पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
7. Triptidipa
:[७]
तृप्तिदीप का संक्षेप
पुरुष यदि अपने आपे को पहचान जाय कि यह तत्व मैं
हूँ ( मेरा स्वरूप यह है ) तो फिर न तो इच्छा करने की कोई
वस्तु ही रह जाती है और न कोई इच्छा करने वाला तत्व ही
शेष रहता है। यों आत्मज्ञानी को शरीर के सुखदुःखों के साथ
साथ सुखी या दुःखी होना नहीं पड़ता। इसी बात का विस्तार
पूर्वक वर्णन इस 'तृप्तिदीप' नामक प्रकरण में जीवन्मुक्त महाशयों
में रहने वाली तृप्ति को बताने के लिये किया है।
इसे समझने के लिये जीव को दो भागों पर विचार कीजिये—
एक इसका भ्रम भाग है दूसरा इसका अधिष्ठान भाग है। जब
भ्रम भाग की प्रधानता होती है और अधिष्ठान भाग दबा सा
रहता है तब तो यह 'जीव' अपने को 'संसारी' माना करता है।
जब तो भ्रम भाग को मिथ्या समझ कर उसका अनादर कर
दिया जाता है—जब भ्रम को भुला दिया जाता है और अधिष्ठान
भाग ही प्रधान बन जाता है तब यही जीव 'मैं तो चिदात्मा हूँ मैं
तो असंग हूँ' ऐसा जानने लग पड़ता है। कल्पित सर्प का वहां से
नष्ट हो जाना जैसे सत्य नहीं होता है,इसी प्रकार जीवों को होने
वाला 'मैं असंग हूँ' इत्यादि ज्ञान भी सत्य तो नहीं होता है परन्तु
जैसे कांटों से कांटों को निकाल देते हैं इसी प्रकार इन असत्य
ज्ञानों से भी असत्य संसार का नाश तो हो ही जाता है।
तृप्तिदीप का संक्षेप ४९
जब हम किसी बड़े भारी जनसमुदाय में घुसते हैं तब
अपने खो जाने के डर से अपने शरीर पर कोई भी चिह्न नहीं
कर देते हैं। क्योंकि हमको इन शरीरों के आत्मा होने का सन्देह
भी नहीं होता है, और हमें इस विषय में विपर्यय भी कुछ नहीं होता
है। इतना ही पक्का ज्ञान जब किसी को आत्मतत्व के विषय में हो
जाय—व्यापक जगदात्मा को ही जब कोई अपना आपा समझने
लग पड़े, जब कोई देहात्मज्ञान की पूरी पूरी बाधा कर सके—तब
ऐसे पुरुष की मुक्ति उसके न चाहने पर भी होती ही है।
यों तो यह आत्मतत्व सब को सदा प्रत्यक्ष ही रहता है,
परन्तु नित्य प्रत्यक्ष रहनेवाले भी इस आत्मतत्व में 'परोक्षता'
और 'अपरोक्षता' तथा 'ज्ञान' और 'अज्ञान' दोनों ही बातें दसवें
की तरह रहती हैं—कोई दस मनुष्य नदी को पार करके अपने
को गिनने लगे। गिनने वाला अपने को छोड़कर शेष नौ को
गिन लेता था, और रोता था कि हाय ! दसवां तो नदी में डूब
गया। इस उदाहरण में दसवें को अपना 'ज्ञान' भी है और
'अज्ञान' भी है। दसवें का उसे 'प्रत्यक्ष' भी है और 'अप्रत्यक्ष'
भी है। अब कोई भलामानस उन सब को गिनकर उसको ही
दसवां बता देता है, तब उसे उसका पूर्ण प्रत्यक्ष हो जाता है।
फिर दसवें का अप्रत्यक्ष या अज्ञान कभी नहीं होता। इसी प्रकार
आत्मतत्त्व की बात भी है। यह आत्मतत्त्व संसार की सब वस्तुओं
को तो जानता है, परन्तु संसार के पदार्थों में आसक्त होकर,
