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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

तृप्तिदीपप्रकरणम् ३१९

तृप्तिदीपप्रकरणम् ३१९
मुझे तो अब यह निश्चय हो गया है कि मुझे जो कुछ करना
था सो मैं कर चुका हूँ तथा जो कुछ मुझे पाना था सो मैं
पा चुका हूँ।
व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो चान्यथापि वा ।
ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥२६७॥
कर्ता और भोक्तापन जिस मुझ में नहीं है, उस मेरा जो
भी भिक्षा आदि लौकिक, जप समाधि आदि शास्त्रीय तथा
हिंसा आदि प्रतिषिद्ध व्यवहार है, वह सबका सब जैसा मेरा
प्रारब्ध हो उसके अनुकूल चलता रहो। [मुझे अब उसकी
विशेष परवा नहीं है]
अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया ।
शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेहं का मम क्षतिः ॥२६८॥
अथवा यों समझो कि मैं तो कृतकृत्य हो ही चुका हूँ।
परन्तु लोकानुग्रह [प्राणियों पर कृपा] की इच्छा से मैं शास्त्र
के अनुकूल मार्ग से ही चलता हूँ। मेरी तो उससे भी कुछ
हानि नहीं होनी है। [मोक्ष तक पहुँचने का जो सरल राज-
मार्ग है, वह दूसरों को भी दिखा दिया जाय, ज्ञानी लोगों की
लापरवाही से वह मोक्ष की पद्धति नष्ट न हो जाय, इस
कारण लोकसंग्रह के लिये भी ज्ञानी को शुभकर्म करने ही
चाहियें। बिल्ली जैसे अपने बच्चों को चूहे का शिकार करना
सिखा जाती है, उसी प्रकार अविद्या का शिकार करना प्रत्येक
साधक को, ज्ञानी लोग सिखा दें तो वह मार्ग अक्षुण्ण बना
रह सकता है]

३२० पञ्चदशी
देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः ।
तारं जपतु वाक्तद्वत् पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥२६९॥
विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् ।
साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥२७०॥
यह मेरा शरीर देवार्चन करे, स्नान कर, शौच या भिक्षा-
चरण करे, यह मेरी वाणी तार (प्रणव) का जप करे, या
वेदान्त शास्त्र का पाठ करती रहे, यह मेरी बुद्धि चाहे तो
विष्णु का ध्यान करे या ब्रह्मानन्द में विलीन हो जाय । इन
सब कामों में से मैं तो कुछ भी करता या करवाता नहीं हूँ ।
मैं तो इन सब का साक्षी हूँ ।
एवं च कलहः कुत्र संभवेत् कर्मिणो मम ।
विभिन्नविषयत्वेन पूर्वापरसमुद्रवत् ॥२७१॥
ऐसी परिस्थिति में पूर्व और पश्चिम समुद्र के समान,
भिन्न विषय होने से, कर्मी के साथ मेरा झगड़ा कहां रहा ।
[कर्मी और मैं दोनों एक ही विषय पर कथन करते, तो उस
का हमारा कलह होना संभव भी था]
वपुर्वाग्धीषु निर्बन्धः कर्मिणो नतु साक्षिणि ।
ज्ञानिनः साक्ष्यलेपत्वे निर्बन्धो नेतरत्र हि ॥२७२॥
कर्मों का निर्बन्ध तो शरीर वाणी और बुद्धि तक ही है ।
साक्षी में उसका कुछ भी निर्बन्ध नहीं है [उससे उसको कुछ
भी मतलब नहीं है] इसके विपरीत ज्ञानी का निर्बन्ध तो
साक्षी के निर्लेपपने में है । उन शरीरादियों में उसका निर्बन्ध
कुछ भी नहीं है [देह से उसका कोई भी नाता नहीं रहता है।]