पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
12. Atmananda
[ १२ ]
ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप
योगी लोग तो योग के द्वारा निजानन्द को पा ही लेंगे, पर
जिनकी योग में गति नहीं है वे इस आत्मानन्द को कैसे जानें ?
इसी प्रश्न का उत्तर यह है कि हम चाहे जितनी उदारता दिखायें
सर्वसाधारण तो इस गहन बात को समझ ही नहीं सकेंगे । इस
मार्ग द्वारा उनका तिल भर भी उपकार नहीं हो सकेगा । वे जिस
प्रवृत्ति मार्ग में लगे हैं उनके लिए वही ठीक है । प्रवृत्ति मार्ग की
दुःखपरम्परा से ही तो आत्मजिज्ञासा जागा करती है । संसारनदी
के प्रवाह को रोक कर खड़ी हो जाने वाली बाधायें जब तक
किसी के सामने आकर खड़ी नहीं हो जातीं तब तक किसी के
भी हटाने से प्रवृत्ति मार्ग छोड़ा नहीं जाता । यह तो अपने अनु-
भव से ही शिक्षा मिलने पर छूटता है और तब निवृत्ति आकर ज्ञान
की उत्पत्ति कर देती है । प्रवृत्ति से जिज्ञासा होती है और निवृत्ति
से ज्ञान हो जाता है । यों आप उन प्रवृत्तिमार्गियों को व्यर्थ फँसा
हुआ मत समझो । इस संसार नाम की पाठशाला में सभी अपनी
अपनी शक्ति के अनुसार शिक्षण ले रहे हैं । इसमें जल्दी का
प्रश्न थोड़ा सा भी नहीं है । उन्हें तो उनके अधिकार के अनुसार
कर्म या उपासना में ही लगा देना श्रेयस्कर होगा । हर किसी
को आत्मानन्द की बात बताना ठीक नहीं है । आवश्यकता से
पहले दी हुई चीज़ से लाभ के स्थान में हानि होती है । हां,
ब्रह्मानन्दन्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०३
जो तो मन्दप्रज्ञ जिज्ञासु हों उनको निम्न रीति से आत्मानन्द का
बोध करा देना चाहिए। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी इसी श्रेणी
की थी। याज्ञवल्क्य ने उसे जिस रीति से समझाया था उस ही
रीति से उसको भी समझा देना पर्याप्त होगा। याज्ञवल्क्य ने कहा
था कि—अरे मैत्रेयी ! अपने जी से ही पूछ लो—तुमको स्वयं
पति के लिए तो पति प्रिय नहीं होता है। पति, पत्नी, पुत्र, वित्त,
पशु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देव, वेद, भूत, और सभी कुछ
अपने मतलब से ही तो प्रिय हो जाते हैं। इनमें से एक भी तो
पदार्थ स्वरूप से प्यारा नहीं है। जितनी भी प्रीतियां हैं वे सब
एकपक्षीय [एकतर्फ़ा] होती हैं—जब किसी पत्नी को भोग की
इच्छा होती है तब ही वह अपने पति से प्यार करने लगती है।
परन्तु उसका पति भूखा हो, किसी काम में लगा हो, रोगग्रस्त
हो, तो वह उसे नहीं चाहता। तब उसे प्रेम का उत्तर नहीं
मिलता। ऐसी अवस्था में तो पत्नी का प्रेम एकपक्षीय सिद्ध होता
है। उसका यह प्रेम, पति के लिए है ही नहीं। यह तो स्वार्थ
के लिए ही है। यदि उसका यह प्रेम पति के लिए होता तो
पति किसी भी अवस्था में होकर उस प्रेम का अभिनन्दन [स्वागत]
करता। उधर पति का भी यही हाल होता है—वह भी जब
अपनी पत्नी से प्रेमालाप करता है तब अपने ही मतलब से करता
है। उसका प्रेम भी पत्नी के निमित्त नहीं होता। जब तो दोनों
ओर से एक साथ ही प्रेम उमड़ पड़ा हो, तब भी यही उपर्युक्त
