Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

About this granth

Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.

The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.

This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.

Page 8Permalink

( च )
यह तो हमें भली प्रकार मालूम है कि हमारी तपस्या में जिस अनुपात
से त्रुटियें हैं उसी अनुपात से हमारे मनन में और इसी अनुपात से मनन
के द्वारा इस टीका में भी उन त्रुटियों का रहना अनिवार्य तो है ही, फिर
भी अपनी ओर से तो यह ध्यान रक्खा ही है कि अनुभवानुमोदित बातें ही
टीका में रक्खी जांय । परन्तु अनुवाद में तो ऐसी बहुत सी बातें रह ही
गयी हैं कि जिनको कोरा ज्ञान ही ज्ञान कहा जा सकता है । विज्ञान किंवा
अनुभव नहीं कहा जा सकता । लगन जब होती है तब मनुष्य की अवस्था
और परिस्थितियें स्वयमेव ज्ञान का विज्ञान बनाती जाती हैं । इसके सिवाय
इनका और काम ही क्या है ? कहना चाहिये कि यह संपूर्ण संसार ज्ञान का
विज्ञान बनाने के लिये ही तो है । परन्तु सब ज्ञानों को अनुभवानुमोदित
कराने में जितना लम्बा समय अपेक्षित है उतना लम्बा धैर्य न रख सकने
के कारण शीघ्र ही इस टीका को प्रकाशनार्थ आना पड़ रहा है ।
पूज्य श्री अच्युतमुनि जी के शब्दों में "यह ग्रन्थ वेदान्त का प्रारम्भिक
ग्रन्थ भी है और सर्वमान्य होने से अन्तिम ग्रन्थ भी है । अद्वैत वेदान्त पर
अद्वैत सिद्धि नाम का जो प्रसिद्ध ग्रन्थ है उसको समग्र पढ़ लेने पर भी
उतना आनन्द नहीं आता जितना इसके एक एक श्लोक को पढ़ लेने से
आ जाता है ।" इसकी टीका को लिखते समय मूल ग्रन्थ के संस्कृत
टीकाकार रामकृष्ण विद्वान् की टीका से हमने बहुत सहायता ली है ।
इस ग्रन्थ की आवृत्ति करते समय जो जो सूक्ष्म विचार समझ में आये
हैं, उनको या तो टीका ही में या फिर संक्षेपों में जहाँ तहाँ लिख ही डाला
है । फिर भी हमारे समझे हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ के तात्पर्य को थोड़े से थोड़े
शब्दों वाले एक वाक्य में, यहां भूमिका के रूप में कह देना इस लिये
आवश्यक प्रतीत होता है कि इससे पाठकों को इस ग्रन्थ को पढ़ने का दृष्टि-
कोण हाथ आ जायगा और इस बहाने भूमिका लिखने के सदाचार का
पालन भी हो जायगा ।

