पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५५
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५५
समझ गया हूँ। मैं धन्य हूँ क्योंकि अब मुझे ब्रह्मानन्द स्पष्ट
दीखने लगा है ।
धन्योऽहं धन्योऽहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य ।
धन्योऽहं धन्योऽहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥६०॥
मैं धन्य हूँ । क्योंकि आज मैं किसी भी सांसारिक दुःख
को नहीं देख रहा हूँ। मैं धन्य हूँ क्योंकि मेरा अज्ञान न मालूम
कहां भाग गया है ।
धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किंचित् ।
धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमद्य संपन्नम् ॥६१॥
मैं धन्य हूँ मुझे कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहा है । मैं धन्य
हूँ क्योंकि जो कुछ मुझे पाना था वहं सभी कुछ आज मेरा सिद्ध
हो गया है ।
धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तिर्मे कोपमा भवेल्लोके ।
धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥६२॥
मैं धन्य हूँ बताओ कि संसार में आज मेरे समान तृप्त कौन
हैं ? मैं और अधिक कहां तक कहता जाऊँ, बस मैं तो यही
कहता हूँ कि मैं धन्य हूँ और अनन्त बार धन्य हूँ ।
अहो पुण्य महो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् ।
अस्य पुण्यस्य संपत्ते रहो वयमहो वयम् ॥६३॥
ओहो ! आज मेरे कोटि जन्मों के पुण्यों के ढेर ने फलरूप
धारण किया है । इस पुण्य संपत्ति के कारण आज मैं कृतकृत्यता
की झूल में पड़ा झोटे ले रहा हूँ ।
अहो शास्त्र महो शास्त्र महो गुरु रहो गुरुः ।
अहो ज्ञानमहो ज्ञानमहो सुखमहो सुखम् ॥६४॥
५५६ पञ्चदशी
जिन शास्त्रों, जिन अध्यात्मदर्शी गुरुओं, जिन ज्ञानों और
जिन आनन्दों के कारण से, आज मुझे यह धन्य अवस्था हाथ
लगी है, उन सब को अनेक अनेक बार धन्यवाद है [ वे सब
के सब आज मुझे मेरा परम पद देकर समुत्तीर्ण हो गये हैं ।
उनकी महिमा को गाने के लिये मैं शब्दों को कहां से लाऊँ ?]
ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे चतुर्थोऽध्याय ईरितः ।
विद्यानन्द स्तदुत्पत्तिपर्यन्तोऽभ्यास इष्यताम् ॥६५॥
ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में 'विद्यानन्द' नाम का चतुर्थ
अध्याय समाप्त हुआ । इस विद्यानन्द की उत्पत्ति जब तक न
हो जाय तभी तक ब्रह्माभ्यास करना आवश्यक होता है । [ इसके
उत्पन्न हो जाने पर फिर ब्रह्माभ्यास करना शेष नहीं रह जाता ]
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे
विद्यानन्दप्रकरणम्