पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२५
रक्खेंगे तो मोक्ष आदि में अन्वयी कौन होगा ? अर्थात् इन
मोक्षादि को भोगने वाला कौन होगा ? क्योंकि आभास तो
यहीं नष्ट हो जाता है ।]
अधिष्ठानांशसंयुक्तं भ्रमांशमवलम्बते ।
यदा तदाहं संसारीत्येवं जीवोऽभिमन्यते ॥७॥
वह जीव जब तो अधिष्ठानांशसंयुक्त [ अर्थात् कूटस्थ
सहित ] भ्रम भाग [ किंवा चिदाभासयुक्त दोनों शरीरों ] का
अवलम्ब ले लेता है—अथवा यों कहो कि उन दोनों शरीरों
को ही अपना स्वरूप मान लेता है—तब वह समझने लग
पड़ता है कि मैं तो संसारी [क्षुद्र प्राणी] हूँ ।
भ्रमांशस्य तिरस्कारा दधिष्ठानप्रधानता ।
यदा तदा चिदात्माहमसङ्गोऽस्मीति बुध्यते ॥८॥
जब तो वही जीव भ्रमांश [ दोनों देहों सहित चिदाभास ]
का तिरस्कार कर देता है—उनको मिथ्या समझ कर उनकी
परवाह नहीं करता है और ऐसा करने से जब अधिष्ठान की
प्रधानता हो जाती है [ जब वह जीव अधिष्ठानभूत कूटस्थ
स्वरूप ही हो जाता है, जब वह शुद्ध आत्मस्थिति में आ जाता
है ] तब वह जाना करता है कि ओ हो ! 'मैं तो चिदात्मा
हूँ 'मैं तो असङ्ग हूँ ।'
नासङ्गेऽहंकृतियुक्ता कथमस्मीति चेच्छृणु ।
एको मुख्यो द्वावमुख्यौ वित्यर्थस्त्रिविधोऽहमः ॥९॥
जब कि असङ्ग चिदात्मा में [ जो कि अविषय है ] अह-
ङ्कार अथवा मैं भाव का होना ठीक ही नहीं है,तो फिर वह यह
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२२६ पञ्चदशी
[Main Text]
क्यों कर जान सकता है कि 'मैं असङ्ग हूँ' ? इसका समाधान
भी सुनो कि—अहं के तीन अर्थ हैं—एक मुख्य अर्थ है, तथा
दो उसके अमुख्य अर्थ होते हैं। [भाव यह है कि मुख्यरूप
से तो अहं प्रतीति का विषय आत्मा हो ही नहीं सकता, परन्तु
लक्षणा से उसको 'अहं' कहा ही जा सकता है।]
अन्योन्याध्यासरूपेण कूटस्थाभासयोर्वपुः ।
एकीभूय भवेन्मुख्यस्तत्र मूढैः प्रयुज्यते ॥१०॥
कूटस्थ और आभास इन दोनों का स्वरूप अन्योन्याध्यास
की आँच में पिघल कर जब एकता को प्राप्त कर लेता है तब
बस यही अहं शब्द का 'मुख्य अर्थ' कहाता है। [इसको इस
अहं का मुख्य अर्थ इसी लिये कहते हैं कि कूटस्थ और चिदा-
भास के इसी हिले मिले स्वरूप का जिनको विवेक नहीं है
वे सभी ] मूढ लोग अहं शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया
करते हैं। [अधिक संख्या इसी अर्थ में अहं शब्द का प्रयोग
करने वालों की है। इसलिये इसे ही मुख्य मान लिया है]
पृथगाभासकूटस्था वमुख्यौ तत्र तत्ववित् ।
पर्यायेण प्रयुङ्क्तेऽहंशब्दं लोके च वैदिके ॥११॥
जब तो यह समझ लिया जाय कि आभास अलग है और
कूटस्थ तत्व अलग है, तब [ अलगाये हुए ] वे दोनों अहं के
अमुख्य अर्थ हो जाते हैं। क्योंकि तत्वज्ञानी लोग लौकिक
और वैदिक व्यवहारों में कभी तो कूटस्थ को अहं कहते हैं
और कभी अकेले चिदाभास को अहं कह देते हैं। [भाव यह
है कि—क्योंकि कूटस्थ और चिदाभास का जो मिश्रित रूप है
वही सार्वजनीन व्यवहार का विषय हो रहा है। इससे उसे तो