पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६५
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६५
हो सकती है जब अपरोक्ष ज्ञान हो जाय [ अपरोक्ष ज्ञान
करादेने के अतिरिक्त विचार का कोई भी काम नहीं है ] ।
विचारयन्नामरणं नैवात्मानं लभेत चेत् ।
जन्मान्तरे लभेतैव प्रतिबन्धक्षये सति ॥३३॥
मरण पर्यन्त विचार करते रहने पर भी यदि किसी को
आत्मा का साक्षात्कार न हो गया हो तो,प्रतिबन्धों के हट जाने
पर, दूसरे किसी जन्म में तो उसे साक्षात्कार हो ही जायगा ।
इह वामुत्र वा विद्येत्येवं सूत्रकृतोदितम् ।
शृण्वन्तोऽप्यत्र बहवो यन्न विद्युिरिति श्रुतिः ॥३४॥
ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् (ब्रह्म सू० ३-४-५१)इस
सूत्र में व्यास देव ने कहा है कि विचार करने वाले को इस
जन्म या दूसरे जन्मों में ब्रह्म ज्ञान हो जाता है । 'शृण्वन्तोऽप्यत्र
बहवो यन्न विद्युः' ( क० २-७ ) इस श्रुति में कहा गया है कि
प्रतिबन्ध होने पर बहुतों को इस जन्म में ज्ञान नहीं होता ।
गर्भ एव शयानः सन् वामदेवोऽवबुद्धवान् ।
पूर्वाभ्यस्तविचारेण यद्वदध्ययनादिषु ॥३५॥
'गर्भे नु सन्नन्वेषा मवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ( ऐतरेय ४-
५ ) इस श्रुति में कहा गया है कि—वामदेव को गर्भवास के
दिनों में ही अपरोक्ष ज्ञान हो गया था । इससे यह सिद्ध होता
है कि इस जन्म में श्रवणादि कर लेने वाले को दूसरे जन्म में
३४—कोई प्रतिबन्ध न हो तो श्रवण आदि से इस जन्म में भी ज्ञान हो
जाता है । प्रतिबन्ध हो तो इस जन्म में न होकर दूसरे जन्मों में होता
है । प्रतिबन्ध के साधक प्रमाण देखे जाते हैं । जैसे कि वामदेव को गर्भ
में ज्ञान हुआ था । बहुत से तो इस तत्व को सुन कर भी नहीं समझते हैं ।
भी अपरोक्ष ज्ञान होता है। दैनिक व्यवहार में भी देख लो
कि—पठन पाठन आदि कामों में पहले अभ्यास किये हुए
विचार से कभी कभी अगले दिन बिना ही याद किये स्मरण
आ जाता है।
बहुवारमधीतेऽपि तदा नायाति चेत् पुनः।
दिनान्तरेऽनधीत्यैव पूर्वाधीतं स्मरेत् पुमान् ॥३६॥
बहुत बार याद करने पर भी, उस दिन यदि याद नहीं
आता,तो कभी कभी ऐसा होता है कि दूसरे दिन बिना ही याद
किये पहले पढ़े हुए पाठ याद आ जाते हैं।
कालेन परिपच्यन्ते कृषिगर्भादयो यथा।
तद्वदात्मविचारोपि शनैः कालेन पच्यते ॥३७॥
खेती और गर्भ आदि जैसे तुरन्त ही तैयार नहीं हो जाते।
किन्तु पकने में इन्हें कुछ समय लगता ही है। इसी प्रकार
आत्मविचार भी धीरे-धीरे काल पाकर परिपक्व हुआ करता है।
पुनः पुनर्विचारेऽपि त्रिविधप्रतिबन्धतः ।
न वेत्ति तत्वमित्येतद् वार्तिके सम्यगीरितम् ॥३८॥
बार बार विचार करने पर भी, तीन प्रकार के प्रतिबन्धों
के होने से तत्व का साक्षात्कार नहीं हो पाता । यह बात
वार्तिककार ने भले प्रकार समझायी है ।
कुतस्तज्ज्ञानमिति चेत् तद्धि बन्धपरिक्षयात् ।
असावपि च भूतो वा भावी वा वर्ततेऽथवा ॥३९॥
वार्तिककार ने उन प्रतिबन्धों का निरूपण इन नौ श्लोकों
में यों किया है—जो ज्ञान पहले जन्म में उत्पन्न नहीं हो पाया
था वह ज्ञान अब इस दूसरे जन्म में किस कारण से उत्पन्न