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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२१

तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२१
और वह यही चाहता भी है कि किसी तरह यह नाता सदा
के लिये टूट जाय]
एवं चान्योन्यवृत्तान्तानभिज्ञौ बधिराविव ।
विवदेतां, बुद्धिमन्तो हसन्त्येव विलोक्य तौ ॥२७३॥
एक दूसरे की बात को न सुनने और न समझने वाले दो
बहरे जब आपस में विवाद करते हों तब बुद्धिमान् लोग
उन्हें झगड़ते देखकर हंसते ही हंसते हैं। यों जब ज्ञानी और
कर्मी आपस में विवाद कर पड़ते हैं, तब अनुभवी विद्वान्
लोग उन्हें देख देखकर हँसा करते हैं [क्योंकि उन दोनों को
एक दूसरे के वृत्तान्त का परिज्ञान ही नहीं है]
यं कर्मी न विजानाति साक्षिणं तस्य तत्ववित् ।
ब्रह्मत्वं बुध्यतां, तत्र कर्मिणः किं विहीयते ॥२७४॥
कर्मी पुरुप जिस साक्षी तत्व को नहीं पहचानता है,
ज्ञानी पुरुप यदि उसी साक्षितत्व को ब्रह्म जान ले तो इसमें
कर्मी का क्या बिगड़ता है ? [ उससे उसके कर्मानुष्ठान में
कुछ भी रुकावट नहीं पड़ती है । ]
देहवाग्बुद्धयस्त्यक्ता ज्ञानिनानुतबुद्धितः ।
कर्मी प्रवर्तयत्वाभिर्ज्ञानिनो हीयतेऽत्र किम् ॥२७५॥
देह वाणी और बुद्धि इन सभी को ज्ञानी ने अनृत समझ
कर छोड़ दिया है । कर्मी इन से काम में प्रवृत्त होता है तो
हुआ करे। ज्ञानी का उससे क्या बिगड़ता है ? [ ज्ञानी और
कर्मी का विवाद तो हमारी समझ में निर्विषय ही है । इनके
विवाद को देखकर तो सभी हँसेंगे ] ।
२१

३२२ पञ्चदशी
प्रवृत्तिर्नोपयुक्ता चेन्निवृत्तिः कोपयुज्यते ।
बोधहेतु र्निवृत्तिश्चेद् बुभुत्सायां तथेतरा ॥२७६॥
यदि कहा जाय कि ज्ञानी लोग प्रयोजन रहित होने से
कर्मों में प्रवृत्ति नहीं करते । परन्तु हम पूछेंगे कि निवृत्ति का
भी तो ज्ञानी को कुछ उपयोग नहीं है। फिर ज्ञानी लोग निवृत्ति
भी क्यों करते हैं ? यदि कहा जाय कि निवृत्ति तो बोध का
कारण होती है, इससे ज्ञानी लोग निवृत्ति को स्वीकार कर लेते
हैं, तो हम कहेंगे कि ऐसे तो प्रवृत्ति भी ज्ञान की इच्छा में
उपयोगी होती ही है । [हम अनादि काल से प्रवृत्ति में ही हैं।
जब कभी किसी जन्म में हमारे मन में यह प्रश्न उठ खड़ा
होता है कि—इस प्रवृत्ति से हमें क्या मिला ? क्या मिल रहा
है ? और क्या कुछ मिलेगा ? इस प्रश्न का जब कोई सद्दु-
त्तर हमें नहीं मिल पाता, तब हम प्रवृत्ति से हट जाते हैं—
किनारा करने लगते हैं, और तब तत्त्व की जिज्ञासा हमें हो
जाती है । यों प्रवृत्ति भी वैराग्य दिलाकर ज्ञान की इच्छा में
उपयोगी होती ही है ]।
बुद्धश्चेन्न बुभुत्सेत नाप्यसौ बुध्यते पुनः ।
अबाधादनुवर्तेत बोधो न त्वन्यसाधनात् ॥२७७॥
यदि कहा जाय कि जो ज्ञानी है उसे तो बुभुत्सा [ज्ञानेच्छा]
ही नहीं हो सकती, [फिर वह ज्ञानी प्रवृत्ति में क्यों फँसेगा ?]
तो हम कहेंगे कि उस ज्ञानी को दोबारा बोध भी तो नहीं होता
है, इस कारण ज्ञानी के लिये निवृत्ति का भी तो कुछ उप-
योग नहीं रहता है । [महावाक्यों को सुनकर जो बोध उत्पन्न
होता है उस ] बोध की बाधा किसी भी प्रमाण से न हो तो