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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् २१५

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चित्रदीपप्रकरणम् २१५

इसका भाव है] यदि कहो कि ज्ञान होने पर ऐसी हालत हो जाती है
कि ज्ञानी के देहादि कुछ काम कर ही नहीं सकते, तो हमें यह
बात सुनकर हंसी आती है कि ज्ञानी के शरीर को अशक्त कर
देने वाला वह ज्ञान क्या हुआ ? वह तो एक रोग ही हुआ [वह
ज्ञान तो एक प्रकार 'लकवा' ( पक्षाघात) हुआ]।
तत्त्वबोधं क्षयं व्याधिं मन्यन्ते ये महाधियः ।
तेषां प्रज्ञातिविशदा किं तेषां दुःशकं वद ॥२७१॥
जो महाबुद्धि लोग तत्वबोध को एक प्रकार का क्षयरोग
मानते हैं—[कि तत्वज्ञानी के हाथ पैर उठते ही नहीं] उनकी
बुद्धि के विषय में हम क्या कहें ? उनकी बुद्धि बड़ी विशद
है। ऐसे पुरुषों को असाध्य ही क्या है ? [वे जो चाहें कह
सकते हैं]
भरतादे रवृत्तिः पुराणोक्तेति चेत्तदा ।
जक्षन् क्रीडन् रतिं विन्दन्नित्यश्रौषीर्न किं श्रुतिम्॥२७२॥
यदि कहा जाय कि 'जडभरत आदि महात्मा लोग कुछ
भी नहीं करते थे' यह बात पुराण में कही गयी है। पुराणों
का कहना है कि—ज्ञानी लोग किसी काम में प्रवृत्त होते ही
नहीं। तो हम उससे कहेंगे कि—जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा
यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम् (छा० ८–१२–३) यह
श्रुति का वाक्य क्या तुमने नहीं सुना है ? जिसमें ज्ञानी की
प्रवृत्ति का विधान किया गया है—[तुम्हारा उपर्युक्त आक्षेप
श्रुति के मर्म को न जानने के कारण से है।]
न ह्याहारादि सन्त्यज्य भरताद्याः स्थिताः क्वचित् ।
काष्ठपाषाणवत् किन्तु संगभीता उदासते ॥२७३॥

२१६ पञ्चदशी
भरतादि ने भी काष्ठ या पाषाण की तरह खान पान
आदि का परित्याग तो कभी भी नहीं किया था। किन्तु वे
लोग संगदोष के लग जाने के डर से; उदासीन रहते थे ।
[पुराणों का तात्पर्य भी उनकी उदासीनता के दिखाने में ही है ]
सङ्गी हि बध्यते लोके निःसङ्गः सुखमश्नुते ।
तेन सङ्गः परित्याज्यः सर्वदा सुखमिच्छता ॥२७४॥
लोक में देखते हैं कि सङ्ग करने वाले लोग ही बँधे फिरते
हैं। निःसंग लोगों को मौज मारते हुए पाया जाता है । इससे
जो लोग नित्य सुख की इच्छा रखते हों, उन्हें संग का परि-
त्याग सदा के लिये कर देना चाहिये ।
अज्ञात्वा शास्त्रहृदयं मूढो वक्त्यन्यथान्यथा ।
मूर्खाणां निर्णय स्त्वास्तामस्मत्सिद्धान्त उच्यते॥२७५॥
मूर्ख लोग शास्त्र के मर्म को तो पहचानते नहीं और कुछ
का कुछ कहने लगते हैं। इस कारण उनकी बात को यहीं
छोड़ कर अब हम अपनी प्रकृत बात, किंवा शास्त्र के रहस्य
का वर्णन करते हैं ।
वैराग्यबोधोपरमाः सहायास्ते परस्परम् ।
प्रायेण सह वर्तन्ते वियुज्यन्ते क्वचित् क्वचित् ॥२७६॥
शास्त्र का सिद्धान्त तो यह है कि—'वैराग्य' 'बोध' तथा
'उपरम' ये तीनों परस्पर के सहायक हैं। ये तीनों प्रायः करके
साथ ही साथ रहते हैं। कहीं कहीं तो ये अलग अलग भी
पाये जाते हैं। . .
हेतुस्वरूपकार्याणि भिन्नान्येषामसङ्करः ।
यथावदवगन्तव्यः शास्त्रार्थं प्रविविच्यता ॥२७७॥