पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextचितिमत्त्वाच्चेतनोऽयमिच्छाद्वेषप्रयत्नवान् ।
स्याद्धर्माधर्मयोः कर्ता भोक्ता दुःखादिमत्त्वतः ॥९१॥
चिति नामक गुणवाला होने से यह चेतन है [ यों स्वयं
अचिद्रूप होने पर भी इसको चेतन मान लिया जाता है ]
चेतन होने का एक और भी प्रमाण है कि इसमें इच्छा, द्वेष
तथा प्रयत्न नाम के गुण विद्यमान हैं। यह आत्मा धर्माधर्म
का कर्ता है। दुःखादिवाला होने से इसे भोक्ता माना जाता है
[ यों उसमें ईश्वर तत्व से विलक्षणता पायी जाती है। ]
यथात्र कर्मवशतः कादाचित्कं सुखादिकम् ।
तथा लोकान्तरे देहे कर्मणेच्छादि जन्यते ॥९२॥
जैसे कर्म के वश यहाँ ( इस लोक में ) कभी कभी होने
वाले सुखादि होते हैं, इसी प्रकार लोकान्तर में [ मिले हुए ]
दूसरे देह में भी, कर्म से ही इच्छादि हो जाते हैं।
विभु होने पर आत्मा लोकान्तर गमन आदि कैसे करेगा ?
इसका समाधान यह है कि—जैसे इस देह में कर्म के वश
इच्छा आदि उत्पन्न होते हैं तो इसे यहाँ आत्मा का रहना मान
लिया जाता है, इसी प्रकार कर्म के वश जब लोकान्तर में
देहान्तर मिलता है तब उस देहावच्छिन्न आत्मा के प्रदेश में
ही सुखादि उत्पन्न होने लगते हैं और वहाँ आत्मा का गमनादि
मान लिया जाता है। वस्तुतः आत्मा में गमनादि कुछ
नहीं होता।
एवं च सर्वगस्यापि संभवेतां गमागमौ ।
कर्मकाण्डः समग्रोऽत्र प्रमाणमिति तेऽवदन् ॥९३॥
इस प्रकार सर्वग [ सर्वत्र व्यापक ] आत्मा का भी आना