संसार के सब पदार्थों को जाननेवाला जो उसका अपना आपा
है, उसके विषय में उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है। अनुभवी लोगों
के मुख से जब यह मार्मिक आत्मकथा सुनता है और उसपर
बार बार विचार करता है, तब उसे आत्मा का—सर्वव्यापक चेतना
५० पंचदशी
का—जो असली कूटस्थ रूप है, उसका प्रत्यक्ष होजाता है। अनु-
भवी लोगों के समझाने से आत्मा के न होने के भ्रान्त विचार तो
सदा के लिए नष्ट होजाते हैं, परन्तु आत्मा के प्रतीत न होने के
जो भ्रान्त विचार हैं वे तो तब नष्ट होते हैं जब समाधिभावना
( तीव्र लगन ) से आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। यह पिछली
अवस्था जब आती है तब ही जीवभाव नष्ट होता है और सब
शोक छिप जाते हैं। अपने नित्यमुक्तपने की नष्ट स्मृति दुबारा
जाग उठती है। इसी अवस्था को ध्यान में रखकर कहा है कि
“आत्मा को यदि जाना जाय कि यह तत्त्व मैं हूँ”। यों तो आत्मा
स्वयंप्रकाश तत्व है ही, परन्तु इतने से साधक का कुछ भी उप-
कार नहीं होता। जब साधक की बुद्धि आत्मा के इस स्वयंप्रकाशपने
को अनुभव (महसूस) भी करले तब उस अवस्था की ओर को इस
श्लोक में संकेत (इशारा) किया है कि 'यह मैं हूँ।' 'तू ही तो दसवाँ
है' इस वाक्य पर जब विचार किया जाता है, तब खोया हुआ
दसवां उसके सामने आ खड़ा होता है। इसी प्रकार 'आत्मा
ब्रह्म है' इस वाक्य पर जब विचार किया जाता है तब आत्मा
और ब्रह्म के एक होने की बात आंखों के सामने आखड़ी होती
है। दसवां कौन सा है ? इस प्रश्न के उत्तर में जब दसवां तू ही
है, यह कहा जाता है और जब शेष नौ के साथ मिलाकर अपने
आपको गिना जाता है, तब अपने आपके दसवेंपन की स्मृति
जाग उठती है। अब आप उसे हज़ार बार नदी में को निकाल
लीजिये और गिनवाइये अब वह दसवें को कभी भी नहीं भूलेगा।
क्योंकि उसे दसवें का अनुभवपूर्ण ज्ञान हो चुका है । इसी प्रकार
विचार के द्वारा जब आत्मा के व्यापक होने का ज्ञान अनुभव का
रूप धारण कर लेता है—या यों कहिये कि जब इस ज्ञान का
तृप्तिदीप का संक्षेप ५१
विज्ञान बनजाता है, तब शरीरों के किसी भी व्यवहार में लगे
रहने पर भी अपनी व्यापकता भूल जाने वाली बात नहीं रहती ।
वह अवस्था अभ्यास से पकते-पकते जब पूर्ण यौवन पर आती
है तब ब्रह्माभ्यासी पुरुष अपने को सर्वत्र परिपूर्ण ज्ञान और
आनन्दरूप में पाकर स्वभावतृप्त रहने लग पड़ता है।
हमारा जो जीव है वह क्योंकि अन्तःकरण से युक्त है इस
कारण से हमें केवल उतने ही भाग के प्रत्यक्ष होने की बात तो
समझ में आती है, परन्तु अन्तःकरण से रहित जो सर्वत्र व्यापक महा-
चेतना है, उसका हमें कभी प्रत्यक्ष हो सकेगा, यह बात जिनकी
समझ में न आती हो वे इस पर यों विचार करें-दो गुरु शिष्यों
में से गुरु के कान में कुण्डल पहने हुए हों तथा शिष्य के कान में
