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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १५१
तो तुम्हारे [बौद्ध के] मत में शून्य का कहना भी सिद्ध नहीं
हो सकेगा। [यों शून्य को जानने वाला तत्व तो तुम्हें भी
मानना ही पड़ेगा।]
अन्यो विज्ञानमयत आनन्दमय आन्तरः।
अस्तीत्येवोपलब्धव्य इति वैदिकदर्शनम् ॥७७॥
[सभी को मना करते जाते हो फिर आत्मा क्या चीज
है? इस बात का उत्तर इस श्लोक में दिया है] तस्माद्वा एतस्मा
द्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः (तै० २-५) अस्तीत्येवोपलब्ध-
व्यस्तत्वभावेन (क० २-६-१३) इन श्रुतियों के आधार से इन
सब से भिन्न आनन्दमय आत्मा मानना चाहिये। ऐसा वैदिक
सिद्धान्त है।
अणुर्महान् मध्यमो वेत्येवं तत्रापि वादिनः।
बहुधा विवदन्ते हि श्रुतियुक्तिसमाश्रयात् ॥७८॥
['आत्मस्वरूप में ही नहीं उसके परिमाण में भी लोगों
के अनेक मत हैं' यह अब दिखाया जाता है] श्रुति और युक्ति
के सहारे से वादी लोग आत्मा को अणु, महान् या मध्यम
बताते हैं और आपस में एक दूसरे से अनेक प्रकार के विवाद
करते हैं।
अणुं वदन्त्यन्तरालाः सूक्ष्मनाडीप्रचारतः ।
रोम्णः सहस्रभागेन तुल्यासु प्रचरत्ययम् ॥७९॥
अणुत्ववादी लोग सूक्ष्म नाडियों में प्रचार के कारण
आत्मा को अणु कहते हैं। रोम के सहस्र भाग के तुल्य जो
सूक्ष्म नाडियां हैं उनमें भी वह घूमा करता है। [ऐसी सूक्ष्म
नाडियों में अणु होने के बिना आत्मा का प्रचार कैसे हो ?]