पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
10. Natakadipa
[१०]
नाटकदीप का संक्षेप
वह परमात्मतत्त्व पहले भी अद्वयानन्द पूर्ण था और अब भी
है। वह कुतूहल में आकर अपनी माया के प्रताप से पहले तो जगत्
बना और फिर जीवरूप से उसी में प्रवेश कर गया। उत्तम देहों
में प्रवेश करके तो वह देवता हुआ। अधम देहों में प्रवेश करने
से उसमें मर्त्यपन आ गया। जब उसने अनेक जन्मों तक अपने
कर्म ब्रह्मार्पण करने शुरू किये तब उसमें फिर आत्मस्वरूप का
विचार करने की शक्ति जाग उठी। विचार की आंच के सामने
जब माया न ठहर सकी तब वह फिर स्वयम् अकेला का अकेला
ही रह गया। ये जगत् और जीव सब के सब पलायन कर गये।
उस अद्वितीय तत्व के सच्चे बन्ध और मोक्ष का निरूपण करने का
सामर्थ्य तो किसी में है ही नहीं। जब उस तत्व को दुःखी होने
का धोखा लग जाता है तब बस यही उस का 'सद्वयपना' और
यही उस का 'बन्ध' कहाता है। यह दुःखीपना जब हटता है
और जब स्वरूप में स्थिति मिल जाती है तब इसी को 'मोक्ष' कहने
लगते हैं। जानते हो यह बन्ध कहां से आया है? सुनो, यह बन्ध
अविचार से आया है और विचार करने से यह बन्ध खुल जायगा।
इस कारण जब तक तत्व का साक्षात्कार न हो जाय तब तक जीव
और परात्मा का विचार सदा ही करते रहना चाहिये। विचार
नाटकदीप का संक्षेप ८३
करने की रीति भी सुन लीजिये—देहादियों में 'मैंपन' का अभि-
मान करने वाला अहंकार 'कर्ता' (जीव) कहाता है। उसके अभि-
मान करने के साधन को मन कहते हैं। वह क्रम से कभी अन्दर
और कभी बाहर क्रियायें किया करता है। वह मन जब अन्त-
र्मुख होकर 'म' ऐसी वृत्ति करता है तब वह वृत्ति 'कर्ता' (जीव)
की ओर इशारा करती है। जब तो उसी मन में बहिर्मुख वृत्ति
होती है तब वह बाह्य पदार्थों की ओर 'यह' ऐसा संकेत किया
करती है। अब उस इदम् (यह) में जो रूपादि विशेष विशेष
धर्म होते हैं, उनका ज्ञान पांचों इन्द्रियों से होता है। इतनी बातें
समझ लेने के बाद अब जरा 'साक्षी' तत्व को भी समझ लीजिये—
जो तो केवल चिद्रूप रह कर ही उस 'कर्ता' को भी, उपर्युक्त
'क्रियाओं' को भी, तथा एक दूसरे से अत्यन्त विलक्षण गन्ध आदि
'विषयों' को भी, एक ही प्रयत्न से प्रकाशित किया करता है, उसी
चिद्रूप तत्व को वेदान्तों में 'साक्षी' कहा है। लोक में भी देख
लो—नृत्यशाला में जलता हुआ दीपक, नाट्यगृह के 'प्रभु' को,
नाट्य देखने वाले 'सभ्यों' को तथा 'नर्तकी' को एक ही रूप
से प्रकाशित किया करता है। प्रकाश करते हुए किसी की खास
रियायत नहीं करता है और जब ये सब लोग नृत्यशाला को छोड़
कर चले जाते हैं तब भी वह विचारा अकेला ज्यों का त्यों जला
ही करता है। ठीक इसी दृष्टान्त की तरह यह साक्षी तत्त्व 'अहं-
कार' को 'बुद्धि' को तथा 'विषयों' को प्रकाशित किया करता है।
परन्तु जब सुषुप्ति आदि के समय अहंकार आदियों में से कोई
भी शेष नहीं रह जाता है तब भी तो यह 'साक्षी' पहले की तरह
ही जगमगाता रहता है। वह कूटस्थ तत्व तो सदा भासता ही
रहता है। मानो कोई अखण्ड दीपक ही जल रहा हो। यह
८४ पंचदशी
बिचारी गरीब बुद्धि उसी सदाविभात साक्षी की चमक से उधारी
चमक लेकर अनेक रूप से नाचा करती है। यह बुद्धि जिस
नाटक को खेल रही है, उसके पात्र आदि को भी जान लो।
'अहंकार' ही इस नाटक का 'प्रभु' है। क्योंकि नाटक के मालिक
की तरह विषयभोग की सफलता और विफलता से हर्ष और
विषाद इसी को तो होते हैं। 'विषय' ही इस नाटक के 'सभ्य'
माने गये हैं। नाटक के दर्शकों को जैसे सुखदुःखमयी घटना
देखने पर भी सुख दुःख नहीं होते, इसी प्रकार इन विषयों को
भी सुख दुःख कुछ नहीं होते। 'बुद्धि' ही इस नाटक की 'नर्तकी'
है। क्योंकि नर्तकी की तरह नाना तरह के विकार इसी में
तो होते हैं। ताल आदि को धारण करने वाली 'इन्द्रियां' हैं।
क्योंकि ये इन्द्रियां बुद्धि के विकारों के अनुकूल व्यापार किया