कुण्डल न हों। अब हमें उन दोनों का पृथक् पृथक् परिचय देने
में एक का चिह्न तो कुण्डल का होना बताना पड़ेगा तथा दूसरे
शिष्य का चिह्न कुण्डल न होना ही बताना पड़ेगा कि जिसके
कान में कुण्डल नहीं है वही शिष्य है। यों जैसे किसी वस्तु का
'होना' लक्षण हो सकता है वैसे ही किसी वस्तु का 'न होना' भी
लक्षण हो सकता है। इसी प्रकार 'अन्तःकरण का होना' जीव-
भाव की पहचान है तथा 'अन्तःकरण का न होना' या न रहना
ब्रह्मभाव की पहचान मानी जाती है। यही कारण है कि कभी तो
वेदान्त सच्चिदानन्द आदि धर्मों से उसका प्रतिपादन करते हैं और
कभी नेतिनेति की निषेध प्रक्रिया से उसका वर्णन करने लग पड़ते
हैं। जब हम अपने चिदात्मा पर से अपने अन्तःकरण का बन्धन
(किंवा पाबन्दी) उठा सकेंगे, तब यही हमारी अब की क्षुद्र चेतना,
व्यापक चेतना के रूप में, किंवा ब्रह्म के रूप में, प्रकट होकर
रहेगी। इस स्वयंप्रकाश चेतन के दर्शन के लिए, हमको केवल
५२ पंचदशी
इतना ही करना पड़ेगा, कि हम अपनी बुद्धिवृत्ति को, उसके
आकार का बना डालें। ऐसा करने पर व्यापक चेतन को आवृत
कर रखने वाला अज्ञान, नष्ट हो जायगा और स्वयं प्रकाश तत्व
अपने आप ही दीखने लग पड़ेगा। परन्तु अनादि काल से हमारे
मन में बैठे हुए ये विचार ही कि "हम व्यापक कैसे हो सकते
हैं ? हम तो कुछ करने और कुछ भोगने वाले तथा परिमित क्षेत्र
में बद्ध रहने वाले प्राणी हैं" हमारे इस व्यापक रूप के दर्शन को
दृढ नहीं होने देते हैं। हमें अपने इस व्यापक रूप में या तो
संदेह बना रह जाता है या अपना यह व्यापक रूप भूल कर फिर
फिर वही संकीर्णता की भावना जाग उठती है। परन्तु जब हम
सर्वात्मना तत्पर होंगे, तब तो व्यापक रूप के दर्शन में सफल न
होने का कोई कारण ही नहीं रह जायगा। इस प्रकार के आत्म-
दर्शन में विघ्न डालने वाली असंभावना और विपरीत भावना को
हटाने का एक मात्र यही उपाय है कि आत्मतत्व में बुद्धि की
एकाग्रता के प्रयत्न को निरन्तर चालू रखा जाय। नहीं तो अनादि
काल की वासनाएँ इस विचार रूपी नन्हें बालक को पनपने ही
नहीं देंगी। एक बात विशेष ध्यान रखने की है कि इस तत्व को
यदि हम कुछ काल के लिए भूल भी जायेंगे तो भी कोई अनर्थ
नहीं हो जायगा। अनर्थ तो तब होता है जब हम इस तत्व को
पहले की तरह फिर संकीर्ण समझने लग पड़ते हैं। तत्परता से
जब कि यह तत्व बार बार स्मृति में लाया ही जा रहा है तब इस
प्रकार की विपरीत वृत्ति के जाग उठने का कोई अवसर ही
नहीं रह जाता है। जब आन्तरदर्शन पर विश्वास बढ़ता है और
बाह्यदर्शन पर से विश्वास उठ चुकता है तब जितने दिनों तक
के लिए यह शरीर रचा गया है, उतने दिनों तक बाह्य प्रवृत्ति
तृप्तिदीप का संक्षेप ५३
रहती तो है, परन्तु दृष्टिकोण बदल जाने से अब क्लेशरहित जीवन-