Page 9Permalink

( छ )
गंभीर विचार जिस समय तक नहीं किया जाता, तब तक तो ऐसा
प्रतीत होता है कि संसार में ये जितने भी उद्योग किये जा रहे हैं, ये सब
के सब जीवन को चालू रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। यदि ये उद्योग
चालू न रक्खे जायंगे तो जीवनतत्व की समाप्ति ही हो जायगी। क्योंकि
जीवन को स्थिर बनाये रखने वाला जो कि आनन्द नाम का तत्व है, इन
उद्योगों के बिना, उसके मिलने का दूसरा कोई मार्ग है ही नहीं। हम
प्राणियों के हृदय पर इसी एक अविचारित भावना ने अपना अखण्ड आधिपत्य
जमा कर रक्खा है। परन्तु जो लोग धीरज धर कर इन्द्रियजन्य अनुभूतियों
से ऊपर उठकर शुद्ध अनुभूति में पहुँच चुके हैं, जो लोग साहस करके
पंचभूतमिश्रित अनुभूतियों की परिधि से बाहर निकल गये हैं, उनके कहने
से तो मालूम होता है कि बात इससे सर्वथा विपरीत है। जीवनतत्व को
शरीर मात्र में स मत मान लेना ही, और यों जीवनतत्व को सर्वथा न
समझना ही, इस भावना का सबसे बड़ा दोष है। संसार के ये जितने भी
अहर्निश उद्योग हैं ये तो सबके सब ही जीवन को शरीरमात्र में बन्दी
बनाये रखने वाले हैं, और उसी बन्दी जीवन के कारण आनन्द के व्यापक
साम्राज्य को भोगना छुड़ा कर, उसी आनन्द के सैकड़ों बाधाओं से आक्रान्त
और क्षुद्र से भी क्षुद्र कणों को चाट चाट कर, जीवन के दिन जिस किसी
भी प्रकार काट देने के लिये हैं। यह सब उद्योग तो जीवन का जो सच्चा
आनन्द है उससे—अपने ही घातक प्रयत्नों से—वंचित रह जाने के लिए हैं।
परन्तु असल बात तो यह है कि हमारा प्यारे से भी प्यारा यह जीवनतत्व
हमारे ही इस पंचभौतिक शरीर में सीमित नहीं है। औरों के शरीर में भी
सर्वथा हमारे ही जैसा, प्यारों से भी प्यारा, यह जीवनतत्व रह रहा है।
इतना ही क्यों जहां कोई भी शरीर नहीं है, ऐसा जो खाली स्थान हमें दीख
पड़ता है, वहाँ भी तो यह जीवनतत्व ठसाठस भरा पड़ा ही है। यह तत्व
तो शिला की तरह ठोस है—इसमें दूसरे तत्व के समाने की गुंजाइश ही

Page 10Permalink

( ज )
नहीं है। सारे संसार में से खोज कर तिल भर स्थान भी तो ऐसा नहीं
निकाला जा सकता, जहाँ कि यह जीवनतत्व भरा न पड़ा हो—जहाँ सत्य
न हो, जहाँ ज्ञान न हो, या जहाँ आनन्द न हो ऐसा कोई स्थान है ही नहीं।
ऐसे स्थान का होना संभव है ही नहीं। सम्पूर्ण स्थान इसी आस्वान् ज्ञान-
रूप जीवनतत्व से लिपटे पड़े हैं और इसीकी ज्ञानमयी गोद में बैठ जाने
के कारण ही तो प्रकाशित हो रहे हैं। यह जीवनतत्व तो संसार भर में परि-
पूर्ण हो रहा है। कहना तो यों चाहिये कि सम्पूर्ण संसार पारावाररहित
इसी जीवनतत्व के एक क्षुद्र अज्ञात कोण में रह रहा है। यह लम्बा चौड़ा
संसार इसी देदीप्यमान जीवनतत्व का एक क्षुद्र बुद्बुद है। प्राणियों की
ओर से जितने भी अहर्निश उद्योग किये जा रहे हैं ये सब के सब तो इस
जीवनतत्व की व्यापकता को भुला डालने के लिये हैं और उसको अपने ही
शरीर में बन्दी बना डालने के लिये हैं तथा इसके परिणामस्वरूप अनन्त
आधियों और व्याधियों को अपने में निमन्त्रण दे देने के लिये हैं। यह प्राणी
जब तक अपने को उस व्यापक जीवन तत्व से पृथक् समझता रहेगा, तब
तक दूसरों को भी उस व्यापक तत्व से पृथक् ही समझा करेगा। जब यह
प्राणी जीवनतत्व को अपने ही शरीर में सीमित समझ लेता है, तब उसका
दुष्परिणाम यह होता है कि वह दूसरों के जीवन से और परिणाम में तो
अपने ही व्यापक जीवन से, प्रेमरहित बर्ताव खटकके कर पड़ता है। फिर
तो वह जो कुछ भी करता है, उसका कर्तव्याकर्तव्य, उसकी प्रवृत्ति निवृत्ति,
उसका आचार आदि सभी कुछ शरीर के लाभालाभ पर निर्भर हो जाते हैं।
यों इस विचार के परिणामस्वरूप प्राणी में आसुरी प्रवृत्ति बढ़ने लगती
है। संसार में जो बड़ी मार धाड़ जब तब होती रहती हैं वे ऐसे ही लोगों
के कारण होती हैं। ऐसे लोग किसी भी वहम में फँस जाने पर फिर उल्टा
सीधा कुछ भी नहीं देखते हैं; यह तो किसी भी प्रकार अपना काम बना
लेना चाहते हैं भले ही उसके लिये दूसरों के कितने ही प्राणों और स्वार्थों

