पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
द्वैतविवेकप्रकरणम् १११
द्वैतविवेकप्रकरणम् १११
से जब कि तुम जीवन्मुक्ति जैसे पद का त्याग कर रहे हो, तब क्या
तुम स्वर्ग सुख के लोभ में फँसकर विदेहमुक्ति को छोड़ नहीं बैठोगे ?
यों बार बार तुम्हारा जन्म होता ही रहेगा। क्योंकि तुम तो स्वर्ग
मात्र से ही सन्तुष्ट होने वाले प्राणी ठहरे। जो तुम ऐहिक
भोगों का लालच भी नहीं छोड़ सकते हो उस तुम्हें मुक्ति का
ढोंग छोड़ देना चाहिये ।
क्षयातिशयदोषेण स्वर्गो हेयो यदा तदा।
स्वयं दोषतमात्मायं कामादिः किं न हीयते ॥५३॥
"क्षय की अधिकतारूपी दोष से [अथवा नाश और दूसरे की
अधिकता की ईर्षा से] हम स्वर्ग का परित्याग करते हैं" ऐसा
यदि कहो तो बताओ फिर सकल पुरुषार्थों के विघातक इस दोषरूप
कामादि को ही क्यों नहीं छोड़ देते हो ? [दोषी स्वर्ग को
छोड़ने वाले को अत्यन्त दोषी कामादि तो छोड़ ही देने चाहियें ।]
तत्त्वं बुद्ध्वापि कामादीन्निःशेषं न जहासि चेत् ।
यथेष्टाचरणं ते स्यात् कर्मशास्त्रातिलङ्घिनः ॥५४॥
आत्मतत्व को जानकर भी यदि तू पूर्णरूप से कामादि को
नहीं छोड़ेगा तो इस का परिणाम यही होगा कि तत्वज्ञानीपने
के अभिमान में आकर तू कर्मशास्त्र [कर्तव्य बताने वाले शास्त्र]
की आज्ञाओं को टालने लगेगा और यों तू एक यथेष्टाचारी हो
जायगा [सो भाई ! यह भला तत्वज्ञान हुआ यों तो तू संसारियों
से भी गया बीता हो जायगा। तीर्थ के कव्वों की तरह तू भी ज्ञान
का भांड, या राम राम रटने वाला तोता हो जायगा ।]
बुद्धाद्वैतस्वतत्वस्य यथेष्टाचरणं यदि ।
शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षणे ॥५५॥
११२ पञ्चदशी
सुरेश्वराचार्य ने कहा कि—अद्वैतरूप आत्मतत्व को जान
चुका हुआ भी यदि अभी तक यथेष्टाचारी ही है, तो फिर वह
अशुचिभक्षणादि गर्हित से गर्हित काम भी करेगा ही। फिर
बताओ कि विधि निषेध की आज्ञा न मानने वाले ऐसे तत्व
ज्ञानियों में और कुत्तों में क्या भेद रह गया ?
'सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति संप्राप्ते हि कलौ युगे। तानुत्तिष्ठन्ति मैत्रेय शिश्नो-
दरपरायणाः' कलियुग जब आयगा तब ब्रह्म की चर्चा तो बहुतायत
से होगी, परन्तु उपस्थ और पेट के गुलाम बनकर करें धरेंगे
कुछ भी नहीं। ऐसी शोचनीय अवस्था जिस की है वह ज्ञानी
नहीं है वह तो ज्ञानिविदूषक है। ऐसे ज्ञानी से तो अज्ञानी
ही अच्छे हैं। क्योंकि वे अपने दोष को स्वीकार तो करते हैं।
औषध खाकर जैसे पथ्य न किया जाय ऐसे ही ब्रह्मज्ञानी हो
कर यदि व्यवहार शुद्धि नहीं है, यदि दैवी संपत्ति नहीं आयी
है, तो इस सूखे ब्रह्मज्ञान से क्या होना है ? प्रत्युत ऐसा ब्रह्मज्ञान
घातक हो सकता है (सरकण्डे के फूल पर जैसे फल नहीं लगता
इसी प्रकार ऐसे शुष्क ब्रह्मज्ञान रूपी पुष्प पर मुक्तिरूपी फल
नहीं लगता)
बोधात् पुरा मनोदोषमात्रात् क्लिश्नास्यथाधुना ।
अशेषलोकनिन्दा चेत्यहो ते बोधवैभवम् ॥५६॥
जब तक तुझे तत्वज्ञान नहीं हुआ था तब तक तो तुझे
केवल काम क्रोधादि मनोदोष ही क्लेश पहुँचाया करते थे।
परन्तु अब तत्वज्ञान हो जाने पर वे कामादि मनोदोष तो हैं
ही, उनके साथ ही साथ अब तेरी सर्वलोकनिन्दा भी होने लगी है
[कि देखो तत्वज्ञानी हो कर भी यह बुरे बुरे काम करता है] यों