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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७३

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७३
पूजे जाते हैं, वह पूजा उन निष्पाप देवताओं के लिए नहीं
होती। किन्तु वह पूजा तो पूजक के लिए ही की जाती है [यों
अपने स्वार्थ के लिए ही ईश्वर पूजा की जाती है। ईश्वर का तो
उसमें कुछ भी स्वार्थ नहीं होता।]
ऋगादयो ह्यधीयन्ते दुर्ब्राह्मण्यानवाप्तये ।
न तत् प्रसक्तं वेदेषु मनुष्येषु प्रसज्जते ॥१७॥
व्रात्यपन से बचने के लिए ऋगादि वेदों का अध्ययन किया
जाता है। वेदों में तो उस व्रात्यपन की संभावना भी नहीं
होती। वह तो मनुष्यों में ही प्रसक्त होता है [यों अपने स्वार्थ
के लिए ही वेदाध्ययन किया जाता है।]
भूम्यादिपञ्चभूतानि स्थानतृट्पाकशोषणैः ।
हेतुभिश्चावकाशेन वाञ्छन्त्येषां न हेतवः ॥१८॥
सारे प्राणी किसी वस्तु को रखने के लिए भूमि को, प्यास
निवारण करने के लिए जल को, पाक और शोषण करने के
लिए अग्नि और वायु को तथा अवकाशदान करने के कारण
आकाश को चाहते हैं। इन पृथिवी आदि भूतों को तो स्थान
आदि की कुछ आवश्यकता ही नहीं होती है।
स्वामिभृत्यादिकं सर्वं स्वोपकाशाय वाञ्छति ।
तत्तत्कृतोपकारस्तु तस्य तस्य न विद्यते ॥१९॥
स्वामी जो भृत्य को चाहता है, भृत्य जो स्वामी को चाहता
है, सो सब अपने अपने उपकार के लिए ही तो चाहता है।
दूसरों का किया हुआ उपकार दूसरों को नहीं मिलता।
कोई भी किसी दूसरे की भलाई करना नहीं चाहता सभी
संसार स्वार्थी है। दुनिया के परोपकारी कहलाने वाले लोग

४७४ पञ्चदशी

भी स्वार्थी ही हैं। वे जब किसी को दुःखी देखते हैं तब उनके
जी में एक कांटा सा चुभा करता है। हृदय में चुभने वाले
अपने उस कांटे को निकालने के लिए ही वे परोपकार में प्रवृत्त
होते हैं। परोपकार किये बिना उनके जी का कांटा निकलता
ही नहीं। यों परोपकारी लोग भी अन्ततः सच्चे स्वार्थी ही हैं।
सर्वव्यवहृतिष्वेवमनुसन्धायमीदृशम् ।
उदाहरणबाहुल्यं, तेन स्वां वासयेन्मतिम् ॥२०॥
[यों इच्छापूर्वक जितने भी व्यवहार होते हैं उन] सब
व्यवहारों में इसी प्रकार आत्मप्रीति को दिखाने के लिए पति
पत्नी आदि बहुत से उदाहरण दिये हैं। इस कारण समझदार
को आत्ममति की वासना कर लेनी [आत्मविषयक बुद्धि बना
लेनी] चाहिए [सब पदार्थों को आत्मा का उपकारी समझ कर,
आत्मा को ही सब से अधिक प्रिय जान लेना चाहिए।]
अथ केयं भवेत् प्रीतिः श्रूयते या निजात्मनि ।
रागो वध्वादिविषये, श्रद्धा यागादिकर्मणि ।
भक्तिःस्याद् गुरुदेवादाविच्छा त्वप्राप्तवस्तुनि ॥२१॥
अब प्रश्न यह है कि—यह जो निजात्मा में प्रीति सुनी
जाती है। उस प्रीति का रूप क्या है ? क्या वह राग है ?
श्रद्धा है ? भक्ति है ? या इच्छा है ? यदि वह राग हो तो वधू
आदि में ही हो। यदि वह श्रद्धा हो तो वह यागादि में ही हो।
यदि वह भक्ति हो तो वह गुरु आदि में ही हो। यदि वह
इच्छा हो तो वह अप्राप्त वस्तु ही में हो। [आत्मा का शेष
(अंग) होने से सब पदार्थ प्रिय होते हैं और आत्मा प्रियतम
होता है। प्रेम के स्वरूप को जाने बिना आत्मा की प्रियतमता

