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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

15. Vishayananda

ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम्
अथात्र विषयानन्दो ब्रह्मानन्दांशरूपभाक् ।
निरूप्यते द्वारभूतस्तदंशत्वं श्रुतिर्जगौ ॥१॥
अब इस ग्रन्थ में ब्रह्मानन्द के ही एक भाग 'विषयानन्द'
का निरूपण कर रहे हैं । क्योंकि वह भी ब्रह्मज्ञान का उपयोगी
है । श्रुति ने भी अपने मुख से इस विषयानन्द को ब्रह्मानन्द का
ही एक भाग कहा है ।
एषोऽस्य परमानन्दो योऽखण्डैकरसात्मकः ।
अन्यानि भूतान्येतस्य मात्रामेवोपभुञ्जते ॥२॥
श्रुति ने कहा है कि—जो कि अखण्ड और एकरस आनन्द
है वही तो उस ब्रह्म का परमानन्द कहाता है । ये सम्पूर्ण भूत
इसी परमानन्द की एक बूंद की किसी छोटी सी मात्रा को ही
तो भोग रहे हैं ।
शान्ता घोरास्तथा मूढा मनसो वृत्तयस्त्रिधा ।
वैराग्यं क्षान्तिरौदार्य मित्याद्याः शान्तवृत्तयः ॥३॥
तृष्णा स्नेहो रागलोभावित्याद्या घोरवृत्तयः ।
संमोहो भयमित्याद्याः कथिता मूढवृत्तयः ॥४॥
मन की शान्त घोर तथा मूढ ये तीन तरह की वृत्तियां
होती हैं । वैराग्य, क्षमा, उदारता आदि 'शान्त' वृत्तियां कहाती
हैं । तृष्णा, स्नेह, राग, तथा लोभ आदि 'घोर' वृत्तियां हैं ।
संमोह तथा भय आदि 'मूढ' वृत्तियां कही गयी हैं । [ शान्त
वृत्तियां सात्विक हैं, घोर वृत्तियां राजस होती हैं, मूढ वृत्तियां
तामसी वृत्तियां मानी गयी हैं ] ।

५५८ पञ्चदशी

वृत्तिष्वेतासु सर्वासु ब्रह्मणश्चित्स्वभावता ।
प्रतिबिम्बति, शान्तासु सुखं च प्रतिबिम्बति ॥५॥
ऊपर कही हुई इन सभी वृत्तियों में ब्रह्म की चित्स्वभावता
प्रतिबिम्बित हो रही है। शान्त वृत्तियों में इतनी विशेषता होती
है कि उनमें चेतनता के साथ ही सुख भी प्रतिबिम्बित होता है।
रूपं रूपं बभूवासौ प्रतिरूप इति श्रुतिः ।
उपमा सूर्यकेत्यादि सूत्रयामास सूत्रकृत् ॥६॥
श्रुति में कहा है कि यह आत्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो
गया है। अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् (ब्रह्मसू. ३-२-१८) इस
में व्यास ने भी यही बात कही है। [जैसे यह ज्योतिर्मय सूर्य
स्वयं एक है परन्तु जलपात्रों के भेद से भेदयुक्त जलों के अनु-
सार अनेक हो जाता है इसी प्रकार अजन्मा यह आत्मदेव स्वयं-
प्रकाश और एक ही है परन्तु माया रूपी उपाधि से शरीरों के
अनुसार होकर भिन्न (अनेक) सा हो जाता है ]
एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः
एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥७॥
श्रुति कहती है कि सब भूतों में एक ही तो भूतात्मा
व्यवस्थित हो रहा है। वह [ ज्ञानी को ] एक रूप में और
[ अज्ञानी को ] जल के चांद की तरह अनेक रूप में दीख
पड़ता है।
जले प्रविष्टश्चन्द्रोऽयमस्पष्टः कलुषे जले ।
विस्पष्टो निर्मले, तद्वद् द्वेधा ब्रह्मापि वृत्तिषु ॥८॥
[ निरवयव ब्रह्म कहीं तो चिन्मात्ररूप से प्रतीत हो और
कहीं चैतन्य और आनन्द दोनों का भान हो, यह विभाग कैसे ·