Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 171 of 726

Read in context
Page 171

चित्रदीपप्रकरणम् १५३

माना जाता है [आत्मा के अवयव जब सूक्ष्म नाडियों में
प्रचार करेंगे तब उसे आत्मा का ही प्रचार मान लिया जायगा।]
न्यूनाधिकशरीरेषु प्रवेशोऽपि गमागमैः ।
आत्मांशानां भवेत्, तेन मध्यमत्वं विनिश्चितम् ॥८४॥
आत्मा का जब एक नियत मध्यम परिमाण मानेंगे तब
जब वह छोटे बड़े शरीरों में प्रवेश करेगा, उस समय आत्मा
के कुछ अवयव घट बढ़ जाया करेंगे। फिर जैसे देह छोटे
बड़े हो जाते हैं इसी प्रकार आत्मा के अंश भी घट बढ़ जायँगे।
यों आत्मा तो मध्यम परिमाण ही है ऐसा उन्होंने अपने मन
को समझा रक्खा है।
सांशस्य घटवन्नाशो भवत्येव, तथा सति ।
कृतनाशाकृताभ्यागमयोः को वारको भवेत् ॥८५॥
आत्मा को सावयव मानने पर घटादि की तरह उसका
नाश होगा ही। फिर कृतनाश और अकृताभ्यागम नाम के
दोषों को हटानेवाला कौन होगा उसे बताओ ? [किये हुए
पुण्य पाप जब बिना भोग दिये नष्ट हो जाते हैं तब उसे 'कृत-
नाश' कहते हैं। जब तो बिना किये ही कुछ भोगना पड़ जाता
है तब वह 'अकृताभ्यागम' कहा जाता है। आत्मा को अनित्य
मानने में ये दो दोष आते हैं।]
तस्मादात्मा महानेव नैवाणुर्नापि मध्यमः ।
आकाशवत् सर्वगतो निरंशः श्रुतिसम्मतः ॥८६॥
यों परिशेष से यही सिद्ध होता है कि यह आत्मा तो
महान् [विभु=व्यापक] ही है। यह न तो अणु है और न यह
मध्यम परिमाण वाला ही है। आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः
१०