Page 11Permalink

( झ )
की आहुति दे देनी पड़ जाय। ये प्रलय तक के प्रबन्ध करते हैं, मानो यहां से
कभी जाना ही नहीं है। ये अगले संसार के अस्तित्व को निर्भीकता से
निषेध करते हैं। सैकड़ों आशाओं से वद्ध होकर और काम क्रोध के दास
होकर कामभोग के लिये अन्यायपूर्वक धनोपार्जन करने में थोड़ा सा भी
संकोच इनको नहीं होता। इनकी दृष्टि में इनसे बड़ा कुलीन, बुद्धिमान,
बलवान् कोई दूसरा होता ही नहीं। दूसरों की प्रतिष्ठा का तो ये कुछ भी
मूल्य समझते ही नहीं।
ऐसे जीवन में बस एक ही काम रह जाता है कि अपनी बेसमझी से
प्रेरित होकर पहले तो कुछ इच्छा कर ली और पीछे उस इच्छा को पूरी
करने में प्राणों तक की बाजी लगा बैठे और इच्छित विषय मिल गया तो
उसे भोगने लगे। संक्षेप में ऐसों का जीवन कामोपभोगतत्पर जीवन बन
जाता है। किसी भी भ्रान्त इच्छा के दास बन जाना और उसके पीछे सैकड़ों
उपद्रव खड़े कर देना बस इसी बात में इनके अनन्त आयुष्य समाप्त हो
जाते हैं। इनकी इस प्रवृत्ति का पूरा पूरा दुष्परिणाम जब तक नहीं निकल
आता और जब तक कि अन्दर से इस प्रवृत्ति की अस्वीकृति नहीं आजाती,
तब तक यह आसुरी प्रवृत्ति बढ़ती ही जाती है। इसके विपरीत जब तो जीवन
तत्व की सर्वव्यापकता समझ में आती है—जब जीवन तत्व का शरीर
मात्र में सीमित होना किसी तरह समझ में आता ही नहीं—तब मनुष्य
में स्वभाव से दैवी गुणों का प्रवेश होने लगता है। फिर किसी से भय नहीं
लगता । संसार के रहस्य पर दृष्टि जम जाती है। अब वह क्षुद्र अहं का
दास न रह कर पूर्ण अहं का उपासक बन जाता है। व्यापक जगदात्मा का
मैं भी एक क्षुद्र अवयव हूँ इस भाव से प्रभावित होकर व्यापक जगदात्मा
की सेवा के भाव से—उसको प्रसन्न करके इस का दर्शन लेने की भावना
से—दूसरों की सहायता करता है। क्षुद्र अहं में बांध रखने वाली इन्द्रियों
को तो दम की भारी बेड़ी में बांध कर रख देता है। जो काम करता है

Page 12Permalink

( ञ )