विश्लेषण काम दे सकता है। दोनों ही प्रेमी अपनी इच्छा को
लेकर प्रवृत्त हुआ करते हैं। देखा जाता है कि—दाढ़ी मूँछ की
कीलें चुभ रही हैं, बालक रो रहा है, तौ भी प्रेमी पिता बालक
को चूमता ही जाता है। उसके चिल्लाने पर भी उसे छोड़ना
१०४ पञ्चदशी
नहीं चाहता। क्या कोई भी इस प्रेम को बालक के लिए किया
हुआ प्रेम कह सकेगा ? पिता का यह प्रेम स्पष्ट ही एकपक्षीय
प्रेम है। यह तो अपनी तुष्टि के लिए ही किया गया है। जिस जड
रत्न को कुछ भी इच्छा नहीं है, उसकी जब यत्न से रक्षा की जाती
है तब इस प्रेम को भी तो स्वार्थ ही समझ लो। क्या कोई इस
प्रेम को रत्नार्थ प्रेम कह सकता है ? बैल नहीं चाहता कि मैं
बोझ ढोऊँ। हमने उसे ज़बरदस्ती इस काम के लिए क़ैद कर
रक्खा है। उस बैल पर हम प्रेम करते हैं। क्या इस प्रेम को
कोई बैल के लिए किया हुआ प्रेम कह सकेगा। यह प्रेम तो
स्पष्ट ही हमारे लिए है। ब्राह्मणत्वमूलक पूजा से जब हमें प्रसन्नता
होती है तब यह सन्तुष्टि ब्राह्मण जाति की नहीं स्वयं अपनी ही
होती है। जब हम स्वर्ग या ब्रह्मलोक को पाना चाहते हैं तब
हमारा उद्देश्य इन लोकों का उपकार करना नहीं होता। किन्तु
अपना भोग ही उसका लक्ष्य होता है। हम विष्णु आदि देवताओं
की पूजा अपने पापनाश के लिए करते हैं। निष्पाप देवताओं को
तो उसकी कुछ दर्कार ही नहीं होती। यह तो स्वार्थ के लिए ही
की जाती है। 'हम व्रात्य् न हो जायँ' इसी उद्देश्य से तो हम
वेदों को पढ़ते हैं, वेद तो व्रात्य हो ही नहीं सकते । स्थान,
तृषा, पाक, शोषण और अवकाश की आवश्यकता होती है
इसी से तो हम पांचों भूतों को चाहते हैं। यहाँ भी हमारा स्वार्थ
(मतलब) ही मुख्य होता है। कहाँ तक कहते जायें, सभी कुछ
अपने मतलब से प्रिय होता है। जब सब कामों में अपनी ही
प्रधानता है तब यह हमारा स्पष्ट कर्त्तव्य हो जाता है कि हम
अपने आपे के बारे में ही बुद्धि को दृढ़ कर डालें।
अब प्रश्न होता है कि—यह उपर्युक्त आत्मप्रेम कैसा है ?
ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०५
यह राग तो है नहीं, वह तो स्त्री आदि नियत विषयों में ही
होता है । वह श्रद्धा भी नहीं है, वह तो यागादि में ही परिमित
रहती है । वह भक्ति भी नहीं है, भक्ति तो गुरु देवादि तक ही
चलती है । वह इच्छा भी नहीं है, इच्छा तो अप्राप्त पदार्थ की
ही होती है ? इसका समाधान यह है कि—वह आत्मप्रेम तो
एक प्रकार की केवल सुख ही को विषय करने वाली सात्विक
वृत्ति ही है । उस प्रेम को तो सत्वगुण से बनी हुई केवल सुख
के साथ नथी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो । इस प्रीति
को इच्छा नहीं कह सकते, क्योंकि प्राप्त, नष्ट और अप्राप्त तीनों
ही विषय में यह रहती है । इच्छा तो केवल अप्राप्त की ही रहती
है । अन्नपान आदि हमारे सुख के साधन हैं, इसलिए जैसे वे
प्रिय हैं, आत्मा को भी यदि इस प्रकार से सुख का साधन होने
से ही प्रिय मानोगे, तो यह बताना पड़ेगा, कि यह आत्मा किस
के सुख का साधन है ? इस आत्मा से किसको खुश करना है ?
