Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ५७७

Page 499Permalink

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ५७७
एकं त्यक्त्वान्यदादत्त सुखं वैषयिकं सदा।
नात्मा त्याज्यो न चादेयस्तस्मिन् व्यभिचरेत् कथम् ॥२६॥
वैषयिक सुखों की तो यह आदत है कि वे सदा एक को
छोड़ कर दूसरे से नेह जोड़ लेते हैं। छोड़ने और ग्रहण करने
के अयोग्य होने के कारण आत्मा तो छोड़ा या ग्रहण किया ही
नहीं जा सकता। फिर यह प्रीति उसमें व्यभिचार कैसे कर
सकेगी ?
हानादानविहीनेऽस्मिन्नुपेक्षा चेत् तृणादिवत् ।
उपेक्षितुः स्वरूपत्वान्नोपेक्ष्यत्वं निजात्मनः ॥२७॥
परत्याग करना और स्वीकार कर लेना, ये दोनों ही जिस
आत्मा में नहीं बन सकते, यदि उस आत्मा को तृण आदि
तुच्छ पदार्थों की तरह उपेक्षा करना चाहो, तो भी अयोग्य
होने के कारण उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती । क्योंकि जिस
आत्मा की उपेक्षा करनी है वह तो उस उपेक्षा करने वाले का
स्वरूप ही है [जो निजात्मा अर्थात् अपना अविनाशी स्वरूप
है, स्वरूप होने के कारण ही वह अपने से भिन्न तृणादि विषय
के समान, उपेक्षा का विषय ही नहीं हो सकता ।]
रोगक्रोधाभिभूतानां मुमूर्षा वीक्ष्यते क्वचित् ।
ततो द्वेषाद् भवेत् त्याज्य आत्मेति यदि तन्न हि ॥२८॥
जब कोई दारुण रोग, या दारुण क्रोध किसी पर आक्र-
मण करता है तब वह मर जाना चाहता है। इस दृष्टान्त को
लेकर आत्मा में द्वेष की संभावना हो जाती है और सांप बिच्छू
के समान यह आत्मा भी द्वेष के कारण त्याज्य हो जाता है
ऐसी शंका का करना ठीक नहीं है

Page 500Permalink

४७८ पञ्चदशी
आत्मा से भिन्न देह का ही हो सकता है। आत्मा का त्याग
कभी हो ही नहीं सकता।]
त्यक्तुं योग्यस्य देहस्य नात्मता त्यक्तुरेव सा ।
न त्यक्तर्य्यस्ति स द्वेष स्त्याज्ये द्वेषे तु का क्षतिः ॥२६॥
देख लो कि जो देह त्याग करने के योग्य है, वह तो आत्मा
ही नहीं है। देह का त्याग करने वाला, देह से भिन्न जो जीव
है, उसी को 'आत्मा' कहते हैं। प्रकृत तात्पर्य तो यही है कि—
वह द्वेष त्याग करने वाले आत्मा से नहीं हो सकता। यदि
किसी को त्याज्य देहादि पदार्थों में द्वेष हो तो उससे मेरे
सिद्धान्त में क्या हानि होगी? [जो मैं यह मान रहा हूँ कि
आत्मा का त्याग नहीं हो सकता, उस मेरे मत में त्याज्य देहों
में किसी रोगी या किसी क्रोधी को द्वेष हो भी तो उससे मेरे
सिद्धान्त की क्षति नहीं होती।]
आत्मार्थत्वेन सर्वस्य प्रीतेश्चात्मा ह्यतिप्रियः ।
सिद्धो, यथा पुत्रमित्रात् पुत्रः प्रियतरस्तथा ॥३०॥
[सुख और सुख के साधन पति-पत्नी आदि] सभी कुछ
जब आत्मार्थ हो जाते हैं [जब ये सब अपने उपकारक हो जाते
हैं] तभी प्रिय होते हैं, इस कारण से भी आत्मा ही अत्यन्तप्रिय
माना जाता है। लोक में भी देखा जाता है कि—पुत्र के मित्र
से [जिस पर कि हमारा प्रेम पुत्र के द्वारा होता] पुत्र ही [व्यव-
धानरहित प्रेम का पात्र होने के कारण] पिता को अधिक
प्यारा लगता है [इसी प्रकार जो सब पदार्थ अपने सम्बन्धी
होने के कारण प्रेम के पात्र बन गये हैं उन सब पदार्थों की
अपेक्षा वह आत्मा अधिक प्यारा होता है]