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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

2. Pancha Mahabhuta Viveka

[ २ ]
पंचभूतविवेक का संक्षेप
पंचभूतविवेक नाम के दूसरे प्रकरण में बताया गया है कि
वर्षा ऋतु में पर्वत से ही उत्पन्न होने वाले तिनके जिस प्रकार पर्वत
को ही ढक लेते हैं, इसी प्रकार ये पांचभूत उसी (सत् अद्वैत
तत्व) से उत्पन्न हुए हैं परन्तु इन्होंने उसे ही छिपा डाला है। अब
हम साधकों का यह परम कर्त्तव्य है कि इन पांचों भूतों का
विश्लेषण करके, छिपे हुए उस तत्व को फिर दुबारा पहचान लें।
पहचानने की रीति यह है कि ग्यारह इन्द्रियों से युक्तियों से
और शास्त्रों से जिस पसारे को हम देख रहे हैं वह पसारा सृष्टि
बनने से पहले नहीं था। तब एक सत् ही सत् था। वह सत्
क्योंकि निरवयव तत्व है इस कारण पेड़ में जैसे पत्र पुष्प और
फलादियों से होने वाला स्वगत भेद रहता है वह भी तब नहीं
था। एक पेड़ का दूसरे पेड़ से जैसे सजातीय भेद होता है वैसा
सजातीय भेद भी तब नहीं था। एक पेड़ का विजातीय पत्थर
आदि से जैसे भेद होता है वैसा विजातीय भेद भी तब नहीं था।
यों स्वगत स्वजातीय और विजातीय भेद से हीन एक तत्व तब
था। कई लोगों को तो यह एक तत्व की बात बड़ी ही असह्य
प्रतीत होती है। जैसे समुद्र में डूबने से स्थलचारी का दम घुटता
है, इसी प्रकार अखण्ड एकरस तत्व को सुन कर और मन के
प्रचार के लिये अवकाश न पाकर, वे लोग वहां की गम्भीर शान्ति
से घबरा उठते हैं। दूषित वायु में रहने के आदी जैसे सुगन्ध
वायु से नाक सकोड़ते हैं और घबराते हैं इसी प्रकार बहुव्याकुल-

पंचभूत का संक्षेप १३

चित्तों को अनन्त शान्तिदायक अखण्ड एकरस तत्व भी भयानक
दीखता है। बालक जैसे जंगल में डरता है इसी तरह अखण्ड तत्व
से भी कई लोगों को भय लगता है। परन्तु उनके डरने का कोई
भी उचित कारण नहीं है। जब कोई समाधि करता है और जब
निश्चित हो जाने की गम्भीर अवस्था आती है और तूष्णींभाव
का उदय होता है, तब उस अखण्ड सद्वस्तु का अनुभव साधकों
को स्पष्ट ही होता है। 'उस समय तो कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा
विचार ठीक नहीं है, क्योंकि शून्य (कुछ नहीं) को जानने वाला
जो कोई तत्त्व है उसको 'कुछ भी नहीं' कहना अनुचित है। शून्य
को तो शून्य का ज्ञान होता ही नहीं है। जब हम निर्मनस्क
होते हैं, उस निर्मनस्क अवस्था का जो साक्षी है, वही तत्त्व सत्
पदार्थ है। इस सत् में इस पसारे को फैलाने की जो शक्ति रहती
है, वह न तो असत् ही है, क्योंकि प्रतीत होती है और न सत्
ही है, क्योंकि वह सदा नहीं रहती। उसकी बाधा हो जाती है।
देवदत्त में देवदत्त की शक्ति भी रहती है, परन्तु शक्ति को और
देवदत्त को दो नहीं गिना जाता। ये दोनों मिल कर एक ही गिने
जाते हैं। इसी तरह ब्रह्म और उसकी शक्ति दो तत्व नहीं गिने
जाते। कहने का तात्पर्य यह है शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता
है। जैसे शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता है, ठीक इसी तरह
शक्ति के जो स्थूल कार्य (पृथिव्यादि) हैं उनसे भी द्वैत की शंका
को अवकाश नहीं है। उस शक्ति से, सब से प्रथम आकाश
उत्पन्न हुआ। उसमें जो सत्ता है वह इस सत् से ही आई है। सत्
का ही आकाश बन गया है। 'आकाश की सत्ता' ऐसा कहना
दार्शनिक भूल है। यह सत्ता वायु आदि अगले भूतों में भी गई
है। आकाश उनमें नहीं गया, इसी कारण कहते हैं कि आकाश

१४ पंचदशी
और सत्ता भिन्न भिन्न तत्त्व है । आकाश में से सत्ता को पृथक्
कर लो फिर बताओ आकाश का क्या रूप रह गया है ? सत् से
भिन्न होने के कारण वह तो अब निश्चय ही असत् है। असत् होने
पर भी प्रतीत हो रहा है, यही तो माया का चमत्कार है। आकाश
तो कभी सत् हो ही नहीं सकता और सद्वस्तु में कहीं जरा सा
भी स्थान नहीं है कि उसके अन्दर आकाशादि अन्य पदार्थ समा
सकें। इसीलिये तत्त्वज्ञानी की दृष्टि जब आकाश पर पड़ेगी, तब
वह उसे निस्तत्त्व समझेगा और जब सद्वस्तु पर उसका ध्यान
जायगा तब वह उसे निश्छिद्र किंवा निरन्तर ही समझेगा। यों
प्रत्येक भूत और प्रत्येक भौतिक पदार्थ की असत्ता पर जब
बार बार विचार चलेगा, तब अद्वैत के सत्य होने की बात दृढ़तर
होती जायगी। परन्तु ध्यान रहे कि इस असत्यवासना का
प्रभाव व्यवहार पर कुछ भी नहीं पड़ेगा। वह तो पहले जैसा
ही चलता जायगा। व्यवहार को बन्द कर देने का जो एक वृथा
विचार नवीन साधकों को हो जाता है वह भूल होती है। होना
यह चाहिये कि जो व्यवहार अब तक अपने संकीर्ण दृष्टिकोण
से चल रहा था वही अब व्यापक जगदात्मा के दृष्टिकोण से
चलना चाहिये । इस ज्ञान से पदार्थों का स्वरूप बदल नहीं
जाता है। यह ज्ञान तो केवल हमारे दृष्टिकोण को बदलता है।
ज्ञानी के व्यवहार में अवश्य ही कुछ ऐसा चमत्कार आ जाना
चाहिये कि उसका व्यवहार आकर्षक हो, सदय हो, नमूने का
हो, अनुकरणीय हो, लोकहित में बाधा न डालता हो। ऐसा
जिसका व्यवहार हो वही ज्ञानी है। उस ज्ञानी की जिस परिमाण
से द्वैत की अवज्ञा (अनादर) दृढ़ होगी उसी परिमाण से अद्वैत में
बुद्धि ठहरेगी। यह बुद्धि जब ठहर चुकेगी और संसार समुद्र की