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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४१

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४१
अन्तर्मुखो य आनन्दमयो ब्रह्मसुखं तदा ।
भुङ्क्ते चिद्विम्बयुक्ताभि रज्ञानोत्पन्नवृत्तिभिः ॥६५॥
वह जो अन्तर्मुख 'आनन्दमय' है वह चिदाभास से युक्त,
तथा अज्ञान से उत्पन्न हुई वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मसुख [किंवा
स्वरूपभूत सुख] को भोगता अर्थात् अनुभव किया करता है।
अज्ञानवृत्तयः सूक्ष्मा विस्पष्टा बुद्धिवृत्तयः ।
इति वेदान्तसिद्धान्तपारगाः प्रवदन्ति हि ॥६६॥
[ उस समय जागरण की तरह् सुख के अनुभव का जो
अभिमान नहीं होता उस का कारण तो यह है कि]—वे अज्ञान-
वृत्तियां बहुत ही सूक्ष्म होती हैं [वे बुद्धिवृत्तियों की तरह स्पष्ट
नहीं होतीं।] बुद्धिवृत्तियां तो बहुत ही स्पष्ट होती हैं। यह बात
वेदान्तसिद्धान्त के पारङ्गत लोग बताते हैं।
अज्ञान वृत्तियों का पता नहीं चलता कि वे कैसी कैसी हैं
और कितनी हैं? जब तो उन अज्ञान वृत्तियों से बुद्धिवृत्तियें बन
जाती हैं, तब हम को मालूम पड़ता है कि हमारे अन्दर इतना
कूड़ा कचरा भरा पड़ा है। जब तक हमारा अज्ञान बुद्धिवृत्तियों
के रूप में प्रकट नहीं हो जाता तब तक हम अपने आप को
बड़ा महात्मा समझ बैठते हैं। एकान्त में जाकर साधन करने
से यह एक बड़ी कमी रह जाती है कि अज्ञान वृत्तियों को
बुद्धिवृत्ति बनने का अवसर ही नहीं मिलता और यों हमें अपने
विषय में मिथ्याज्ञान या मिथ्याभिमान हो जाता है। समाज
में रह कर साधन करने से हमारे अन्दर के अज्ञान की बार-
बार बुद्धिवृत्ति बनती रहती है और हमें अपने अज्ञान का पता
चलता रहता है। यों हम दुरभिमान से भी बचते हैं और उस

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अज्ञान को हटाने में भी तत्पर रहते हैं अर्थात् हमारे साधन की
परीक्षा नित्य ही होती रहती है। इस दृष्टि से व्यवहार के साथ
साथ साधन करना अधिक लाभदायक प्रतीत होता है। व्यवहार
से हट कर आत्मसाधन करने वाले लोग प्रायः करके व्यवहार
के झंझट में स्थिर बुद्धि नहीं रह सकते हैं। यों साधन का यह मार्ग
बहुत से साधकों को अधूरा रख देता है ऐसा मालूम पड़ता है।
माण्डूक्यतापनीयादिश्रुतिष्वेतदतिस्फुटम् ।
आनन्दमयभोक्तृत्वं ब्रह्मानन्दे च भोग्यता ॥६७॥
माण्डूक्य और तापनीय आदि श्रुतियों में यह बात अत्यन्त
ही स्पष्ट है कि 'आनन्दमय' तो भोक्ता है तथा 'ब्रह्मानन्द'
भोग्य है ।
एकीभूतः सुषुप्तस्थः प्रज्ञानघनतां गतः ।
आनन्दमय आनन्दभुक् चेतोमयवृत्तिभिः ॥६८॥
[सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतो-
मुखः (माण्डूक्य ५) इस माण्डूक्य श्रुति में कहा गया है कि]
सुषुप्ति का जो अभिमानी है, वह जब एकीभाव को प्राप्त हो
जाता है, उसमें जब प्रज्ञानघनता आजाती है, तब वह आनन्द-
मय किंवा आनन्द प्रचुर हो जाता है। वही आनन्दमय, [जिन
में चैतन्य की अधिकता रहती है—जो चैतन्य के प्रतिबिम्ब से
से युक्त होती हैं] उन अपनी चेतोमय वृत्तियों से आनन्द को
भोगा करता है ।
विज्ञानमयमुख्यैर्यो रूपैर्युक्तः पुराधुना ।
स लयेनैकतां प्राप्तो बहुतन्दुलपिष्टवत् ॥६९॥
जो आत्मा पहले जागरणकाल में विज्ञानमय आदि