पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१५६ पञ्चदशी
जाना संभव हो जाता है। आत्मा में कर्तृत्वादि धर्म रहते हैं
इस बात में सम्पूर्ण कर्मकाण्ड प्रमाण है ऐसा वे कहते हैं।
[ यदि आत्मा कर्ता नहीं है तो कर्मकाण्ड की रचना क्यों की
गयी है ? ]
आनन्दमयकोशो यः सुषुप्तौ परिशिष्यते ।
अस्पष्टचित् स आत्मैषां पूर्वकोशोऽस्य ते गुणाः ॥९४॥
सुषुप्ति के समय जो 'आनन्दमय कोश' शेष रह जाता है
जिसमें चेतनता अस्पष्ट रूप से रहती है, कोशों में सबसे
पहला कोश यह आनन्दमय कोश ही इन प्रभाकर आदियों का
आत्मा है। वे पूर्वोक्त इच्छा आदि इसी के गुण हैं। [ तात्पर्य
यह कि जिस आत्मा को हमने पहले आनन्दमय कहा था
इच्छादि वाला वही उनका सम्मत आत्मा है । ]
गूढं चैतन्यमुत्प्रेक्ष्य जडबोधस्वरूपताम् ।
आत्मनो ब्रुवते भाट्टाश्चिदुत्प्रेक्षोत्थितस्मृतेः ॥९५॥
कुमारिल भट्ट के अनुयायी तो इसी आत्मा के गूढ अर्थात्
अस्पष्ट चैतन्य की ऊहना कर लेते हैं फिर इसको चैतन्य और
जड उभय रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि सोकर उठे हुए पुरुष
को जो स्मृति होती है उससे चैतन्य की उत्प्रेक्षा होती है। सो-
कर उठा हुआ पुरुष जब स्मरण करता है तब उससे सुषुप्ति
के समय के चैतन्य की ऊहना कर ली जाती है।
जडो भूत्वा तदास्वाप्समिति जाड्यस्मृतिस्तदा ।
विना जाड्यानुभूतिं न कथंचिदुपपद्यते ॥९६॥
[ चैतन्य की उत्प्रेक्षा करने की उनकी परिपाटी यह है
'कि ]—सुषुप्ति के समय 'मैं जड होकर सोया पड़ा था' ऐसा