आत्मा स्वयं ही आत्मा को प्रसन्न करे, इसमें अपने कन्धे पर
चढ़ बैठने वाला 'कर्मकर्तृविरोध' आता है । विषयजन्य जितने
भी सुख हैं उनमें तो साधारण सी प्रीति प्राणी को होती है, परन्तु
आत्मा तो अतिप्रिय होता है । यह प्रीति विषयसुख में कभी
कभी नहीं भी रहती—कभी कभी विषयसुख को छोड़ कर चली
भी जाती है—परन्तु आत्मा में प्रीति न रहे यह तो कभी हो ही
नहीं सकता । प्राणी का स्वभाव है कि वह एक विषयसुख से
प्रेम करना छोड़ देता है दूसरे विषयसुख से नेह का नाता जोड़
लेता है । परन्तु यह आत्मतत्त्व तो छोड़ा या पकड़ा जाने वाला
ही नहीं है । फिर उसमें प्रेम का व्यभिचार कैसे हो ? लेना या
छोड़ना जिसमें नहीं है, उसकी कोई उपेक्षा ही कैसे कर सकेगा ?
१०६ पंचदशी
वह तो उपेक्षा करने वाले का स्वरूप ही है। इस कारण आत्मा
उपेक्ष्य कभी नहीं हो सकता। रोग या क्रोध से दुःखी होकर
जो प्राणी मरना चाहते हैं, वे भी इस देह को ही छोड़ना चाहा
करते हैं, आत्मा को छोड़ देना तो उनके बस की बात नहीं
होती। हम सब किसी से प्रेम तभी तो करते हैं जब उसे निश्चित
रूप से आत्मार्थ समझ लेते हैं। परन्तु आत्मप्रेम करते समय
ऐसा कोई विचार होना संभव ही नहीं है। यहाँ तो यह प्रश्न
ही नहीं उठता। वह तो एक स्वाभाविक प्रेम ही है, यह बात
यहाँ तक सिद्ध हो चुकी। लोक में भी देखते हैं कि पिता को
पुत्र के मित्र से पुत्र ही अधिक प्यारा लगता है। इस प्रकार जो
सब पदार्थ केवल अपने सम्बन्धी हो जाने के कारण ही प्रेम के
पात्र बन गये हैं, उन सब की अपेक्षा से यह आत्मा ही अत्यन्त
प्रिय होता है। आइये इस विषय में अपने अनुभव की भी साक्षी
ले लें कि वह क्या कहता है—प्रत्येक प्राणी अपने को सदा
यही अशीष देता है कि 'भगवान् करे मैं सदा ही बना रहूँ।'
इस अनुभव से भी आत्मा में निरतिशय प्रेम सिद्ध होता है।
यों आत्मप्रेम के सर्वाधिक प्रेम सिद्ध हो जाने पर भी, बहुत
से अभागे लोग आत्मा को ही पुत्रादि का शेष [ अंग ] मान बैठे
हैं। इस विषय में वे बहुत से प्रमाणाभास देते हैं। वे यह भी
कहते हैं कि तभी तो प्रत्येक मनुष्य ऐसा प्रबन्ध किया करता है
कि जिससे उसके मर जाने पर भी उसके पुत्रादि सुभीते से
जीवन निर्वाह कर सकें। परन्तु इतने मात्र से यह आत्मा किसी
का अंग सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसे लोगों को यह मालूम हो
जाना चाहिए कि—आत्मा तीन तरह का होता है—एक गौण
आत्मा, दूसरा मिथ्या आत्मा, तीसरा मुख्य आत्मा। पुत्रादि तो
ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०७
ऐसे ही आत्मा हैं, जैसे देवदत्त को कोई शेर कह दे और वह
शेर कहाने लग पड़ा हो। क्योंकि उनका भेद तो प्रत्यक्ष ही
भास रहा है। इस कारण पुत्रादि को 'गौण आत्मा' मानना
चाहिए। साक्षी और पांच कोश अलग अलग हैं ही, परन्तु यह
भेद हर किसी को मालूम नहीं है। जैसे ठूंठ का ही मिथ्या चोर
हो जाता है ऐसे ही ये कोश 'मिथ्या आत्मा' बन गये हैं। अब
