पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
[header] द्वैतविवेक का संक्षेप २३
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पिलाकर निकालते हैं वही काम कछवी अपने संकल्प से कर
डालती है। संयम करते करते संयमी लोगों के संकल्प में फिर कर्म
की शक्ति आ जाती है। संकल्प में से ही तो कर्म में बल आता है।
तत्त्वज्ञानी के कर्म में और संकल्प में दोनों जगह बल रहता है।
ईश्वर को कर्म करना ही नहीं पड़ता। उसको केवल संकल्प
करना पड़ता है। बस कर्म अपने आप हो जाता है। यों वे
संकल्प से सृष्टि बना लेते हैं। जब जीवात्मा इस ईश्वरोत्पादित
जगत् के विषय में अपने मनोवृत्ति नाम के संकल्प दौड़ाता है,
तब यह जगत् उसके भोग का साधन बनता है, नहीं तो नहीं
बनता। ईश्वर तो मणि को एक ही तरह का बनाते हैं, परन्तु
जिसको वह मिलती है, वह हर्ष करता है। जिसे नहीं मिलती,
वह पछताता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें न पाने का हर्ष
होता है और न उन्हें न मिलने का पछतावा ही होता है। यों
एक मणि में तीन आकार सिद्ध होते हैं —एक 'प्रिय' दूसरा
'अप्रिय' तीसरा 'उपेक्ष्य'। ये तीनों ही आकार जीवों की भिन्न-
भिन्न बुद्धियों के अनुसार ही होते हैं। इन आकारों के बनाने में
ईश्वर का हाथ सर्वथा नहीं होता। देखते हैं कि सम्बन्धियों
के भेद से एक ही स्त्रीपिण्ड दादी, माता, पत्नी, पुत्री, पौत्री
आदि अनेक रूपों में देखी जाती है। वह जो ईश्वरनिर्मित
मांसमय स्त्रीपिण्ड है, वह तो अवश्य ही एक तरह का रहता है,
परन्तु मनोमयी स्त्रियां एक में ही अनेक हो जाती हैं। क्योंकि
भोक्ताओं के मन भिन्न-भिन्न होते हैं। श्रम के समय में, मनोराज्य
के समय में और स्मृति के समय म तो मनोमय पदार्थों से ही
हमारा व्यवहार होता है। इन अवस्थाओं में ईश्वर का बनाया
पदार्थ होता ही नहीं। जाग्रत् काल में भी मनोमय पदार्थों से ही
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व्यवहार होते हैं। परन्तु जाग्रत् समय के मनोमय पदार्थों को
अत्यन्त सावधानी से जान लेना चाहिये। जब हमारा मन किसी
पदार्थ को देखता है, तब वह उसी पदार्थ के रूप का हो जाता
है। आंख बन्द करके ध्यान करते ही वही रूप हमारे मन में
दीखा करता है। यों जब हम जागरण के समय किसी पदार्थ को
देखते हैं तब वहां दोहरे पदार्थ होते हैं—जैसे एक मिट्टी का घड़ा
दूसरा मन का घड़ा। मिट्टी के घड़े को तो हम प्रमाणों से जानते
हैं। परन्तु हमारा मनोमय घड़ा प्रमाणों से नहीं दीखता। वह
तो साक्षी आत्मा से प्रकाशित हुआ करता है। हमको जो वस्तु
बन्धन में डालती है वह यह 'मनोमय' ही तो है। यह हो तो
सुख दुःख होते हैं, नहीं तो नहीं होते। बाह्य पदार्थ नहीं भी
होते, तब भी सुपने आदि में मनोमय पदार्थों से जीव को सुख
दुःख हो जाते हैं। सुपने की मनोमयी स्त्री के संग से वीर्यपात
हो जाता है। समाधि, सुषुप्ति या मूर्छाकाल में बाह्यपदार्थ बने भी
रहते हैं, परन्तु तब मनोमय पदार्थ न होने से जीवों को सुख दुःख
नहीं होते। पुत्र दूरदेश में गया हो और वह जीता हो तब उस
का पिता वंचक के कहने से उसे मरा समझ कर रो देता है।
क्योंकि उसका मनोमय पदार्थ मर गया है। पुत्र मर भी गया हो
परन्तु उसका समाचार न मिला हो तब नहीं रोता। क्योंकि
उसका मनोमय पदार्थ तो जीवित ही है। यों यह स्पष्ट है कि
मानस जगत् ही बन्धन करने वाला है। इस मानस द्वैत को
नष्ट करने के दो उपाय हैं एक 'योग' दूसरा 'ज्ञान'। योग में
मनोनिरोध करना पड़ता है, उससे मानस संसार बनना रुक तो
जाता है, परन्तु वह बीजरूप में तो रहता ही है। जब भी मनो-
निरोध करना छोड़ेंगे, तुरन्त मानस द्वैत आ खड़ा होगा और वह