पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् १८१
चित्रदीपप्रकरणम् १८१
यह सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण प्रवृत्तियें उसी सर्वेश्वर के
अधीन हैं ।]
नार्थः पुरुषकारेणेत्येवं मा शंक्यतां यतः ।
ईशः पुरुषकारस्य रूपेणापि विवर्तते ॥१७७॥
'जब सभी प्रवृत्तियाँ ईश्वर के अधीन हैं तब फिर पुरुष के
प्रयत्न की आवश्यकता ही क्या रह जाती है' ऐसी शंका न
करनी चाहिये । क्योंकि वह ईश्वर ही तो पुरुषकार का रूप भी
धारण कर लेता है [पुरुष का प्रयत्न भी ईश्वर रूप ही है, यों
पुरुषार्थ करना भी सफल हो जाता है । ]
ईदृग्बोधेनेश्वरस्य प्रवृत्तिर्नैव वार्यताम् ।
तथापीशस्य बोधेन स्वात्मासङ्गत्वधीजनिः ॥१७८॥
जब किसी को ऐसा बोध हो जाय [कि ईश्वर ही पुरुष-
कारादि रूप में विवर्त हो जाता है] तब भी ईश्वर की अन्तर्यामी
रूप से प्रेरणा को वारण नहीं करना चाहिये [किंवा अन्तर्यामी
की प्रेरणा को व्यर्थ नहीं मान लेना चाहिये] क्योंकि उस रूप से
जब कोई ईश्वर तत्व को जान लेगा तब उसे अपने आत्मा की
असङ्गता का स्पष्ट ज्ञान उत्पन्न हो जायगा ।
तावता मुक्तिरित्याहुः श्रुतयः स्मृतयस्तथा ।
श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे इत्यपीश्वरभाषितम् ॥१७९॥
"आत्मा की असङ्गता का ज्ञान हो जाने से ही मुक्ति हो
जाती है" यह बात श्रुतियों और स्मृतियों ने कही है । ईश्वर
ने यह भी कहा है कि ये श्रुतियां और स्मृतियां मेरी ही
आज्ञायें हैं। ऐसी अवस्था में इन के कहने को टालना नहीं चाहिये ।
श्रुतिं स्मृतीममैवाज्ञे यस्ते उल्लंघ्य वर्तते । आज्ञोच्छेदी ममद्वेषी न मद्भक्तो
१८२ पञ्चदशी
न मप्रियः। अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् हमारा हाकिम हमारे अन्दर
बैठा हुवा है। जब हम कोई बुरा काम करने लगते हैं तब अन्दर से
घृणा भय और संकोच आदि की आवाज़ आती हैं। जब हम कोई
शुभ कार्य करते हैं तब अन्दर से प्रेम निर्भयता और उत्साह आदि
की स्फूर्ति होती है। ये ही सब ईश्वर की आज्ञायें हैं ! जो लोग
मनुष्यसमाज में अधिक संस्कृत होते हैं उन्हें ये आज्ञायें बड़ी
स्पष्ट सुनाई पड़ा करती हैं। जो निरन्तर पापाचारी होते हैं उन्हें
ये आवाजें सुनाई पड़नी बन्द हो जाती हैं। जिन्हें ये आज्ञायें
स्पष्ट सुनाई पड़ती हैं उन्होंने ही उन आवाज़ों को साधारण लोगों
के उपकार के लिये, उनके अन्दर की मुर्दा आवाज़ को जगाने
के लिए और उसके अनुकूल उनका आचरण कराने के लिये,
पुस्तकों में लिख दिया है। ऐसे ये लेख ही 'श्रुति' और 'स्मृति' हैं।
यों 'श्रुति' और 'स्मृति' ईश्वर की आज्ञायें हैं। वेदों के अपौरुषेय
होने का कारण भी यही है कि ये आवाजें बनायी नहीं जाती
किन्तु ऐसी की ऐसी ही साधक लोगों को—सत्यान्वेषी लोगों
को सुनाई पड़ा करती हैं। सुनाई पड़ने के कारण ही उनको
'श्रुति' कहा है ।
आज्ञाया भीतिहेतुत्वं भीषास्मादिति हि श्रुतम् ।
सर्वेश्वरत्वमेतत् स्यादन्तर्यामित्वतः पृथक् ॥१८०॥
भीषास्माद्वातः पवते तै० २-८ इत्यादि श्रुतियों में आज्ञा के
द्वारा ईश्वर को भय का कारण बताया गया है। [आज्ञा के
कारण] उस ईश्वर में जो 'सर्वेश्वरता' आती है वह 'अन्तर्यामि-
पने' से पृथक् ही एक धर्म है।
'अन्तर्यामी' वह है जो हम सब को अन्दर से अपने बस