पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
द्वैतविवेकप्रकरणम् १०५
द्वैतविवेकप्रकरणम् १०५
है। इस कारण मनोनिरोध रूपी योग का ही अभ्यास कर
डालना चाहिये। इस विचारे ब्रह्मज्ञान से क्या होगा सो
बताओ ? [ब्रह्मज्ञान को बन्ध का निवर्तक मानना ठीक बात
नहीं है]।
तात्कालिकं द्वैतशान्तावप्यागामिजनिक्षयः ।
ब्रह्मज्ञानं विना न स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः ॥३९॥
सुनो, योग से तात्कालिक द्वैत तो शान्त हो सकता है,
परन्तु आगामी जन्मों का नाश तो ब्रह्मज्ञान के बिना हो ही
नहीं सकता। यह बात 'ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः (श्वे० ५-१३)
'ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति । यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः ।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति।' (श्वे० ६-२०) इत्यादि
श्रुतियों में डंके की चोट कही गई है। ये श्रुतियां ब्रह्मज्ञान से
बन्ध की निवृत्ति को कहती हैं।
अनिवृत्ते ऽपीशसृष्टे द्वैते तस्य मृषात्मताम् ।
बुद्ध्वा ब्रह्म द्वयं बोद्धुं शक्यं वस्त्वैक्यवादिनः ॥४०॥
एकवस्तुवादी के मत में, ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत
भले ही बना रहो, उस को तो मिथ्या समझ लेने मात्र से ही
अद्वितीय ब्रह्म का बोध हो सकता है। [ईश्वर के बनाये हुए
द्वैत की मौजूदगी में ही यदि उस द्वैत को मिथ्या समझ लिया
जाय तभी अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व जाना जा सकता है। ईश्वर का
बनाया हुआ द्वैत न रहेगा तो अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व समझ में आ ही
नहीं सकेगा। क्योंकि तब उस को जानने का साधन कुछ भी
नहीं रहेगा। ईश्वर के द्वैत पर जब हम अपना द्वैत बनाने
लगते हैं तब तो यह हमें बांधता है। जब हम इस को हटा कर
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इस के मूलाधार को टटोलते हैं तब हमारी दृष्टि ब्रह्मतत्त्व पर
जा पड़ती है । यों इस की सत्यता से हम बंधते हैं और इस के
नकार से हम छुट जाते हैं। यों ईश्वर का द्वैत तो हमारे बड़े ही
काम की वस्तु है] ।
प्रलये तन्निवृत्तौ तु गुरुशास्त्राद्यभावतः ।
विरोधिद्वैताभावेपि न शक्यं बोद्धुमद्वयम् ॥४१॥
प्रलय काल में, जब कि द्वैत छिप जाता है, और अद्वैत
ज्ञान का विरोधी द्वैत नहीं रह जाता, तब भी अद्वय भाव को
जाना नहीं जा सकता । क्योंकि अद्वय भाव को जताने वाले
गुरु या शास्त्र उस समय नहीं रहते ।
जो यह समझा बैठा है कि द्वैत को मिथ्या समझने से
अद्वैत ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु अद्वैत ज्ञान के लिए
द्वैत का निवारण कर डालना—द्वैत को मार भगाना—ही अत्या-
वश्यक होता है, उसको यों समझाना चाहिये कि—प्रलय-
काल में, जब कि तुम्हारे भी मत में द्वैत की निवृत्ति हो जाती
है, जब कि विरोधी द्वैत का सर्वथा निवारण हो जाता है, जब
कि अद्वैत ज्ञान का विरोध करनेवाला द्वैत शेष ही नहीं रह
जाता है, तब ज्ञान के साधन गुरु अथवा शास्त्रादि के न रह जाने
के कारण ही से, अद्वय वस्तु का बोध किसी को भी नहीं हो सकता।
इसी से कहते हैं कि द्वैत का निवारण करना कोई आवश्यक
बात नहीं है । उसको तो मिथ्या समझने से ही साधक का काम
चलता है। यों मिथ्या समझने में ईश्वर के द्वैत का उपयोग है ही।
