पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०९
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०९
हैं [सब शक्तियें एक स्थान और एक काल में ही उदित नहीं
होतीं] देखते हैं कि भूमि में बहुत से बीज पड़े रहते हैं परन्तु
वे सब एक साथ उदित नहीं होते। किन्तु किसी देश और किसी
काल [ऋतु] में कोई कोई बीज अंकुर को उत्पन्न कर देते हैं।
स आत्मा सर्वगो राम ! नित्योदितमहावपुः ।
यन्मनाङ् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥२०॥
हे राम ! सर्वत्र विद्यमान नित्य प्रकाशमान तथा देश
कालादि की मर्यादा में कभी न आने वाले स्वरूप वाला वह
आत्मा जिस समय [आत्मबोध कराने वाली] मनन शक्ति को
[जो कि माया का परिणाम रूप है ] धारण कर लेता है, तब
उसको 'मन' कहने लगते हैं ।
आदौ मनस्तदनुबन्धविमोक्षदृष्टी
पश्चात् प्रपंचरचना भुवनाभिधाना ।
इत्यादिका स्थितिरियं हि गता प्रतिष्ठा-
माख्यायिका सुभगवालजनोदितेव ॥२१॥
[मनन शक्ति का उल्लास जब होता है तब] पहले तो मन
[उत्पन्न] होता है। उसके पश्चात् बन्ध और मोक्ष की कल्पना
जाग पड़ती है। उसके अनन्तर पर्वत नगर नदी समुद्रादि
प्रपंच की रचना - जिसको भुवन भी कहते हैं - हो जाती है।
इस तरह की यह जगत् की अवस्था प्राणियों के जी में जम
गई है [ कल्पित होने पर भी सच्ची सी प्रतीत होने लगती है ]
कहानी सुनने के शौकीन बच्चों को सुनाई हुई कथा को जैसे वे
बच्चे सच्ची ही मान लेते हैं, इसी प्रकार यह जगत् भी सत्य
माना जाने लगा है।
५१० पञ्चदशी
बालस्य हि विनोदाय धात्री वक्ति शुभां कथाम् ।
क्वचित् सन्ति महाबाहो राजपुत्रास्त्रयः शुभाः ॥२२॥
द्वौ न जातौ तथैकस्तु गर्भ एव न च स्थितः ।
वसन्ति ते धर्मयुक्ता अत्यन्तासति पत्तने ॥२३॥
स्वकीयाच्छून्यनगरान्निर्गत्य विमलाशायाः ।
गच्छन्तो गगने वृक्षान् ददृशुः फलशालिनः ॥२४॥
भविष्यन्नगरे तत्र राजपुत्रास्त्रयोऽपि ते ।
सुखमद्य स्थिताः पुत्र ! मृगयाव्यवहारिणः ॥२५॥
धात्र्येति कथिता राम ! बालकाख्यायिका शुभा ।
निश्चयं स ययौ बालो निर्विचारणया धिया ॥२६॥
बालकों को बहलाने के लिए धायी एक बड़ी मनोहर कहानी
कहा करती हैं कि—किसी देश में तीन बड़े सुन्दर राजकुमार
रहते हैं । उनमें से दो तो अभी तक उत्पन्न ही नहीं हुए हैं।
और एक तो अभी तक गर्भ में ही नहीं आया है। वे तीनों के
तीनों बड़े धर्मपूर्वक एक अत्यन्त असत् नगर में रहते हैं । एक
बार वे तीनों उदार राजकुमार अपने शून्य नगर में से निकल
कर जा रहे थे कि उन्होंने आकाश में फलों से लड़े हुए बहुत
से पेड़ देखे । वे तीनों गजपुत्र भविष्यत् नगर में शिकार
खेलते खेलते आज आनन्द पूर्वक रह रहे हैं ।. हे राम ! धायी
ने ये एक बड़ी मनोहर कहानी कही थी। वह भोला बच्चा अपनी
विचारशून्य [भोली] बुद्धि से इसे ठीक मान बैठा ।
इयं संसाररचना विचारोज्झितचेतसाम् ।
बालकाख्यायिकेवेत्थमवस्थितिमुपागता ॥२७॥