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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 168 of 726

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Page 168

१५० पञ्चदशी
विज्ञानमयकोशोयं जीव इत्यागमा जगुः ।
सर्वसंसार एतस्य जन्मनाशसुखादिकः ॥७३॥
'तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योऽन्तरआत्मा विज्ञानमयः' (तै० २-४)
'विज्ञानं यज्ञं तनुते' (तै० २-५) इत्यादि आगमों ने विज्ञानमय
कोष को ही 'जीव' कहा है । जन्म, नाश तथा सुखादि नामक
यह सम्पूर्ण संसार इस विज्ञानमय कहलाने वाले जीव का
ही तो है ।
विज्ञानं क्षणिकं नात्मा विद्युदभ्रनिमेषवत् ।
अन्यस्यानुपलब्धत्वाच्छून्यं माध्यमिका जगुः ॥७४॥
माध्यमिक नाम के शून्यवादी बौद्ध तो कहते हैं कि—
बिजली, बादल, तथा निमेष के समान क्षण भर में नष्ट हो
जाने वाला क्षणिक विज्ञान, आत्मा नहीं है। इसके अतिरिक्त
और तो कुछ दीखता ही नहीं, इसलिये 'शून्य' ही आत्मा है ।
असदेवेदमित्यादाविदमीव श्रुतं ततः ।
ज्ञानज्ञेयात्मकं सर्वं जगद् भ्रान्तिप्रकल्पितम् ॥७५॥
निरधिष्ठानविभ्रान्ते रभावादात्मनोऽस्तिता ।
शून्यस्यापि ससाक्षित्वा दन्यथा नोक्तिरस्य ते ॥७६॥
उन शून्यवादियों का यह मत ठीक नहीं है। क्योंकि बिना
अधिष्ठान का तो कोई भ्रम होता ही नहीं। इस कारण से इस
भ्रान्त जगत्कल्पना के अधिष्ठान आत्मा को तो मानना ही पड़ता
है। शून्यवादी का यह शून्य भी तो ससाक्षिक ही होना
चाहिये । [इस शून्य का साक्षी अर्थात् शून्य को जानने वाला
भी तो कोई होना ही चाहिये] यदि उस साक्षी को न मानोगे