अबाधकं साधकं च द्वैतमीश्वरनिर्मितम् ।
अपनेतुमशक्यं चेत्यास्तां तद् द्विष्यते कुतः ॥४२॥
['द्वैत के रहते रहते अद्वैतज्ञान कैसे हो सकता है' इसका
समाधान यह है कि ] ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत तो अद्वैत के
ज्ञान में बाधा नहीं डालता । उसको ही तो मिथ्या समझने से
अद्वैत ज्ञान की उत्पत्ति हुआ करती है । इस कारण वह तो अद्वैत
ज्ञान की उत्पत्ति में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाल सकता ।
प्रत्युत गुरुशास्त्रादिरूपी जो द्वैत है वह तो अद्वैत ज्ञान का साधक
होता है । इसके अतिरिक्त ईश्वर के बनाये हुए आकाशादि
रूप द्वैत को हम क्षुद्र संकल्प वाले लोग हटा भी तो नहीं सकते
हैं [क्योंकि वह सत्य संकल्प है । उसका संकल्प हमसे नहीं
तोड़ा जा सकता ] इन हेतुओं से उस बिचारे द्वैत को रहने दो,
उससे द्वेष मत ठानो ।
जीवद्वैतं तु शास्त्रीयमशास्त्रीयमिति द्विधा ।
उपाददीत शास्त्रीयमातत्त्वस्यावबोधनात् ॥४३॥
'शास्त्रीय' और 'अशास्त्रीय' भेद से जीव का बनाया हुआ
द्वैत भी दो प्रकार का होता है । उसमें से तत्व का ज्ञान होने
तक शास्त्रीय द्वैत को तो पकड़े ही रहना चाहिये ।
आत्मब्रह्मविचाराख्यं शास्त्रीयं मानसं जगत् ।
बुद्धे तत्त्वे तच्च हेयमिति श्रुत्यनुशासनम् ॥४४॥
प्रत्यग्रूप ब्रह्म का विचार या श्रवण आदि जिसको कहते हैं
वह शास्त्रीय मानस जगत् [द्वैत ] कहाता है। जब तत्व का [पूरा
पूरा] परिज्ञान हो चुके तब तो उस शास्त्रीय द्वैत का परित्याग कर
ही डालना चाहिये । यह बात श्रुति ने कही है ।
साधक लोग तत्व के समझ में आजाने पर भी शास्त्रवासना
में उलझे न रहकर ब्रह्माभ्यास को बढ़ाते जायें यही इसका भाव है ।
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शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः ।
परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत् तान्यथोत्सृजेत् ॥४५॥
ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्परः ।
पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद् ग्रन्थमशेषतः ॥४६॥
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् ॥४७॥
[ तत्व बोध के बाद शास्त्रीय द्वैत को छोड़ ही देना चाहिये
यह बात इन श्रुतियों में कही गयी है ] मेधावी पुरुष शास्त्रों को
पढ़े, उनका बार बार अभ्यास करे, जब परब्रह्म को पहचान ले,
उसके पश्चात् मार्ग देखकर निकम्मी हुई उल्का के समान उन्हें
तुरन्त फेंक दे ॥४५॥ ग्रन्थों का अभ्यास करके जब ज्ञान तथा
विज्ञान में तत्पर हो जाय तो फिर मेधावी पुरुष ग्रन्थों का पूर्ण
परित्याग इस प्रकार कर दे जैसे धान्यार्थी लोग धान्य निकाल
कर पुराल को कहीं भी पड़ा छोड़ देते हैं। [फिर साधकों को
ग्रन्थव्यसन में नहीं उलझे रहना चाहिये। ग्रन्थ तो इस मार्ग तक
हमें पहुँचा देने के लिए थे। इस परमपद को देखकर भी ग्रन्थों
में फँसे रहना तो ऐसा है जैसे पार जाकर नाव पर से कोई उतरना
ही न चाहता हो ] ॥४६॥ धीर ब्राह्मण उसी आत्म-तत्व को जान
कर अपनी बुद्धि को सदा तदाकार बना डाले। शास्त्रों की खटपट
में या बहुत सी बातों की उलझन में फँसा न रह जाय। क्योंकि
वह वाणी की कोरी कसरत ही तो है ॥४७॥
तमेवैकं विजानीथ ह्यन्या वाचो विमुञ्चथ ।
यच्छेद्वाङ् मनसी प्राज्ञ इत्याद्याः श्रुतयः स्फुटाः ॥४८॥