उसी को व्यापक जगदात्मा की सेवा समझ कर करता है। सदा शुभ विचारों
में रत रहता है। अपने में कभी भी किसी अपूर्णता को आने नहीं देता।
अपने उदार विचारों के अनुकूल अपनी जीवनचर्या बनाकर रखता है।
घटघटवासी नारायण के दर्शन सब जीवों में करने के कारण सब के साथ
निष्कपट बर्ताव करता है। अपने उदात्त विचारों को कभी भी काम क्रोध
आदि विकारों से दबने नहीं देता। सत्य की रक्षा में सर्वात्मना तत्पर
रहता है। अपकारक पर क्रोध करके कर्त्तव्यभ्रष्ट नहीं हो जाता है। अपनी
जीवनयात्रा के उपकरणों से स्नेहपाश में बँध कर नहीं रहता। दिव्यता का
आह्वान करने वाले इत्यादि सभी गुण उसमें आ बसते हैं। जब उसे मालूम
हो जाता है कि ये सम्पूर्ण उद्योग इसी व्यापक जीवनतत्व को खोज
निकालने के लिये हैं। अब तो वह जीवन के प्रत्येक अनुभव में सत्य के
दर्शन करने लगता है। उसके जीवन की प्रत्येक घटना उसे सत्य और ज्ञान
का पवित्र सन्देश ला ला कर सुनाने वाली बन जाती है। जब कोई प्राणी
अपने यज्ञिय उद्योगों से, किंवा यज्ञमय जीवन से, अथवा व्यापक जगदात्मा
को सर्वसाक्षी मान कर दिये गये कर्मों से जीवनतत्व को खोज चुकता है,
तब उसके उद्योग समाप्त हो जाते हैं। फिर तो देश और काल के अनन्त मैदान
पर अखण्ड शासन करने वाला जीवन ही जीवन शेष रह जाता है। जीवन
के लिये फिर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहजाता। कर्तव्य तो जीवनतत्व के
अज्ञान को जीवित रखने के लिए ही होते हैं या फिर जीवनतत्व का दर्शन
कराने के लिए ही होते हैं। फिर इस अनन्त जीवन को मैं की छोटी चादर
उड़ाने वाला कोई नहीं रह जाता। यह सत्य और ज्ञान रूप व्यापक जीवन-
तत्व हम किसी से भी भिन्न नहीं है। परन्तु इसका हमारे साथ कोई ऐसा
सम्बन्ध भी नहीं है कि इसे हम 'मैं' या 'मेरा' कह सकें। जैसा यह हमको
अपना आत्मा मालूम है, ऐसे ही यह औरों को भी अपना आत्मा-स्वरूप
मालूम होता है। हममें से कोई एक जैसे इस शरीर को 'मैं' कह देते हैं

Page 13Permalink

वैसे इस व्यापक आत्मा को 'मैं' नहीं कह सकते । साथ ही हममें से कोई
भी अपने को इस से भिन्न कहने का उचित दावा भी नहीं कर सकता, तब
तो केवल इसका दर्शन कर करके प्रमुदित रहना आ जाता है और इसी प्रमोद
में 'मैं' का रहा सहा अस्तित्व भी सदा के लिये मिट जाता है। इस सत्य
ज्ञान रूप व्यापक जीवनतत्व की बात जब मन और बुद्धि की समझ में
आ जाती है और मन के समझे को जब अहंकार अपना लेता है और अहंकार
के अपनाय चित्त की अखण्ड स्मृति पर जब चढ़ जाते हैं, तब संसार के
सम्पूर्ण जीव और समस्त पदार्थ एकतत्व बन जाते हैं। परेऽव्यये सर्व एकी
भवन्ति की पहेली यहाँ आकर समझ में आने लगती है।
परन्तु व्यापक जीवनतत्व की बात समझ में आने में इस तत्व के
आधार से प्रतीत होने वाली विश्वरचना ही सब से बड़ा विघ्न है। जैसे
सांप रस्सी को दीखने नहीं देता और देखने वाले के तथा रस्सी के बीच
में आकर खड़ा हो जाता है, इसी प्रकार इस व्यापक ज्ञानरूप जीवनतत्व
के और हमारे बीच में आकर खड़ी हो गयी हुई विश्वरचना ने हमारा सम्पूर्ण
ध्यान अपनी ओर खींच कर, जो अतत्व है उसी का दर्शन हमें करा रक्खा है
और तत्व की प्रतीति को रोक दिया है। इस ग्रन्थ में उस तत्व के दर्शन के
विघ्नों को हटाने की विधि को बताते हुए तत्व दर्शन करने की विधि तत्वविवेक
नाम के प्रथम प्रकरण में वर्णित है। दूसरे तीसरे और चौथे प्रकरणों में
तत्व दर्शन के जो तीन प्रधान विघ्न हैं उनको ही तत्वदर्शन का सहायक
बना लेने की विधि पर विचार किया है। पांचवें महाकाव्यविवेक नाम
के प्रकरण में आगम किंवा अनुभवप्रधान हो जाने पर अनुभूति का जो-जो
व्यावहारिक रूप हो जाता है उसका वर्णन है। छठे चित्रदीप नाम के प्रकरण
में अपनी ही अज्ञानतूलिका से लिखे हुए जगच्चित्र को अपने सत्यान्वेषी
प्रयत्नों से मिटा कर स्वयं अकेला शेष रह जाने की विधि पर प्रकाश डाला
है। तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में बताया है कि व्यापक जीवनतत्व के स्वरूप

