पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextचित्रदीपप्रकरणम् १४५
जो प्रमाण क्षोद अर्थात् विचार को सह लेते हैं—विचार
करने पर जिनका निर्णय उलट पुलट नहीं हो जाता—उन
प्रमाणों के बिना ही उन तार्किकों ने तो मिथ्या की कल्पना कर
रक्खी है, परन्तु श्रुति [ तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ
संपत्स्ये ] युक्ति [ चक्र भ्रमादि के दृष्टान्त ] तथा विद्वान् लोगों के
अनुभव रूपी प्रमाणों के सहारे से ही बोलने वाले हमको
क्या दुःशक है । [ तात्पर्य यह है कि तार्किकों में और हममें
इतना भेद है कि वे तो विचारसह प्रमाण के बिना ऐसा कहते
हैं तथा हम श्रुति, युक्ति और विद्वदनुभव के आधार से ऐसा
बोलते हैं । ]
आस्तां दुस्तार्किकैः साकं विवादः प्रकृतं ब्रुवे ।
स्वाह्वयोः सिद्धमेकत्वं कूटस्थपरिणामिनोः ॥५७॥
दुस्तार्किकों के साथ विवाद को यहीं छोड़कर अब हम
प्रकृत पर आते हैं । स्व जो कूटस्थ है तथा अहं जो परिणामी
है उन दोनों की एकता [ भ्रान्तिसे ] हो जाती है, यह बात तो
सिद्ध की जा चुकी है ।
भ्राम्यन्ते पण्डितम्मन्याः सर्वे लौकिकतैर्थिकाः ।
अनादृत्य श्रुतिं मौर्यात् केवलां युक्तिमाश्रिताः ॥५८॥
जितने भी लौकिक और तैर्थिक लोग हैं, वे सभी अपने
आप को महाज्ञानी मानते हैं और भ्रम में ही गोते खाया करते
हैं । ये लोग अपनी मूर्खता से श्रुति का अनादर करके केवल
युक्ति पर निर्भर हो गये हैं । [ इसी कारण से कूटस्थ और
जीव की जो भ्रान्तिसिद्ध एकता है उसको वे पहचानते नहीं