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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७९

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७९
मा न भूवमहं किन्तु भूयासं सर्वदेत्यसौ ।
आशीः सर्वस्य दृष्टेति प्रत्यक्षा प्रीतिरात्मनि ॥३१॥
अपने अनुभव से भी पूछ लो कि—'मेरा कभी भी असत्त्व
न हो । किन्तु मैं सदा ही बना रहूँ' ऐसी प्रार्थना सभी प्राणी
करते पाये जाते हैं। जब कि सभी ऐसी प्रार्थना करते हैं तब
आत्मा में प्रत्यक्ष ही निरतिशय प्रीति सिद्ध हो जाती है ।
इत्यादिभिस्त्रिभिः प्रीतौ सिद्धायामेवमात्मनि ।
पुत्रभार्यादिशेषत्वमात्मनः कैश्चिदीरितम् ॥३२॥
यों अनुभव युक्ति और श्रुति इन तीनों प्रमाणों से प्रथम
कही हुई रीति से, यद्यपि आत्मा में निरतिशय प्रेम सिद्ध हो
चुका है, तो भी श्रुत्यादि के रहस्यों को न समझने वाले कोई
कोई पुरुष आत्मा को भी पुत्रभार्यादि का शेष किंवा उपकारक
कहते हैं ।
एतद्विवक्षया पुत्रे मुख्यात्मत्वं श्रुतीरितम् ।
आत्मा वै पुत्रनामेति तच्चोपनिषदि स्फुटम् ॥३३॥
वे कहते हैं कि—'आत्मा वै पुत्रनामासि' इत्यादि श्रुति में इसी
भाव से पुत्र को मुख्य आत्मा कहा है । पुत्र के मुख्य आत्मा
होने की बात ऐतरेय आदि उपनिषदों में भी स्पष्ट कही गयी है ।
सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मेभ्यः प्रतिधीयते ।
अथास्येतर आत्मायं कृतकृत्यः प्रमीयते ॥३४॥
उनमें कहा गया है कि—इस पिता का यही वह पुत्ररूप
आत्मा [जो पुरुष के देह में गर्भरूप से रहता है, जिसको बड़े
प्रेम से पालनीय कहा जाता है] पुण्य कर्मों के करने के लिए,
अपना प्रतिनिधि बना कर, छोड़ा जाता है । उसके पश्चात् इस

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पिता का यह पितृरूप आत्मा अपने आप तो कृतकृत्य होकर
मर जाता है।
सत्यप्यात्मनि लोकोस्ति नापुत्रस्यात एव हि।
अनुशिष्टं पुत्रमेव लोक्यमाहुर्मनीषिणः ॥३५॥
'नापुत्रस्य लोकोस्ति' इस वाक्य में कहा गया है कि—
आत्मा के होने पर भी अगर पुत्र नहीं है, तो पिता को पर-
लोक नहीं मिलता। मनीषी लोग शिक्षित पुत्र को ही लोक्य
[अर्थात् परलोक का साधन] बताते हैं।
मनुष्यलोको जय्यः स्यात् पुत्रेणैवेतरेण नो।
मुमूर्षुमंन्त्रयेत् पुत्रं त्वं ब्रह्मेत्यादिमन्त्रकैः ॥३६॥
'सोयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा' (बृ० १-५-१६)
इस वाक्य में कहा गया है कि मनुष्यलोक का सुख तो केवल
पुत्र स हो सम्पादित हो सकता है। कर्म आदि दूसरे किसी
साधन से मनुष्यलोक के सुख का उपार्जन नहीं हो सकता।
[देखते हैं कि जिसके पुत्र नहीं होता उसको सुख के साधन
धन सम्पत्ति को देख देख कर भी निर्वेदं हुआ करता है]
मुमूर्षु पिता को चाहिए कि मरते समय 'त्वं ब्रह्म' इत्यादि तीन
मन्त्रों के द्वारा पुत्र का अनुशासन करे।
इत्यादिश्रुतयः प्राहुः पुत्रभार्यादिशेषताम् ।
लौकिका अपि पुत्रस्य प्राधान्यमनुमन्वते ॥३७॥
इत्यादि पूर्वोक्त श्रुतियों ने आत्मा को पुत्र भार्या आदि का
शेष कहा है। इसके अतिरिक्त लौकिक लोग भी पुत्र की प्रधा-
नता को मानते ही हैं।