यात्रा होने लग पड़ती है। अब उसे शरीर के सुख दुःखों के
अनुसार सुखी दुःखी नहीं होना पड़ता है। जगत् की असारता
को समझ चुकने पर इच्छा करने वाले की और अभिलाषा करने
योग्य पदार्थ की विचारहीन भावना पर कुठाराघात हो जाता है।
फिर तो तैलरहित दीपक जैसे बुझ जाता है उसी तरह संसारताप
स्वयं शान्त हो जाता है। अब तो तमाशे में देखते हुए काल्प-
निक पदार्थों की तरह इस संसार के प्रिय से प्रिय समझे जाने
वाले पदार्थों को भी खुशी खुशी छोड़ा जा सकता है। इस प्रकार
का तत्त्व दर्शन हो चुकने पर भी जब तक इस शरीर के जीवन
का काल रहता है तब तक इच्छा अनिच्छा और परेच्छा प्रारब्धों
से प्रभावित होकर लौकिक भोगों में प्रवृत्त होते ही रहते हैं। इस
प्रकार की प्रारब्धप्रवृत्ति की रोक थाम करना अत्यन्त असंभव
है। युधिष्ठिर और राम जैसे तत्त्वदर्शी लोग भी इस प्रकार के व्यव-
हार को रोक नहीं सके हैं। आत्मदर्शी की तथा दूसरों की
इच्छाओं में यही भेद होता है कि आत्मदर्शी की इच्छा से आगे
को व्यसन की उत्पत्ति नहीं हो पाती। उसे भोगों का भोग तो प्राप्त
हो जाता है परन्तु वह भोगों का व्यसनी (दास) नहीं बन जाता।
जब कि हम संसारी लोग भोग भी भोगते हैं और आगे को उनके
दास भी बन जाते हैं। भोग देकर चरितार्थ हुआ प्रारब्ध कर्म
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों का ही मर जाता है परन्तु अज्ञानी लोगों
की इस भ्रान्त धारणा से कि ये भोग तो सच्चे हैं आगे को भी
भोगों का व्यसन लग जाता है। वह ज्ञानी को नहीं लगता। जब
कि यह सारा ही जगत् उसका आत्मा बन चुकता है तब व्यसन
से प्रभावित होने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता। तत्त्वज्ञान
५४ पंचदशी
का जो प्रभाव है वह तो व्यवहार में ही देखा जा सकता है।
व्यवहार रुक जाने पर तत्वज्ञान का प्रभाव देखने को मिल ही नहीं
सकता। यही कारण है कि निर्विकल्प समाधि को तत्वज्ञान की
अवस्था माना ही नहीं जाता। निर्विकल्प समाधि तो उपरति की
ही एक अवस्था है। वह ज्ञान की कोई सी भी अवस्था नहीं है।
हां, यह बात तो है कि जगत् की मायामयता का सम्पूर्ण दर्शन
'तभी हो सकता है जब कि चित्त का निरोध हो चुका हो। मनुष्य-
जीवन की गम्भीर समस्याओं को समझने का अवसर चित्त के
रुकने पर ही आता है। इस भाव को लेकर चित्त के रोकने का
अभ्यास किया जा सकता है। परन्तु चित्तनिरोध ही हमारा
एकमात्र लक्ष्य नहीं है। आत्मरूप का अनुभवयुक्त ज्ञान हो जाना
ही राजयोग का मुख्य ध्येय है। आत्मा के स्वरूप का इस प्रकार
का दर्शन मिल जाने पर ही शरीरों के साथ सुखी दुखी न हो
सकने की शान्तिवर्धक अवस्था आती है। हमारे ये तीनों शरीर
स्वभाव से ही दुःखों के निवासभवन हैं। शरीर में वात,पित्त, कफ
की न्यूनाधिकता से करोड़ों बीमारी खड़ी होती रहती हैं। मन में