तीसरे आत्मा को भी सुन लीजिए- साक्षी का भेद है भी नहीं
और भासता भी नहीं। क्योंकि वह साक्षी सर्वान्तर है। वही साक्षी
'मुख्य आत्मा' कहाता है। यहाँ तक आपको यह तो स्पष्ट
मालूम हो ही गया कि- तीन तरह का आत्मा होता है। अब
इतना और जान लीजिए कि जिस व्यवहार में इन तीनों में से
जिसका आत्मा होना ठीक जंच पड़े, उस प्रसंग के लिए उसी
को मुख्य आत्मा मान लो। शेष को उसका अंग मान लो।
जो मरने लगा है, उसे घर की रक्षा के लिए तो गौण आत्मा
[पुत्रादि] ही चाहिए। क्योंकि मिथ्या आत्मा [शरीर] तो मरने
ही लगा है तथा मुख्य आत्मा [साक्षी] इन बखेड़ों में पड़ता ही
नहीं है। इस कारण मरते समय पुत्रादि ही मुख्य आत्मा
माने जाते हैं। जब कोई कमजोर होकर पुष्टिकर अन्न खाना
चाहता है, तब उसे देहात्मा को ही खिलाना होगा ! वह पुष्टि-
कारक अन्न पुत्र को खिला बैठेगा तो पुष्टि कैसे होगी ? तथा
मुख्यात्मा कुछ खायेगा ही नहीं। ऐसे स्थलों में 'मिथ्या आत्मा'-
यह देह- ही मुख्य आत्मा हो सकता है। जब कोई शरीर को
सुखाने वाला घोर तप करता है तब वह लोकान्तर में जाने वाले
विज्ञानमय को आत्मा मान रहा है। जब तो कोई मुक्ति चाहता
है तब चैतन्य ही आत्मा होना चाहिए। कहने का तात्पर्य यही
१०८ पंचदशी
है कि—जिस जिस व्यवहार में जो जो आत्मा उचित होता है
उस उस व्यवहार में उसी उस आत्मा में सर्वाधिक प्रेम हो जाता
है। जो पदार्थ तो आत्मा भी नहीं होता और आत्मा का अंग भी
नहीं होता, उसमें किसी भी तरह का प्रेम नहीं होता। ऐसी चीजें
दो तरह की पायी जाती हैं—एक 'उपेक्ष्य' जैसे मार्ग में पड़े हुए
तिनके आदि। दूसरे 'द्वेष्य' जैसे व्याघ्र या सर्प आदि। ये सब मिल
कर संसार के पदार्थों की चार मुख्य श्रेणियां हो गयीं। (एक)
आत्मा (दूसरी) उसका शेष [अंग-सहायक] तीसरी) उपेक्ष्य और
(चौथी) द्वेष्य। इन चारों में यह नियम नहीं किया जा सकता कि
अमुक पदार्थ 'उपेक्ष्य' ही रहेगा या यह 'द्वेष्य' ही रहेगा। प्रसंगा-
नुसार इनमें परिवर्तन भी हो जाता है—'उपेक्ष्य' पदार्थ 'द्वेष्य' या
शेष हो जाते हैं—'द्वेष्य' पदार्थ 'उपेक्ष्य' या 'शेष' हो जाते हैं।
लोक में भी देख लो कि वही डरावना व्याघ्र जंगल में सामने से
आता मिले तो 'द्वेष्य', परे को जाता दीखे तो 'उपेक्ष्य', सिखा पढ़ा
लें तो अनुकूल होकर विनोद की चीज बन कर 'शेष' हो जाता है।
इन सब की व्यवस्था कि 'कौन सा द्वेष्य है तथा कौन सा उपेक्ष्य
है' केवल लक्षण मिला कर ही करनी पड़ती है। जिसमें जब जो
लक्षण मिले उसे तब वही मान लो। जो जब अनुकूल हो उसे
तब 'शेष' समझो। जो जब प्रतिकूल हो पड़े उसे तब 'प्रतिकूल'
मानो। जो जब अनुकूल या प्रतिकूल कुछ भी न हो उसे तब
'उपेक्ष्य' कह लो। अब संक्षेप यों समझो कि आत्मा 'प्रेयान्'
[अत्यधिक प्रिय] है, उपकारक पदार्थ 'प्रिय' होते हैं, शेष रहे पदार्थ
या तो 'द्वेष्य' होते हैं या फिर 'उपेक्ष्य' हो जाते हैं। इन चार
विभागों के कारण ही लोक की व्यवस्था चल रही है।