Page 14Permalink

( ऊ )
का परिज्ञान होने पर जब मन में किसी भी प्रकार के सुख की इच्छा शेष
नहीं रह जाती तभी सच्चे सुख का आविर्भाव होता है। कूटस्थदीप में
चेतनाकार बनी हुई बुद्धियों की संधियों को भी और बुद्धियों के अभावों
को भी प्रकाशित करती रहने वाली सामान्य कूटस्थ चेतना का दर्शन कराया
गया है। जो लोग ब्रह्मतत्त्व का विचार नहीं कर सकते परन्तु उसके दर्शन
पर श्रद्धा रखते हैं उनके लिये उपासना किंवा योग की विधि बताने के
लिये ध्यानदीप नाम का प्रकरण है। नाटकदीप प्रकरण में कुतूहल वश
खेले गये इस जगन्नाटक के पटक्षेप करने की विधि पर विचार किया है।
पिछले पांचों प्रकरणों में अनेक द्वारों से आनन्द रूप का दर्शन कराते हुए
ब्रह्मतत्त्व का वर्णन किया है। यों इस ग्रन्थ में एक ही व्यापक जीवनतत्त्व
को पन्द्रह प्रकार से दिखाया गया है।
अब संक्षेप में ग्रन्थकार का थोड़ा सा परिचय देना भी आवश्यक
प्रतीत होता है—
पंचदशी के रचयिता श्री विद्यारण्य महामुनि अत्यन्त त्यागी अत्यन्त
बुद्धिमान व्यवहारचतुर कर्त्तव्यदक्ष और महाविभूतियुक्त पुरुष थे। इन्होंने
दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य की स्थापना युक राजा के द्वारा करायी थी
और उस साम्राज्य का संचालन भी ये स्वयं ही करते थे। ई० सन् १३३५
में हुकराय और बुकराय भाइयों ने सेना आदि जुटाकर इनकी सलाह से
विजयनगर राज्य की स्थापना की थी। उसके बाद विजयनगर
का साम्राज्य बढ़ने लगा और बड़े ठाट बाट से चलता रहा। ऐसे महान्
राज्य की स्थापना और संचालना जिस महापुरुष के द्वारा हुई थी उन
श्री विद्यारण्य मुनि का जन्म लगभग १३०० शालिवाहन में हुआ था।
कम से कम १३९१ तक ये जीवित रहे हैं। अपने सम्बन्ध में अपने ग्रन्थों
में इन्होंने जो लिखा है उससे मालूम होता है कि इनका पूर्वाश्रम का नाम
'माधवाचार्य' था, ये माधव मन्त्री के नाम से उसी समय प्रसिद्धि पा चुके

Page 15Permalink

( ङ )