काम क्रोध आदि की अशान्तिकारक भावनाएँ आती ही रहती
हैं। यों इन शरीरों में स्वभाव से ही दोष भरे पड़े हैं। इन दोषों
से इनका वियोग कर सकना ऐसा ही असंभव है जैसे घड़े को
मिट्टी से अलग करना। परन्तु अविद्या से प्रभावित होकर जब
इन दुःखपूर्ण शरीरों की और आत्मा की परस्पर एकता मान ली जाती
है तब परस्पर में धर्मों का लेन देन हो जाता है। आत्मा की
सत्यता इन शरीरों में मान कर इस सम्पूर्ण मिश्रण को अपना
स्वरूप समझने की भूल की जाती है। शरीर दुःखी हो तो
कुटुम्ब के किसी भी व्यक्ति के दुःखी होने से अपने को ही दुःखी
[header] तृप्तिदीप का संक्षेप ५५ [/header]
मानते हुए कुटुम्बनेता की तरह अपने आपको ही दुःखी माना
जाने लगता है । यह भूल साक्षित्व का ध्यान न आने तक ही
चलती है । सर्पबुद्धि से भयभीत पुरुष पीछे से रज्जु रूप को
पहचान कर जैसे अपनी पहली समझ पर हँसता है,
उसी तरह ज्ञानी को भी अपनी पहली भ्रान्ति पर उपहासपूर्ण
उपेक्षा का भाव आता है । जड और चेतन के मिश्रण
रूपी इसी अपराध को क्षमा कराने के लिये ही मानो साधक,
ज्ञान की अनन्त आवृत्तियाँ किया करता है और जब तक
स्पष्ट रूप से व्यापक चेतन अलग और ये शरीर अलग दिखायी
देने नहीं लगते, तब तक ज्ञान की आवृत्ति करता ही जाता है।
इस अपने पूर्वापराध को क्षमा कराने की इसके सिवाय दूसरी
कोई विधि ही नहीं है। जब तक यह प्रारब्ध देह है तब तक
जीवभाव की गन्ध कभी कभी तो ज्ञानी के व्यवहार में आया ही
करेगी। परन्तु इतनी सी घटना से तत्वज्ञान को विनष्ट हुआ
नहीं समझा जायगा। क्योंकि जीवन्मुक्ति नाम का कोई व्रत
नहीं है जो साधकों पर लागू कर दिया गया हो। यह तो जिस
क्रम से चलता है—जैसे धीरे धीरे उन्नति करता है—इसे तो
वैसा का वैसा ही चलने देना पड़ेगा। दसवें के हमारे उपर्युक्त
दृष्टान्त में भी यही बात है कि दसवें की अप्राप्ति के लिये रोना
तो उसका ज्ञान होते ही नष्ट हो जाता है। परन्तु दसवें के शोक
में सिर पीटते पीटते जो घाव पड़ गया है, वह तो महीने दो
महीने में जाकर अच्छा हो पाता है। हां, यह बात तो है कि
दसवें के न मरने के महालाभ से उसे जो हर्ष होता है वह सिर
के घाव की पीड़ा को उपेक्षित करा देता है। इसी प्रकार जड़
चेतन के ग्रन्थिमोक्ष से प्रारब्ध दुःख तो ढक ही जाते हैं—वे
५६ पंचदशी
नगण्य होजाते हैं—वे फिर सुलझाने योग्य समस्या नहीं रह
जाते। शरीर आदि की रचना यदि केवल अज्ञान से हुई होती
तो हां संसारविषयक भ्रमपूर्ण धारणा के हटते ही शरीर का भी
पात होजाता। परन्तु इनकी रचना तो अज्ञान और कर्म दोनों से
मिलकर हुई है। संसारविषयक अज्ञान के नष्ट हो चुकने पर भी कर्मों
का परिचालित वेग जब तक पूरा पूरा शान्त नहीं हो लेगा, तब
यह ज्ञानिशरीर जीवित रहेगा ही और संसार तथा मोक्ष का
