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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७३

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७३
जिसको 'विज्ञानमय' भी कहते हैं अन्दर है । उस विज्ञानमय
से 'भोक्ता' अर्थात् 'आनन्दमय' अन्दर का है । सो यह 'अन्न-
मय' से लेकर 'आनन्दमय' तक की परम्परा ही 'गुहा'
कहाती है । इसी में ब्रह्म लुक छिप गया है । इन पांचों
कोशों का विवेक कर लेने पर फिर भी उस के शुद्ध रूप के
दर्शन मिल ही सकते हैं ।
पितृभुक्तान्नजाद् वीर्याज्जातोऽन्नेनैव वर्धते ।
देहः सोऽन्नमयो नात्मा प्राक् चोर्ध्वं तदभावतः ॥३॥
माता और पिता जिस अन्न को खाते हैं, उस से जो वीर्य
बनता है, उस से यह देह उत्पन्न होता है । उत्पन्न होने के
पश्चात् यह फिर अन्न से ही वृद्धि को पाने लगता है । सो यह
तो स्पष्ट ही अन्न का विकार है । इस कारण यह अन्नमय
देह आत्मा नहीं है । देखते हैं कि जन्म होने से पहले भी यह
देह नहीं था, तथा मरने के पश्चात् भी यह देह नहीं रहेगा ।
[तात्पर्य यह है कि घटपदादि के समान उत्पत्ति वाला होने से
यह देह आत्मा नहीं है]
पूर्वजन्मन्यसन्नेतज्जन्म संपादयेत् कथम् ।
भाविजन्मन्यसत् कर्म न भुञ्जीतेह संचितम् ॥४॥
यदि वह पूर्व जन्म में नहीं था तो इसने इस जन्म को
पाया ही कैसे ? यदि इसका भावि जन्म नहीं होगा तो यहाँ
संचित किये पुण्य पापों को नहीं भोग सकेगा । [ इस कारण
आत्मा को देह से पृथक् और नित्य मानना चाहिये । ]
जब आत्मा को देहरूप ही माना जाता है तब यह स्पष्ट
ही है कि यह पूर्वजन्म में नहीं था और इस जन्म को उत्पन्न

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करने वाला अदृष्ट भी नहीं था । फिर इस जन्म की उत्पत्ति
इस देहरूप आत्मा ने स्वयं कैसे करली ? इस पक्ष में
तो 'अकृताभ्यागम' दोष आता है अर्थात् जो इस शरीरात्मा ने
किया नहीं था उसे अब यह विचारा भोग रहा है । यह देह-
रूप आत्मा तो भाविजन्मों में भी नहीं रहेगा । यह तो यहाँ
ही गाड़ डाला या जला दिया जायगा । तब इस जन्म में
किये भले-बुरे कामों के फल को भोगने वाला कोई न रहेगा ।
सो यह 'कृतविनाश' नाम का महादोष आजायगा । इन दोनों
दोषों के कारण आत्मा को कार्य किंवा उत्पत्ति वाला मानना
ठीक नहीं है ।
पूर्णो देहे बल यच्छन्नक्षाणां यः प्रवर्तकः ।
वायुः प्राणमयो नासावात्मा चैतन्यवर्जनात् ॥५॥
पैर से लेकर मस्तकपर्यन्त देह में पूर्ण होकर [ व्यानरूप से ]
बल किंवा सामर्थ्य को देता हुआ जो वायु, चक्षु आदि इन्द्रियों का
प्रेरक होता है, वह वायु ही 'प्राणमय' कोश कहाता है। चैतन्य
रहित किंवा जड होने के कारण वह भी तो आत्मा नहीं है ।
अहन्तां ममतां देहे गेहादौ च करोति यः ।
कामाद्यवस्थया भ्रान्तो नासावात्मा मनोमयः ॥६॥
देह में 'मैं' भाव और गृहादि में 'मेरेपन का अभिमान'
जो किया करता है वह मनोमय भी आत्मा नहीं है । क्योंकि
वह तो कामादि अवस्थाओं से भ्रान्त हुआ रहता है । [ काम
क्रोध आदि विकारों के कारण उस मनोमय का स्वभाव नियत
नहीं रहता है। वह तो विकारी हुआ रहता है। फिर वह आत्मा
कैसे हो । क्योंकि आत्मा तो निर्विकार तत्व है ।]