अग्नि, गणेश, मैराल, मरिका, यक्ष, राक्षस, ब्राह्मण, क्षत्रिय
वैश्य, शूद्र, गौ, घोड़ा, मृग, पक्षी, पीपल, बढ़, आम आदि वृक्ष
जौ, धान, तिनके आदि ओषधियां, जल, पाषाण मिट्टी, काठ,
यहां तक कि बिसोला और कुदाल तक ये सभी ईश्वर हैं। जब
कोई इनकी पूजा करता है तब ये [ अपनी अपनी शक्ति के
अनुसार ] उसको फल दे देते हैं ।
यथायथोपासते तं फलमीयुस्तथा तथा।
फलोत्कर्षापकर्षौ तु पूज्यपूजानुसारतः ॥२०९॥
उस ईश्वर की जैसे जैसे उपासना करते हैं, वैसे वैसे ही फल
मिल जाते हैं। [जब कि ये सभी ईश्वर हैं तब समान ही फल
मिलना चाहिये था। परन्तु] फल की जो न्यूनाधिकता होती है
वह तो पूज्यों और पूजाओं के अनुसार हो जाती है [ घट बढ़
जाती है। पूज्यों और पूजाओं के सात्विक राजस आदि होने
से भिन्न भिन्न फल मिल जाते हैं।]
मुक्तिस्तु ब्रह्मतत्वस्य ज्ञानादेव न चान्यथा।
स्वप्रबोधं विना नैव स्वस्वप्नो हीयते यथा ॥२१०॥
[ सांसारिक फलों की प्राप्ति इन छोटे मोटे ईश्वरों से हुआ
करो, परन्तु ] मुक्ति तो ब्रह्मतत्व के ज्ञान से ही होती है। इस
के अतिरिक्त मुक्ति का कोई भी अन्य मार्ग नहीं है। देखते नहीं
हो कि—अपने जागे बिना [ अपनी निद्रा ने जिस स्वप्न को बना
रखा है उस ] अपने सुपने का भंग नहीं होता है। [ इस
दृष्टान्त से यह बात समझ लेनी चाहिये कि आत्मतत्व को जाने
बिना, आत्मतत्व को न जानने से ही बना हुआ, यह अपना
संसार रूपी सुपना कदापि निवृत्त न हो सकेगा ] ।

१९२ पञ्चदशी
अद्वितीयब्रह्मतत्वे स्वप्नोऽयमखिलं जगत् ।
ईशजीवादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम् ॥२११॥
ईश्वर और जीव आदि के रूप से वर्तमान जो यह जडा-
त्मक और चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् है यह सब उस अद्वितीय
ब्रह्मतत्व में एक [बड़ा] सुपना है [क्योंकि यह सब अद्वितीय
ब्रह्मतत्व को ही तो अन्यथा समझ लिया गया है ] ।
सुपना 'सुपना' है, यथार्थ ज्ञान नहीं है यह बात जागने
से पहले मालूम नहीं पड़ सकती, जागने पर ही यह मालूम
पड़ा करता है । इसी प्रकार 'यह जगत् एक सुपना है, ऐसा
ज्ञान ब्रह्मविद्या नाम के जागरण के हो जाने पर ही हो सकता
है, पहले नहीं ।
आनन्दमयविज्ञानमया वीश्वरजीवकौ ।
मायया कल्पितावेतौ ताभ्यां सर्वं प्रकल्पितम् ॥२१२॥
आनन्दमय और विज्ञानमय जिनको ईश्वर और जीव भी
कहते हैं, दोनों ही माया के कल्पित किये हुए हैं। [इस कारण ये
ईश्वर तथा जीव यद्यपि ब्रह्म से अभिन्न हैं तौ भी ये जगत् के
अन्दर की ही वस्तुएँ हैं, ये जगत् के बाहर की वस्तुएँ नहीं हैं]।
इन ईश्वर और जीव दोनों ने मिलकर पीछे से यह सब कल्पित
कर डाला है ।
विज्ञान के बाद आनन्द आता है । विज्ञान भिन्न भिन्न होते
हैं । आनन्द सब को एक जैसा ही आता है । शूकर को शूक्री
से जितना आनन्द आता है, राजा को रानी से भी उतना ही—
उस जैसा ही आनन्द आता है । यों आनन्द नाम का जो ईश्वर
तत्व है वह एक जैसा है—एक है । परन्तु आनन्द को प्रकट

