पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५५९
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५५९
ठीक होगा ? इस बात का उत्तर यह है कि ]—यह चांद जब
मैले जल में प्रविष्ट होता है तब यह भी अस्पष्ट दीखने लगता
है, परन्तु निर्मल जल में स्पष्ट दीख पड़ता है । ठीक इसी प्रकार
ब्रह्म तत्व भी शुद्ध और अशुद्ध वृत्तियों में दो तरह का हो
जाता है ।
घोरमूढासु मालिन्यात् सुखांशश्च तिरोहितः ।
ईषन्नैर्मल्यतस्तत्र चिदंशप्रतिविम्बनम् ॥९॥
[ ऊपर की बात को विस्तार से यों समझो कि ]—घोर
और मूढ वृत्तियों में मलिनता के कारण सुख भाग ढका हुआ
रहता है । उन वृत्तियों में थोड़ी सी निर्मलता होती है इस कारण
केवल चिदंश का ही प्रतिबिम्ब हुआ रहता है ।
यद्वापि निर्मले नीरे वह्ने रौष्ण्यस्य संक्रमः ।
न प्रकाशस्य, तद्वत् स्याच्चिन्मात्रोद्भूतिरेव च ॥१०॥
अथवा दूसरे दृष्टान्त से इस बात को यों समझो कि निर्मल
जल में अग्नि की उष्णता तो पहुंच जाती है परन्तु अग्नि का
प्रकाश उसमें नहीं पहुंच पाता । ठीक इसी तरह घोर और मूढ
वृत्तियों में चिदंश ही पहुंच पाता है [ परन्तु 'सुखांश' का संक्रमण
उनमें नहीं होता ]
काष्ठे त्वौष्ण्यप्रकाशौ द्वावुद्भवं गच्छतो यथा ।
शान्तासु सुखचैतन्ये तथैवोद्भूतिमाप्नुतः ॥११॥
काष्ठ में तो जैसे उष्णता और प्रकाश दोनों ही उद्भूत हो
जाते हैं, इसी प्रकार शान्त वृत्तियों में भी 'सुख' और 'चैतन्य'
दोनों ही उद्भूत हो जाते हैं ।
५६० पञ्चदशी
वस्तुस्वभावमाश्रित्य व्यवस्था तूभयोः समा ।
अनुभूत्यनुसारेण कल्प्यते हि नियामकम् ॥१२॥
वस्तु का जैसा स्वभाव हो उसके अनुसार व्यवस्था मानना
तो दोनों ही पक्षों में समान है। क्योंकि नियामक की जब
कल्पना की जाती है तब वह अनुभव के अनुसार ही तो की
जाती है।
न घोरासु न मूढासु सुखानुभव ईक्ष्यते ।
शान्तास्वपि क्वचित् कश्चित् सुखानुभव ईक्ष्यताम् ॥१३॥
लोक में देखते हैं कि—घोर या मूढ अवस्थाओं में
सुखानुभव होता दीखता ही नहीं। इसी तरह अनुभव के अनु-
सार यह भी देख लो कि—शान्त वृत्तियों में भी सुखानुभव
होता है या नहीं ?
गृहक्षेत्रादिविषये यदा कामो भवेत् तदा ।
राजसस्यास्य कामस्य घोरत्वात् तत्र नो सुखम् ॥१४॥
घर या खेत आदि की कामना जब किसी पर सवार हो
जाती है तब फिर कामावस्था में उसे सुख हो ही नहीं सकता ।
क्योंकि वह राजस काम घोर होता है। [ वह सुख को
उद्भूत होने ही नहीं देता । ]
सिद्ध्येन्नवेत्यस्ति दुःखमसिद्धौ तद् विवर्धते ।
प्रतिबन्धे भवेत् क्रोधो द्वेषो वा प्रतिकूलतः ॥१५॥
यह मेरा काम सिद्ध होगा या नहीं ? यह विचार जब
आता है तब दुःख होने लगता है। जब काम सिद्ध नहीं होता
तब दुःख बढ़ने लगता है। जब कोई उस काम में प्रतिबन्ध