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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

चीर कर अन्दर की रसमयी वस्तु से विवेक की आंखें भिड़ा देने को

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०९


ज़रा श्रौती विचार दृष्टि से देखें तो प्रतीत होता है कि सच्चा आत्मा
तो यह साक्षी ही है। उससे भिन्न और कुछ भी आत्मा नहीं है।
पांचों कोशों को नारियल के छिलके की तरह ज्ञान के चाकू से
चीर कर अन्दर की रसमयी वस्तु से विवेक की आंखें भिड़ा देने को
ही तो हम श्रौती विचार दृष्टि कह रहे हैं। 'जागरण' 'स्वप्न' और
'सुषुप्ति' ये तीनों अवस्थायें आती हैं और चली जाती हैं, यह बात
हमको जिस तत्व के सहारे से पता चलती है, वही स्वयं प्रकाश
चेतन पदार्थ आत्मा है। शेष तो प्राण से लेकर धनपर्यन्त पदार्थ
न्यूनाधिक भाव से उसके आस पास लगे रहते हैं। उसी न्यूनाधिक
भाव के लिहाज़ से उनमें न्यूनाधिक प्रेम हो जाता है। देखते हैं
कि—धन से तो पुत्र, पुत्र से शरीर, शरीर से इन्द्रिय, इन्द्रिय से
प्राण, और प्राण से आत्मा अधिक प्रिय होता है। तत्वज्ञानी को
तो इस स्थिति का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। परन्तु मूर्ख लोग समझते
हैं कि प्रियतम तो पुत्रादि ही हैं, हम तो केवल उन को भोगने के
लिये ही बने हैं। इस आत्मा को छोड़कर किसी अन्य पदार्थ को
जो प्रिय कहने लगा है, उसे समझाना चाहिये कि—तू जिस चीज़
को प्रिय समझेगा वही तो तुझे संसार में बांध रखने का खूंटा बन
जायगी। तू पुत्र को प्रिय समझता है तो देख उसके साथ तुझे
कितने अनिष्ट प्रसंग देखने पड़ेंगे—जब वह उत्पन्न न होगा
तब तुझे दुःख होगा। जब गर्भपात होगा तब भी तुझे
बड़ा कष्ट पहुँचायेगा, जब प्रसव होगा तो अनन्त प्रसववेदना
होगी, फिर रोगी होगा, मूर्ख रह जायगा, विवाह न हो सकेगा,
परस्त्रीगमन करने लगेगा, निःसन्तान होगा, सन्तान वाला होकर
भी दरिद्र होगा, धनी होकर भी मर जायगा, यों तुम्हारे क्लेशों का
अन्त कभी भी नहीं हो सकेगा। इस कारण अपने से भिन्न किसी

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११० पंचदशी
को प्रिय मानना ही छोड़ दो और यह निश्चय कर लो कि परम
प्रीति तो अपने आत्मा में ही होती है। ऐसा निश्चय करके दिन
रात इसी आत्मप्रेम की ओर को देखते रहो। जो तो किसी प्रकार
के आग्रह में आकर इस पक्ष को न छोड़ेगा, उसे अनेक योनियों
में घूम घूम कर इस का प्रायश्चित करना पड़ेगा। जो तो आत्मा
को ही निरतिशय प्रेम का पात्र समझ कर सदा आत्मा की ही
सेवा में लगा रहता है, उसके प्रिय आत्मा के नष्ट होने का प्रसंग
कभी भी नहीं आता। यहां तक सिद्ध हो चुका कि परम-प्रेम का
स्थान होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है। देखा जाता है कि—
ज्यों ज्यों प्रीति बढ़ती जाती है त्यों त्यों सुख भी बढ़ता जाता है।
राजा को अपने उपकरणों में अधिक प्रेम होता है तो उसे सुख
भी अधिक ही मिलता है।
अब एक विचार उठता है कि—यदि चैतन्य की तरह सुख
भी इस आत्मा का स्वभाव होता तो वह भी सब बुद्धिवृत्तियों में
आना ही चाहिए था। इसका समाधान यह है कि सब स्वभावों
का आना आवश्यक नहीं होता। देखते हैं कि दीपक उष्ण और
प्रकाश दो रूप का होता है, उसकी प्रभा जब किसी मकान में
फैलती है तब उसकी उष्णता नहीं फैलती। इसी प्रकार चैतन्य की
ही अनुवृत्ति होती है सुख की नहीं होती। एक विचार यह भी
है कि—जैसे एक पदार्थ में गन्ध, रूप,रस और स्पर्श सभी होते
हैं, परन्तु एक एक इन्द्रिय इन में से एक एक को ही ग्रहण कर
सकती है, सब को नहीं, इसी प्रकार चैतन्य और आनन्द दोनों
की ही अनुवृत्ति होती तो है, परन्तु अशुद्ध मन से केवल चैतन्य
का ही भास होता है, आनन्द का नहीं होता। सात्विकवृत्ति बड़ी
निर्मल होती है, इस कारण उसमें चैतन्य और सुख दोनों ही

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ब्रह्मानन्दन्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १११
प्रतीत हो जाते हैं परन्तु तब ये दोनों एक ही पदार्थ दीखते हैं ।
रजोवृत्तियों के मलिन होने के कारण, इनमें सुख भाग के दर्शन
नहीं हो पाते । लोक में देखते हैं कि इमली का फल बहुत खट्टा
होता है, परन्तु नमक मिलाने पर उसकी खटाई छिप जाती है
इसी तरह रजोवृत्तियों के मिश्रण से आनन्द छिप जाता है ।
अब एक बड़ा गम्भीर प्रश्न यह होता है कि यों प्रियतम
होने के कारण आत्मा की परमानन्दरूपता जान भी ली जाय तो
भी ऐसे थोथे 'विवेक' से क्या होगा ? मुक्ति का साधन-योग जब
तक न किया जायगा, तब तक अपरोक्ष ज्ञान कैसे हो सकेगा ?
इस का उत्तर यही है कि—जो फल 'योग' से मिलना है वही
फल इस 'विवेक' से भी मिल जायगा । गीता में तो स्पष्ट ही कहा
है कि—'सांख्यमार्गी' को जो स्थान मिलता है 'योगी' भी उसे
ही पाते हैं । जानने योग्य बात इस प्रसंग में इतनी ही है कि
किसी के लिए योग मार्ग से चलना असाध्य होता है और किसी
को ज्ञान का निश्चय होना असम्भव हो जाता है । मनुष्य स्वभाव
की इन कमजोरियों को जानने वाले परमेश्वर ने इसीलिए 'योग'
और 'सांख्य' [ विवेक ] नाम के दो मार्ग कह दिये हैं । 'योगी'
और 'विवेकी' दोनों को ही एक समान ज्ञान हो जाता है । दोनों
एक समान ही रागद्वेष से हीन होते हैं । देह के प्रतिकूल पदार्थों
से द्वेष भी दोनों को समान ही होता है । व्यवहार काल में द्वैत
का भान जैसे 'योगी' को होता है, वैसे ही 'विवेकी' को भी हुआ
करता है । समाधि करते समय 'योगी' को द्वैत का भान जैसे
नहीं होता वैसे ही जब 'विवेकी' अद्वैततत्व का विवेक करने
बैठता है तब उसे भी द्वैत का भान नहीं होता । जो सदा आत्मा-
नन्द को देखने लगा है, जिसे द्वैत का दीखना ही बन्द हो चुका