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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

द्वैतविवेकप्रकरणम् ९५

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द्वैतविवेकप्रकरणम् ९५
महेश्वर की जो माया है, उस में जैसे जगत् के सर्जन
का सामर्थ्य है, इसी प्रकार उस में मोहन का सामर्थ्य भी
रहता है। उस माया की वह मोहन शक्ति उस विचारे जीव
को मोहित कर देती है। [उस के मोहन प्रभाव में आकर
उसे अपने चिदानन्दादिस्वरूप का ज्ञान ही नहीं रह जाता है।
मोहादनीशतां प्राप्य मग्नो वपुषि शोचति ।
ईशसृष्टमिदं द्वैतं सर्वमुक्तं समासतः ॥१३॥
मोह में फंसकर अनीश बनकर [इष्टकी प्राप्ति में और
अनिष्ट के परित्याग में बेबस (असमर्थ) होकर] शरीर में
ही अहंभाव से डूबकर, शोक किया करता है किंवा [इसकी
टूट फूट और इसकी आवश्यकताओं से] अपने आपको दुःखी
मान बैठता है। यही बात 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति
मुह्यमानः' [मु० ३-२-१] इस श्रुति में कही गयी है। ईश्वर
के बनाये हुए द्वैतको यहाँ तक संक्षेप से कह दिया गया है।
सप्तान्नब्राह्मणे द्वैतं जीवसृष्टं प्रपञ्चितम् ।
अन्नानि सप्त ज्ञानेन कर्मणाऽजनयत् पिता ॥१४॥
'यत् सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पिता' (बृ० १-५-१) इस
श्रुति वाले सप्तान्न ब्राह्मण में जीव के बनाये हुए द्वैत का प्रपंच
किया है कि पिता [अर्थात् अदृष्ट रूपी भाग (अपना हिस्सा)
देकर उसके द्वारा इस जगत् को उत्पन्न करके सकल लोक के
पालने वाले इस जीव] ने ज्ञान और अपने कर्म के द्वारा सात
अन्नों को उत्पन्न किया।
मर्त्यान्नमेकं देवान्ने द्वे पश्वन्नं चतुर्थकम् ।
अन्यत्त्रितयमात्मार्थ मन्नानां विनियोजनम् ॥१५॥

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९६ पञ्चदशी
'एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य
एकं प्रायच्छत्' ( बृ० १-५-२ ) इस वाक्य में उन सातों अन्नों
का विनियोग यों किया गया है कि—उनमें से एक तो मर्त्यान्न
है। दो देवताओं के अन्न हैं। एक पशुओं का अन्न है। शेष
तीन को उसने केवल आत्मा के लिये रख लिया है।
व्रीह्यादिकं दर्शपूर्णमासौ क्षीरं तथा मनः।
वाक् प्राणश्चेति सप्तत्व मन्नाना मवगम्यताम् ॥१६॥
व्रीह्यादिक, दर्श, पूर्णमास, दुग्ध, मन, वाक् तथा प्राण ये
सात अन्न कहाते हैं।
ईशेन यद्यप्येतानि निर्मितानि स्वरूपतः।
तथापि ज्ञानकर्मभ्यां जीवोऽकार्षीत्तदन्नताम् ॥१७॥
ईश्वर ने यद्यपि इनका स्वरूप ही बनाया था। परन्तु
इनका अन्नपन अर्थात् भोग्याकार तो जीव ने ही बना लिया
है। उसने ज्ञान और कर्म के सहारे से इन व्रीही आदि प्राणान्त
पदार्थों को अपना अन्न किंवा भोग्य बना डाला है।
जब उस जीव को देवताध्यान आदि विहित ज्ञान तथा
परस्त्रीध्यानादि प्रतिषिद्ध ज्ञान होता है, जब यह जीव यज्ञादि
विहित कर्म और हिंसा आदि प्रतिषिद्ध कर्म कर बैठता है तब
ईश्वर की बनाई ये सब वस्तुयें उसके भोग के साधन बन जाती
हैं। फिर ये चीजें भोग्य बन कर उसके काम में आने लगती
हैं। यदि उस जीव को वैसा ज्ञान न हो और उस ज्ञान से वह
जीव वैसे-वैसे कर्म न करे तो ये वस्तुयें उसकी भोग्य किंवा
उस के अन्न कदापि न बनें। इसी से कहा गया है कि
ईश्वर ने तो इनका केवल स्वरूप ही बनाया था। अपने