थे । चतुर्थ आश्रम में इन का नाम 'विद्यारण्य' हो गया था । इनके पिता
का नाम 'मायण' और माता का नाम 'श्रीमती' था । 'सायण' और 'भोग-
नाथ' नामक दो छोटे भाई थे । 'सर्वज्ञविष्णु' तथा 'भारतीतीर्थ' नाम के
इनके दो गुरु थे । पूर्व आश्रम में राज्य के कार्य में परम प्रवीण रहते हुए
इन्होंने असाधारण योग्यता से उच्च कोटि के ग्रन्थ बनाकर वेद शास्त्रों की
प्रतिष्ठा भी बढ़ायी थी । फिर संसार से विरक्त होकर संन्यास दीक्षा लेकर
विद्यारण्य मुनि नाम से शृङ्गेरी मठ के शंकराचार्य बने थे ।
जिस कुटुम्ब में ये उत्पन्न हुए थे यह एक छोटा सा ब्राह्मणकुटुम्ब था ।
इस कुटुम्ब के सभी, बालक बड़े बुद्धिमान और कर्तृत्वशाली हुए । सायण
तो वेदभाष्यकार के नाते प्रसिद्ध ही हैं । भोगनाथ भी शीघ्र ही संन्यासी
हो गये थे । ये माधवाचार्य स्वयं पढ़ पढ़ाकर नयी अवस्था में ही तपस्या
के लिये वन चले गये थे । जब ये वन में तपस्या कर रहे थे तब हुक्क वुक्क
नाम के राजपुत्रों से भेंट होने के बाद सन् १३९१ तक इस महापुरुष का
सारा ही समय भारी राजनैतिक कारवार, अत्यन्त गहन और उपयुक्त ग्रन्थों
के निर्माण और शृंगेरी पीठ के स्वामी की हैसियत से धर्माधिकार चलाने में
बीता था। उन्होंने एक श्रेष्ठ कर्मयोगी की भाँति निष्काम बुद्धि से राज्यस्थापन
और धर्म रक्षण के कार्य करके आर्य संस्कृति को जीवित रक्खा था । वे
किस मनोभावना से अपना निष्काम कर्म करते थे यह इनके पंचदशी के---
"ज्ञानेनाचरितुं शक्य सम्यग् राज्यादि लौकिकम्"
"ज्ञानी लोग राज्य आदि लौकिक कामों को अच्छी तरह से चला सकते हैं ।
ज्ञानी का ज्ञान यदि परिष्कृत है सच्चा है तो राज्य के गहन कारबार भी
उसे दबा नहीं सकेंगे"इस वाक्य से बहुत ही स्पष्ट हो जाता है। इन्होंने उस
राज्य में किस प्रणाली से क्या क्या सुधार किये इसका ब्योरा अभी
तक भी इतिहासज्ञ लोग नहीं बता सके हैं।

Page 16Permalink

( ढ )

निम्नलिखित ग्रन्थों से ग्रन्थकार के नाते श्रीविद्यारण्यमुनि का
सम्बन्ध जाना गया है—
१ ऋग्वेद भाष्य, २ यजुर्वेद भाष्य, ३ सामवेद भाष्य, ४ अथर्ववेद
भाष्य, ५ चारों वेदों के शतपथ ऐतरेय तैत्तिरीय ताण्य आदि ब्राह्मण ग्रन्थों
का विचार, ६ दशोपनिषद्दीपिका, ७ जैमिनीय न्यायमालाविस्तर, ८ पंचदशी,
९ अनुभूतिप्रकाश, १० ब्रह्मगीता, ११ पाराशर स्मृति भाष्य, १२ मनुस्मृति-
व्याख्यान, १३ सर्वदर्शनसंग्रह, १४ माधवीय धातुवृत्ति, १५ शंकरदिग्विजय,
१६ कालनिर्णय ।
कई लोगों के मत से वेदभाष्यकर्ता इनके छोटे भाई 'सायणाचार्य'
ही थे। इन ग्रन्थों को सायणमाधवीय कहने से यह मालूम होता है कि
वेदभाष्य से इनका रचयिता का सम्बन्ध न भी हो तौ भी उसमें इनका
हाथ अवश्य था।
विद्यारण्य स्वामी की पंचदशी जिस पर कि यह भाषा टीका लिखी
गई है सेतुबन्ध रामेश्वर से लेकर हिमालय तक अद्वैतवेदान्त पर सर्वमान्य
ग्रन्थ समझा जाता है।

निवेदक—
लेखन स्थान— रामावतार
श्रद्धेय श्री अच्युतमुनि जी का रतनगढ़ (जि० बिजनौर)
आश्रम, गंगातीर हिन्दप्रान्त