करती हैं। यह 'साक्षी' ही, इन सब का 'प्रकाशक दीपक' माना
गया है। क्योंकि इसी से इन सब का प्रकाश होता है। दीपक
जैसे एक ही जगह रक्खा हुआ अपने चारों ओर प्रकाश पहुंचा
देता है इसी प्रकार यह साक्षी भी अपने स्वरूप में स्थित रहकर
ही बाहर और अन्दर प्रकाशित कर देता है। अन्दर और बाहर
का यह विभाग भी देह की दृष्टि से ही है। साक्षी की दृष्टि में
तो ऐसा कोई भी विभाग नहीं है। वैसे तो बुद्धि अन्दर बैठी
रहती है, परन्तु वह इन्द्रियों की टोली के साथ बाहर निकल
पड़ती है। अब समझ गये होंगे कि चंचलता इस बुद्धि की ही
है। परन्तु फिर भी इस चंचलता का आरोप साक्षी तत्व में व्यर्थ
ही कर लिया जाता है। झरोखे में से जो प्रकाश घर में आ रहा
है, उसमें यदि हाथ को नचावें तो जैसे वह धूप ही नाचती सी
दीखती है, इसी प्रकार साक्षी तो अपनी जगह पर ही डटा बैठा
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है वह अन्दर बाहर आता जाता नहीं है, परन्तु बुद्धि की चंचलता
के कारण आता जाता सा मालूम होने लगा है। यह साक्षी अन्दर
या बाहर का कभी नहीं होता। ये तो दोनों बुद्धि के ही देश
हैं। कल्पना करो कि तुम्हारी बुद्धि और इन्द्रियां मर चुकी हैं—
उनकी प्रतीति बन्द हो गयी है—अब बताओ कि वह प्रकाश
कहां जगमगा रहा है ? बुद्धि आदि की प्रतीति के बन्द हो जाने
पर भी यह प्रकाश जहां जगमगा रहा है, वही साक्षी का अपना
स्थान है। यदि कहो कि ऐसी अवस्था आने पर तो कोई भी देश
भासता नहीं है तो हम कहेंगे कि तुम उस साक्षी को बेदेश का ही
तत्व समझ लो। शास्त्र में कहीं कहीं जो उस साक्षी को 'सर्वगत' या
'सर्वसाक्षी' कह दिया है वह भी सब देश की कल्पना के आधार
पर ही कहा है। स्वाभाव से तो वह अद्वितीय और असंग ही है।
यह शैतान बुद्धि अन्दर या बाहर के जिस किसी देशादि को
घड़ कर खड़ा कर देती है उस देश का यह तत्व उसका साक्षी
कहाने लगता है। यह शैतान बुद्धि जिन रूपादि की कल्पना कर
लेती है, उन उन को प्रकाशित करते ही यह उनका साक्षी हो
जाता है। परन्तु इस साक्षी का अपना निराला स्वभाव पूछो तो
यह स्वयं तो वाणी और बुद्धि का गोचर ही नहीं हो पाता है।
स्वतंत्र रूप से विचार करने बैठें तो उसे साक्षी भी क्यों कर कह
दें? ऐसे साक्षी के विषय में एक बड़ी उलझन यह है कि—फिर
ऐसे अगोचर तत्व को हम मुमुक्षु लोग कैसे समझें ? इसका समा-
धान यह है कि आप लोग ग्रहण करना ही छोड़ दो। सारा झगड़ा
तो ग्रहण करने का ही है। यह जब तक ग्रहण करते रहोगे तब
तक आत्मतत्व दीखने वाला नहीं है। ग्रहण करना छोड़ते ही
उस तत्व के दर्शन मिल जाते हैं। किसी को ग्रहण न
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करना ही, उस तत्व को ग्रहण करना कहाता है।
जब यह सर्वग्रह—जिसे तुम अनादि काल से करते आ रहे हो—
रुक जायगा उस समय जो अनुपम सत्य तत्व शेष रह जायगा,
वही तो यह है। उस तत्व को जानने के लिये आपको किसी भी
प्रमाण से सहायता लेनी नहीं पड़ेगी। क्योंकि वह तत्व तो स्वयं
प्रकाश है। वैसी स्वयंप्रकाश वस्तु को समझना हो तो किसी
अनुभवी के मुख से श्रुति का पठन करो। अनुवादों के पढ़ने से
वह बात मिलने वाली नहीं है। जो जिस मार्ग की यात्रा कर
लेता है उसके मर्म का वही सच्चा जानकार होता है वही दूसरे
को भी सच्चा मार्ग दिखा सकता है। मुरदा पुस्तकों को पढ़
लेने से बात का मर्म हाथ नहीं लगता। इस कारण अनुभवी गुरु
की आवश्यकता होती ही है।
यदि तो मन्दाधिकारी लोग उपर्युक्त सर्वग्रह का त्याग न
कर सकें तो वे बुद्धि की शरण में पहुँच जांय। बुड्ढे लोग
जैसे लकड़ी के सहारे से चलते हैं इसी प्रकार वे लोग बुद्धि के
सहारे से इसी साक्षी तत्व को पहचानें, कि यह बुद्धि जिस किसी
बाह्य या आन्तर पदार्थ की कल्पना करती है उस उस पदार्थ का
साक्षी होकर यह परात्मा बुद्धि के अधीन होता है। यों बुद्धि का
हाथ पकड़ कर इस गहन तत्व को वे लोग भी टटोल लें।