यह तो लौकिक दृष्टि से विचार करने का परिणाम हुआ। अब
चीर कर अन्दर की रसमयी वस्तु से विवेक की आंखें भिड़ा देने को
ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०९
ज़रा श्रौती विचार दृष्टि से देखें तो प्रतीत होता है कि सच्चा आत्मा
तो यह साक्षी ही है। उससे भिन्न और कुछ भी आत्मा नहीं है।
पांचों कोशों को नारियल के छिलके की तरह ज्ञान के चाकू से
चीर कर अन्दर की रसमयी वस्तु से विवेक की आंखें भिड़ा देने को
ही तो हम श्रौती विचार दृष्टि कह रहे हैं। 'जागरण' 'स्वप्न' और
'सुषुप्ति' ये तीनों अवस्थायें आती हैं और चली जाती हैं, यह बात
हमको जिस तत्व के सहारे से पता चलती है, वही स्वयं प्रकाश
चेतन पदार्थ आत्मा है। शेष तो प्राण से लेकर धनपर्यन्त पदार्थ
न्यूनाधिक भाव से उसके आस पास लगे रहते हैं। उसी न्यूनाधिक
भाव के लिहाज़ से उनमें न्यूनाधिक प्रेम हो जाता है। देखते हैं
कि—धन से तो पुत्र, पुत्र से शरीर, शरीर से इन्द्रिय, इन्द्रिय से
प्राण, और प्राण से आत्मा अधिक प्रिय होता है। तत्वज्ञानी को
तो इस स्थिति का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। परन्तु मूर्ख लोग समझते
हैं कि प्रियतम तो पुत्रादि ही हैं, हम तो केवल उन को भोगने के
लिये ही बने हैं। इस आत्मा को छोड़कर किसी अन्य पदार्थ को
जो प्रिय कहने लगा है, उसे समझाना चाहिये कि—तू जिस चीज़
को प्रिय समझेगा वही तो तुझे संसार में बांध रखने का खूंटा बन
जायगी। तू पुत्र को प्रिय समझता है तो देख उसके साथ तुझे
कितने अनिष्ट प्रसंग देखने पड़ेंगे—जब वह उत्पन्न न होगा
तब तुझे दुःख होगा। जब गर्भपात होगा तब भी तुझे
बड़ा कष्ट पहुँचायेगा, जब प्रसव होगा तो अनन्त प्रसववेदना
होगी, फिर रोगी होगा, मूर्ख रह जायगा, विवाह न हो सकेगा,
परस्त्रीगमन करने लगेगा, निःसन्तान होगा, सन्तान वाला होकर
भी दरिद्र होगा, धनी होकर भी मर जायगा, यों तुम्हारे क्लेशों का
अन्त कभी भी नहीं हो सकेगा। इस कारण अपने से भिन्न किसी
११० पंचदशी
को प्रिय मानना ही छोड़ दो और यह निश्चय कर लो कि परम
प्रीति तो अपने आत्मा में ही होती है। ऐसा निश्चय करके दिन
रात इसी आत्मप्रेम की ओर को देखते रहो। जो तो किसी प्रकार
के आग्रह में आकर इस पक्ष को न छोड़ेगा, उसे अनेक योनियों
में घूम घूम कर इस का प्रायश्चित करना पड़ेगा। जो तो आत्मा
को ही निरतिशय प्रेम का पात्र समझ कर सदा आत्मा की ही
सेवा में लगा रहता है, उसके प्रिय आत्मा के नष्ट होने का प्रसंग
कभी भी नहीं आता। यहां तक सिद्ध हो चुका कि परम-प्रेम का
स्थान होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है। देखा जाता है कि—
ज्यों ज्यों प्रीति बढ़ती जाती है त्यों त्यों सुख भी बढ़ता जाता है।
राजा को अपने उपकरणों में अधिक प्रेम होता है तो उसे सुख
भी अधिक ही मिलता है।
अब एक विचार उठता है कि—यदि चैतन्य की तरह सुख
भी इस आत्मा का स्वभाव होता तो वह भी सब बुद्धिवृत्तियों में
