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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४७

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४७
जाता है। जो कल्प के प्रारम्भ में ही देव बन गये थे वे 'आजान
देवता' कहे जाते हैं ॥३०॥ जो तो इसी कल्प में अश्वमेध आदि
कर्म करके महापद को पाकर आजानदेवों के भी पूज्य हो जाते
हैं वे 'कर्मदेवता' होते हैं।
यमाग्निमुख्या देवाः स्युर्जाताविन्द्रबृहस्पती ।
प्रजापतिर्विराट् प्रोक्तो ब्रह्मा सूत्रात्मनामकः ॥३२॥
यम अग्नि आदि 'देवता' कहाते हैं। इन्द्र और बृहस्पति
भी प्रसिद्ध ही हैं। प्रजापति को विराट् कहते हैं। ब्रह्मा को
सूत्रात्मा माना गया है।
सार्वभौमादिसूत्रान्ता उत्तरोत्तरकामिनः ।
अवाङ्मनसगम्योऽयमात्मानन्दस्ततः परः ॥३३॥
सार्वभौम राजा से लेकर सूत्रात्मा तक सब के सब अपने
से ऊपर के पद की कामना किया करते हैं। परन्तु यह जो
आत्मानन्द है यह तो मन और वाणी से अगम्य है। यही
कारण है कि वह इन सब से ऊँचा है [विवेकी पुरुष को किसी
की भी कामना नहीं रहती, इससे उसका दर्जा सब से ऊँचा
हो जाता है।]
तैस्तैः काम्येषु सर्वेषु सुखेषु श्रोत्रियो यतः ।
निःस्पृहस्तेन सर्वेषा मानन्दाः सन्ति तस्य ते ॥३४॥
उन उनके कमनीय सभी सुखों की ओर से श्रोत्रिय पुरुष
तो निःस्पृह बना रहता है। यही कारण है कि—उन सब को
मिल कर जितना आनन्द आता है उतना अकेले श्रोत्रिय को
निःस्पृह होने से ही मिल जाता है।
वे लोग उन उन कामनाओं को पूरा करके भी तो कुछ