पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 162 of 726
Read in context१४४ पञ्चदशी
फिर वे कर्म बने भी रहें, परन्तु जब विक्षेप का उपादान
(अविद्या) ही नष्ट हो गया तब विक्षेप रूपी कार्य कैसे बना रह
जाता है ? सो बताओ ? इसका उत्तर न्यायसिद्धान्त के अनु-
सार दिया जाता है] उपादान के नष्ट हो जाने पर भी क्षणभर
कार्य ठहरा रहता है। [कार्यकारणभाव को सिद्ध करने के
लिये] यह बात तार्किकों ने मानी है। फिर ऐसा ही हमारे
सिद्धान्तों में क्यों नहीं हो सकता है।
तन्तूनां दिनसंख्यानां तैस्तादृक् क्षण ईरितः ।
भ्रमस्यासंख्यकल्पस्य योग्यः क्षण इहेष्यताम् ॥५५॥
जिन तन्तुओं की अवस्था दिनों में गिनी जा सकती है
उनकी अवस्था के अनुसार ही उनका क्षण भी उन्होंने छोटा सा
माना है। परन्तु असंख्य कल्पों की आयु वाले इस भ्रम का
क्षण तो इसी अनुपात से कुछ लम्बा होना ही चाहिये।
ऐसी अवस्था में यह आक्षेप ठीक नहीं है कि तार्किकों ने
तो कार्य को क्षणमात्र रहनेवाला माना है। उनके विपरीत तुम
कार्य को चिरकाल तक रहने वाला क्यों मानते हो ? देखो
कि यह संसार अनादिकाल से चला आ रहा है। कुम्हार
जब अपने चक्र को घुमाकर छोड़ देता है, तब वह पीछे भी
चिरकाल तक घूमा ही करता है। इसी प्रकार अनादि काल के
संस्कारों की प्रबलता से यह विक्षेप भी कुछ दिनों तो बिना
चलाये भी चलता ही रहेगा। वह ज्ञान होते ही तुरन्त नष्ट
नहीं हो जायगा।
विना क्षोदक्षमं मानं तैर्वृथा परिकल्प्यते ।
श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यो वदतां किं नु दुःशकम् ॥५६॥