पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१४६ पञ्चदशी
हैं। यदि वे श्रुति के तात्पर्य का विचार करते तो इस भ्रान्ति-
सिद्ध एकता को पहचान जाते । ]
पूर्वापरपरामर्शविकलास्तत्र केचन ।
वाक्याभासान् स्वस्वपक्षे योजयन्त्यप्यलज्जया ॥५९॥
उन्हीं लोगों में से कुछ लोग पूर्वापर का विचार तक
नहीं करते हैं और निर्लज्ज होकर श्रुति के वाक्याभासों को
अपने अपने पक्ष में लगाया भी करते हैं।
कूटस्थादिशरीरान्तसंघातस्यात्मतां जगुः।
लोकायताः पामराश्च प्रत्यक्षाभासमाश्रिताः ॥६०॥
प्रत्यक्षाभास का आश्रय लिये हुए लोकायतों ने तथा पामर
[ महामूर्ख ] लोगों ने, कूटस्थ से लेकर शरीर पर्यन्त अनेक
पदार्थों के इस संघात [जमघट] को ही आत्मा कह डाला है।
श्रौतीकर्तुं स्वपक्षं ते कोशमन्नमयं तथा ।
विरोचनस्य सिद्धान्तं प्रमाणं प्रतिजज्ञिरे ॥६१॥
उन्होंने अपने पक्ष पर श्रुति की मोहर लगाने के लिये,
अन्नमय कोश का प्रतिपादन करनेवाले 'स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः'
इस वाक्य का उद्धरण किया है। तथा विरोचन के 'आत्मैव
देहमयः' इस सिद्धान्त को प्रमाण मान लिया है [परन्तु प्रकरण-
विरोध के कारण ऐसा उपपादन करने का सामर्थ्य उनमें नहीं है]।
जीवात्मनिर्गमे देहमरणस्यात्र दर्शनात् ।
देहातिरिक्त एवात्मेत्याहुर्लोकायताः परे ॥६२॥
जीवात्मा जब निकल जाता है तब यह देह मर जाता है।
इस कारण आत्मा देह से भिन्न है, यह बात दूसरे लोकायत
मानते हैं।