: समझ में आती ही नहीं। इस कारण प्रेम के स्वरूप की विवे-
: चना इस श्लोक में सूझी है। प्रेम ऐसा होना चाहिए जो सभी
: पदार्थों पर लागू हो सकता हो। यदि वह सब पदार्थों पर लागू
: नहीं होता है तो वह प्रेम नहीं है। उसको सर्वविषयक सिद्ध
: करने के लिए प्रीति का रूप बताना चाहिए जो सब में
: पाया जा सकता हो।]
: तर्ह्यस्तु सात्त्विकी वृत्तिः सुखमात्रानुवर्तिनी ।
: प्राप्ते, नष्टेऽपि, सद्भावादिच्छातो व्यतिरिच्यते ॥२२॥
: उसका उत्तर यह है कि यदि वह प्रीति रागादिरूप नहीं
: हो सकती है तो आप उस प्रीति को केवल सुख को विषय
: करने वाली एक सात्त्विक वृत्ति मान लो। उस प्रीति को सत्त्व-
: गुण से बनी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो। जब कोई
: वस्तु प्राप्त हुई रहती है या जब कोई वस्तु प्राप्त होकर नष्ट हो
: जाती है अथवा अप्राप्त रहती है तब भी उसके विषय में यह
: [केवल सुख को विषय करने वाली सात्त्विक] वृत्ति बनी ही
: रहती है। इस कारण इस वृत्ति को इच्छा से भिन्न माना जाता
: है। [क्योंकि इच्छा तो केवल अप्राप्त सुखादि को ही अपना
: विषय बनाया करती है और यह वृत्ति प्राप्त अप्राप्त सभी को
: अपना विषय बनाती है]
: सुखसाधनतोपाधेरन्नपानादयः प्रियाः ॥२३॥
: आत्मानुकूल्यादन्नादिसमश्चेदमुनात्रकः ।
: अनुकूलयितव्यः स्यान्नैकस्मिन् कर्मकर्तृता ॥२४॥
: प्रश्न होता है कि--सुख के साधन होने के कारण जैसे
: अन्न पानादि प्रिय देखे गए हैं इसी प्रकार यदि यह आत्मा भी

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अनुकूल किंवा प्रिय होने के कारण ही [अन्नपानादि के समान]
सुख का साधन होता होगा,तो इसका क्या समाधान करते हो ?
इस का उत्तर यह है कि—अच्छा यह बताओ कि तुम्हें इस
आत्मा से किस की अनुकूलता करनी है ? [ऐसा तो कोई दीख
नहीं पड़ता कि इस आत्मा को जिस के अनुकूल बना दिया
जाता हो। आत्मा से भिन्न तो कोई और भोक्ता है ही नहीं।
यदि कहो कि वह स्वयं अपने आप के ही अनुकूल हो जायगा
तो हम कहेंगे कि] एक में कर्म और कर्ता की दोनों बात नहीं
रह सकतीं। [वही आत्मा उपकार्य भी हो और वही उपकारक
भी हो, यह दोनों विरुद्ध धर्म एक आत्मा में कैसे टिकेंगे ? ]
सुखे वैषयिके प्रीतिमात्रमात्मा त्वतिप्रियः ।
सुखे व्यभिचरत्येषा नात्मनि व्यभिचारिणी ॥२५॥
विषयजन्य जो सुख है, उनमें प्रीति तो होती है [किन्तु
उनमें प्रगाढ प्रीति नहीं होती] इसके विपरीत आत्मा तो अत्यन्त
प्रिय होता है [इस कारण उसे विषयजन्य सुखों के समान
मत मानो। जैसे विषयसुख भोक्ता के काम आता है, वैसे
यह आत्मा किसी भोक्ता के उपयोग में आने वाला तत्व नहीं
है ] देख लो कि विषय सुखों में रहने वाली यह प्रीति व्यभि-
चार कर जाती है—[यह प्रीति कभी पूर्वसुखों को छोड़ कर
दूसरे सुखों में पहुँच जाती है—एक सुख में बँध कर बैठे रहना
इस प्रीति को पसन्द नहीं है] परन्तु आत्मा में जो प्रीति रहती
है वह कभी व्यभिचार नहीं करती—[वह विषयान्तर में कभी
नहीं जाती। इस कारण आत्मप्रीति को ही निरतिशय प्रीति
कह सकते हैं।]