मिश्रित अनुभव लेता ही रहेगा। इसके पश्चात् ज्ञानी की तृप्ति में
एक अभूतपूर्व परिवर्तन की अवस्था आयेगी। अब ज्ञानी को कुछ
भी कर्त्तव्य शेष दीख नहीं पड़ेगा। अब वह दूसरे कर्त्तव्याक्रान्त
लोगों को पहाड़ पर चढ़े हुए पुरुष की तरह उपेक्षाभाव से
देखेगा। अब वह अपने मन से ऐसे प्रश्नों की झड़ी लगा देगा
कि जिन का उसके मन पर जीवन्मुक्त होजाने के सिवाय कुछ भी
सन्तोष जनक उत्तर नहीं होगा। मन के इस निरुत्तरपने का
परिणाम यह होगा उसे अपना संसरण का विभाग, अपने लाभा-
लाभ के विचार से तो एकदम बन्द कर देना ही होगा। हां,
जिस शास्त्रीय मार्ग पर चलकर उसने मुक्ति का महालाभ उठाया
है, वह मार्ग दूसरों के लिये भी अक्षुण्ण बना रहे इस लोक
संग्रह के विचार से अपने जीवनरथ को शास्त्रीयपद्धति पर ही
दौड़ाता चला जायगा। परन्तु एक बात भले प्रकार समझ रखने
की है कि ज्ञानी की शास्त्रीयमार्ग पर कर्म करने की अपनी कुछ
भी आवश्यकता नहीं है। उसके ज्ञान की स्थिरता में कर्म का
उपयोग लेशमात्र भी नहीं है। उस के ज्ञान की जो
निरन्तर धार बहेगी वह कर्म करने से नहीं बहेगी।
वह तो एकमात्र ज्ञान के अबाधित होने से ही बहती रह सकेगी।
इसके अतिरिक्त कोई सा भी साधन ज्ञान को निरन्तर स्थिर नहीं
रख सकेगा । इस बाधित संसार का यह विस्तृत पसारा उसके
ज्ञान को मार गिरायेगा ऐसी तो शंका ही निर्मूल है । ये सब
पदार्थ जब अपने पूर्ण यौवन में थे तब उन सब को मार कर
आत्मलाभ करने वाला ज्ञान, क्या भला अब इन मृतों से मार खा
सकेगा ? जिस ज्ञान ने बचपन में सारे पसारे को सकोड़ दिया
था अब अपने यौवन में उनसे कैसे हार मान लेगा ? ज्ञान हो
चुकने के पश्चात् भी दीखते रहने वाले इस संसार रूपी मुरदे से
तो ज्ञानराजा की कीर्त्ति ही बढ़ेगी । इस प्रकार का ज्ञान जिस
ज्ञानी को कभी भी छोड़ कर नहीं जाता, उस ज्ञानी के देहादि
कुछ करें या न करें इन घटनाओं से वह प्रभावित नहीं होता ।
प्रवृत्ति की ओर जिसको आग्रह है वह तो ज्ञानी की पंक्ति में
बैठने का अधिकारी नहीं है । क्योंकि सांसारिक या पारमार्थिक
सुख पाने के लिए यत्न करने का भाव यही है कि अभी तक वह
सुख के स्वरूप को पा नहीं सका है। ऐसे अवसर पर ज्ञानी का
एक ही कर्त्तव्य है कि ऐसे लोगों में रह कर इन्हें कर्त्तव्य का
पाठ स्वयं व्यवहार करके सिखाया करे। तथा जिज्ञासुओं को
कर्मों के दूषण दिखा दिखा कर कर्म करने से छुड़ा छुड़ा कर
उन्हें ज्ञानमार्ग पर डालता जाय । अपने मानापमान की कुछ भी
परवा न करके उन्हें अपने-अपने अधिकार के अनुरूप मार्गों पर
डालता जाय । यह अमानवी अवस्था जब प्राप्त हो चुकेगी तब
की देव दुर्लभ कृतकृत्यता का वर्णन करने के लिए मानवी भाषा को
दिवालिया हो जाना पड़ेगा । आइये उस स्थिति का अनुभव लेने
के लिए हम आज से ही उद्योग प्रारम्भ कर दें ।