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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

12. Atmananda

Page 490Permalink

ओम्
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम्
नन्वेवं वासनानन्दाद् ब्रह्मानन्दादपीतरम् ।
वेत्तु योगी निजानन्दं मूढस्यात्रास्ति का गतिः ॥१॥
[अब ब्रह्मानन्द के अन्तर्गत 'आत्मानन्द' नाम के द्वितीय
अध्याय का आरम्भ किया जाता है] शिष्य ने प्रश्न किया कि—
वासनानन्द और ब्रह्मानन्द से भिन्न जो आत्मानन्द है उसको
योगी लोग तो [इससे पहले योगानन्द नाम के प्रकरण में कहे
अनुसार] जान ही सकेंगे। परन्तु इस आत्मानन्द को वे मूढ
लोग—जिनकी गति योग में नहीं—कैसे जानें ?
धर्माधर्मवशादेष जायतां म्रियतामपि ।
पुनः पुनर्देहह्रदैः किं नो दाक्षिण्यतो वद ॥२॥
[गुरु ने उत्तर दिया कि] यह अतिमूढ पुरुष तो [बीते हुए
अनन्त कोटि जन्मों में किये हुए] पुण्य पापों के बस में आ आकर
अनेक प्रकार की लाखों योनियों में जन्मता और मरता रहेगा
ही। हमारी चतुराई से क्या होना है ? [ तात्पर्य यह है कि
अति मूढ को तो ब्रह्मविद्या का अधिकार ही नहीं है। उसे जीने
मरने दो उसकी चिन्ता मत करो।]
अस्ति वोऽनुजिघृक्षुत्वाद्दाक्षिण्येन प्रयोजनम् ।
तर्हि ब्रूहि स मूढः किं जिज्ञासुर्वा पराङ्मुखः ॥३॥
यदि तुम शिष्य लोग अनुजिघृक्षु हो—शिष्यों का उद्धार
करने की यदि तुम्हें इच्छा हो और तुम्हारे दाक्षिण्य से उनका