Contents

Page 17Permalink

विषयसूची
पृष्ठ से पृष्ठ तक
प्रणाम क— ग
प्राक्कथन घ— ढ
१. तत्त्वविवेकप्रकरण १— ३२
२. पंचभूतविवेकप्रकरण ३३— ७१
३. पंचकोशविवेकप्रकरण ७२— ९०
४. द्वैतविवेकप्रकरण ९१—११७
५. महावाक्यविवेकप्रकरण ११८—१२३
६. चित्रदीपप्रकरण १२४—२२१
७. तृप्तिदीपप्रकरण २२२—३२९
८. कूटस्थदीपप्रकरण ३३०—३५५
९. ध्यानदीपप्रकरण ३५६—४०४
१०. नाटकदीपप्रकरण ४०५—४१३
११. ब्रह्मानन्द में योगानन्दप्रकरण ४१४—४६७
१२. ब्रह्मानन्द में आत्मानन्दप्रकरण ४६८—५००
१३. ब्रह्मानन्द में अद्वैतानन्दप्रकरण ५०१—५३७
१४. ब्रह्मानन्द में विद्यानन्दप्रकरण ५३८—५५६
१५. ब्रह्मानन्द में विषयानन्दप्रकरण ५५७—५६६
१६. पंचदशी के प्रत्येक प्रकरण के भावपूर्ण संक्षेप १—१३८

Page 18Permalink

अद्वैतवाद पर कुछ उपयुक्त ग्रन्थावलि

'उपनिषदें | वैज्ञानिक अद्वैतवाद
भगवद्गीता उपनिषत् | संक्षेप शारीरक
शारीरक भाष्य | वाक्यसुधा
शंकराचार्य के प्रकरणग्रन्थ | उपदेश-साहस्री
पंचदशी | सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह
दक्षिणामूर्ति और वार्तिक | विवेक-चूड़ामणि
पंचीकरण और वार्तिक | बोधसार
आत्मपुराण | स्वामी रामतीर्थ के लेख आदि
भागवत | योगवासिष्ठ
अनुभूतिप्रकाश | सनत्सुजात संवाद(शंकराचार्य
दासबोध | कृत टीका)
त्रिपुरारहस्य | ज्ञानेश्वरी गीता टीका
वार्तिकसार | अध्यात्म पटल
जीवन्मुक्तिविवेक | स्वराज्य सिद्धि
उपनिषदों के उपदेश | शतश्लोकी

1. Tattvaviveka

Page 19Permalink

ओम्
पञ्चदशी
तत्त्वविवेकप्रकरणम्
नमः श्रीशंकरानन्दगुरुपादाम्बुजन्मने ।
सविलासमहामोहग्राहग्रासैककर्मणे ॥ १ ॥
विलास [अर्थात् अपने कार्य] सहित जो महामोह [किंवा
मूलाज्ञान] रूपी महादुःखदायी ग्राह है, उस को ग्रस लेना ही
जिस चरण-कमल का एक मुख्य काम है, श्री शंकरानन्द
नाम के गुरुदेव के उस चरण-कमल को हमारा प्रणाम हो—
अर्थात् हम अपने आप को गुरुदेव के चरणों में अभेद भाव से
अर्पण किये देते हैं ।
तत्पादाम्बुरुहद्वन्द्वसेवनिर्मलचेतसाम् ।
सुखबोधाय तत्वस्य विवेकोऽयं विधीयते ॥२॥
ऐसे गुरु के चरण-कमलों की सेवा से जिनका चित्त निर्मल
[रागादि शून्य] हो चुका हो, उनको सुखबोध [सरलता से तत्व-
ज्ञान] कराने के लिए, अब तत्व [अनारोपित किंवा सत्यस्वरूप]
का विवेचन किया जाता है । [पंचकोश नाम के इस आरोपित
जगत् में से अब उस अनारोपितस्वरूप अखण्ड सच्चिदानन्द
वस्तु को पृथक् करके दिखाया जाता है] ।