करनेवाले—उसका दर्शन करने वाले, जो विज्ञानमय हैं, वे भिन्न
भिन्न हैं। यही तो ईश्वर और जीव का वेदान्तसम्मत भेद है।
ये दोनों ही माया के कल्पित हैं।
ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशेन कल्पिता।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥२१३॥
[ईश्वर और जीव इन दोनों में से किसने कितना जगत्
बनाया है सो भी सुनो] ‘स ऐक्षत लोकान्नु सृजा’ (ऐ. १-१) से
लेकर ‘एतया द्वारा प्रापद्यत’ (ऐतरे. ३-१२) तक कही गयी ईक्षण
से लेकर प्रवेशपर्यन्त सृष्टि तो ईश्वर की बनाई हुई है। तस्य
त्रय आवसथा (ऐत. ३-१२) से लेकर ‘स एतमेव ब्रह्म ततमपश्यत्’
(ऐतरे. ३-१३) तक वर्णन किये हुए जाग्रत् से लेकर मोक्षपर्यन्त
संसार को जीव ने बना लिया है। इसका विशेष विस्तार तृप्ति-
दीप के चतुर्थ श्लोक में है।
अद्वितीयं ब्रह्मतत्त्व मसङ्गं तन्न जानते।
जीवेशयो र्मायिकयो वृथैव कलहं ययुः ॥२१४॥
इस संसार में जो एक अद्वितीय तथा असंग ब्रह्मतत्त्व है
उसको तो ये पहचानते ही नहीं हैं और फिर वृथा ही माया-
कल्पित जीव तथा मायाकल्पित ईश्वर के विषय में परस्पर
लड़े मरे जाते हैं। [इन किसी को भी श्रुतिसिद्ध परमार्थ तत्त्व
का परिज्ञान नहीं हैं। ये तो ईश्वर को अपने से भिन्न राजा की
तरह का एक शासक समझते हैं। विद्वान ज्ञानी नीतिनिपुण
पुरुष उसी ईश्वर के कहने से प्रशंसनीय व्यवहार करता है।
उसका ईश्वर उससे अच्छा व्यवहार कराता है। दूसरे प्रकार
के पुरुष दूसरी तरह का बर्ताव करते हैं। उनका ईश्वर उनसे

१९२ पञ्चदशी

अद्वितीयब्रह्मतत्वे स्वप्नोऽयमखिलं जगत् ।
ईशजीवादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम् ॥२११॥
ईश्वर और जीव आदि के रूप से वर्तमान जो यह जडा-
त्मक और चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् है यह सब उस अद्वितीय
ब्रह्मतत्व में एक [बड़ा] सुपना है [क्योंकि यह सब अद्वितीय
ब्रह्मतत्व को ही तो अन्यथा समझ लिया गया है ] ।
सुपना 'सुपना' है, यथार्थ ज्ञान नहीं है यह बात जागने
से पहले मालूम नहीं पड़ सकती, जागने पर ही यह मालूम
पड़ा करता है । इसी प्रकार 'यह जगत् एक सुपना है, ऐसा
ज्ञान ब्रह्मविद्या नाम के जागरण के हो जाने पर ही हो सकता
है, पहले नहीं ।
आनन्दमयविज्ञानमया वीश्वरजीवकौ ।
मायया कल्पितावेतौ ताभ्यां सर्वं प्रकल्पितम् ॥२१२॥
आनन्दमय और विज्ञानमय जिनको ईश्वर और जीव भी
कहते हैं, दोनों ही माया के कल्पित किये हुए हैं। [इस कारण ये
ईश्वर तथा जीव यद्यपि ब्रह्म से अभिन्न हैं तौ भी ये जगत् के
अन्दर की ही वस्तुएँ हैं, ये जगत् के बाहर की वस्तुएँ नहीं हैं]।
इन ईश्वर और जीव दोनों ने मिलकर पीछे से यह सब कल्पित
कर डाला है ।
विज्ञान के बाद आनन्द आता है। विज्ञान भिन्न भिन्न होते
हैं । आनन्द सब को एक जैसा ही आता है । शूकर को शूक्री
से जितना आनन्द आता है, राजा को रानी से भी उतना ही-
उस जैसा ही आनन्द आता है। यों आनन्द नाम का जो ईश्वर
तत्व है वह एक जैसा है-एक है। परन्तु आनन्द को प्रकट