आना ही चाहिए था। इसका समाधान यह है कि सब स्वभावों
का आना आवश्यक नहीं होता। देखते हैं कि दीपक उष्ण और
प्रकाश दो रूप का होता है, उसकी प्रभा जब किसी मकान में
फैलती है तब उसकी उष्णता नहीं फैलती। इसी प्रकार चैतन्य की
ही अनुवृत्ति होती है सुख की नहीं होती। एक विचार यह भी
है कि—जैसे एक पदार्थ में गन्ध, रूप,रस और स्पर्श सभी होते
हैं, परन्तु एक एक इन्द्रिय इन में से एक एक को ही ग्रहण कर
सकती है, सब को नहीं, इसी प्रकार चैतन्य और आनन्द दोनों
की ही अनुवृत्ति होती तो है, परन्तु अशुद्ध मन से केवल चैतन्य
का ही भास होता है, आनन्द का नहीं होता। सात्विकवृत्ति बड़ी
निर्मल होती है, इस कारण उसमें चैतन्य और सुख दोनों ही
ब्रह्मानन्दन्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १११
प्रतीत हो जाते हैं परन्तु तब ये दोनों एक ही पदार्थ दीखते हैं ।
रजोवृत्तियों के मलिन होने के कारण, इनमें सुख भाग के दर्शन
नहीं हो पाते । लोक में देखते हैं कि इमली का फल बहुत खट्टा
होता है, परन्तु नमक मिलाने पर उसकी खटाई छिप जाती है
इसी तरह रजोवृत्तियों के मिश्रण से आनन्द छिप जाता है ।
अब एक बड़ा गम्भीर प्रश्न यह होता है कि यों प्रियतम
होने के कारण आत्मा की परमानन्दरूपता जान भी ली जाय तो
भी ऐसे थोथे 'विवेक' से क्या होगा ? मुक्ति का साधन-योग जब
तक न किया जायगा, तब तक अपरोक्ष ज्ञान कैसे हो सकेगा ?
इस का उत्तर यही है कि—जो फल 'योग' से मिलना है वही
फल इस 'विवेक' से भी मिल जायगा । गीता में तो स्पष्ट ही कहा
है कि—'सांख्यमार्गी' को जो स्थान मिलता है 'योगी' भी उसे
ही पाते हैं । जानने योग्य बात इस प्रसंग में इतनी ही है कि
किसी के लिए योग मार्ग से चलना असाध्य होता है और किसी
को ज्ञान का निश्चय होना असम्भव हो जाता है । मनुष्य स्वभाव
की इन कमजोरियों को जानने वाले परमेश्वर ने इसीलिए 'योग'
और 'सांख्य' [ विवेक ] नाम के दो मार्ग कह दिये हैं । 'योगी'
और 'विवेकी' दोनों को ही एक समान ज्ञान हो जाता है । दोनों
एक समान ही रागद्वेष से हीन होते हैं । देह के प्रतिकूल पदार्थों
से द्वेष भी दोनों को समान ही होता है । व्यवहार काल में द्वैत
का भान जैसे 'योगी' को होता है, वैसे ही 'विवेकी' को भी हुआ
करता है । समाधि करते समय 'योगी' को द्वैत का भान जैसे
नहीं होता वैसे ही जब 'विवेकी' अद्वैततत्व का विवेक करने
बैठता है तब उसे भी द्वैत का भान नहीं होता । जो सदा आत्मा-
नन्द को देखने लगा है, जिसे द्वैत का दीखना ही बन्द हो चुका
कि अन्त में जाकर तो 'योग' और 'विवेक' एक ही हो जाते हैं।
११२ पञ्चदशी
है, वह तो एक प्रकार से 'योगी' ही है, ऐसा यदि कोई समझे
तो वह भी ठीक ही समझ रहा है। पहले ही कहा जा चुका है
कि अन्त में जाकर तो 'योग' और 'विवेक' एक ही हो जाते हैं।
यों मन्दाधिकारियों पर अनुग्रह करने के लिए आत्मानन्द का
विवेक इस प्रकरण में किया है।