Page 20Permalink

२ पञ्चदशी
शब्दस्पर्शादयो वेद्या वैचित्र्याज्जागरे पृथक् ।
ततो विभक्ता तत्संविदैकरूप्यान्न भिद्यते ॥३॥
जागरण अवस्था में, शब्द स्पर्श आदि वेद्य पदार्थ विचित्रता के
कारण पृथक्-पृथक् होते हैं, परन्तु उनका ज्ञान उनसे विभक्त रहना
है। एक रूप होने के कारण उस ज्ञान में कभी भेद नहीं होता।
इन्द्रियों से विषयों के ग्रहण को ‘जागरण’ कहते हैं। उस
जागरण नाम की अवस्था में वेद्य कहलाने वाले जो शब्द स्पर्श
आदि पदार्थ हैं तथा उनके आश्रय जो आकाशादि पदार्थ हैं, वे
विचित्रता के कारण परस्पर भिन्न भिन्न होते हैं। परन्तु उन
शब्दादियों का [बुद्धि की सहायता लेकर उनसे पृथक् किया
हुआ] ज्ञान, एक ही रूप का होने के कारण, अथवा ज्ञान-ज्ञान-
ज्ञान-इस समान रूप से प्रतीत होने के कारण, आकाश के समान
ही भिन्न नहीं हो जाता। दूसरे शब्दों में इसे यों कहना चाहिये
कि ज्ञान में स्वभाव से कोई भेद ही नहीं है। क्योंकि आकाश
के समान उपाधि के परामर्श [कथन] के बिना उसमें भेद की
संभावना ही नहीं रहती। शब्द-ज्ञान में स्पर्श-ज्ञान से स्वयं कोई
भेद नहीं है, क्योंकि ज्ञान ज्ञान सब एक से ही होते हैं। उनमें
जो भेद प्रतीत होने लगा है, वह तो औपाधिक भेद है। ऐसे
तो एक अखण्ड आकाश में भी घटाकाश मठाकाश आदि भेद
पाये जाते हैं। परन्तु वह सच्चे भेद नहीं होते। उन औपाधिक
भेदों से जैसे आकाश में भेद नहीं आता, इसी प्रकार औपाधिक
भेदों से ज्ञान में भी भेद को अवकाश नहीं मिलता।
तथा स्वप्ने, ऽत्र वेद्यं तु न स्थिरं जागरे स्थिरम् ।
तद्भेदात्तत्तयोः संविदेकरूपा न भिद्यते ॥४॥

Page 21Permalink

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ३
स्वप्न में भी यही होता है, [वहां भी ज्ञान में भेद नहीं होता।
विशेषता इतनी है कि] इस स्वप्न-काल में वेद्य पदार्थ स्थिर नहीं
होते, [प्रातिभासिक होते हैं] जागरण में तो वे स्थिर [व्यावहा-
रिक] होते हैं। इस कारण स्वप्न और जागरण का तो भेद हो
जाता है। परन्तु इन दोनों अवस्थाओं में होने वाला 'ज्ञान' तो
एकरूप ही है। इसी से उसमें भेद नहीं होता।
जिस प्रकार जागरण में विचित्रता के कारण, विषयों का
तो भेद है, तथा एकरूपता के कारण ज्ञान का अभेद है, ठीक
यही अवस्था स्वप्न की भी है। इन्द्रियों का उपसंहार हो जाने पर
जागरण के संस्कारों से उत्पन्न हुआ विषय सहित ज्ञान 'स्वप्न'
कहाता है। उस स्वप्नावस्था में भी केवल विषय ही परस्पर भिन्न
होते हैं। ज्ञान में तब भी कोई भेद नहीं होता। स्वप्न और जाग-
रण में भेद तो केवल इतना ही है कि स्वप्न में दृश्यमान वेद्य
पदार्थ स्थिर नहीं होते, वे केवल प्रातीतिक होते हैं। जागरण में
तो दीखने वाली वस्तुयें स्थायी होती हैं। वे कालान्तर में भी देखी
जा सकती हैं। केवल अस्थिरता और स्थिरता के कारण ही इन
दोनों में भेद है। परन्तु उन दोनों के ज्ञान में भेद नहीं है क्योंकि
वह तो एकरूप ही है।
सुप्तोत्थितस्य सौषुप्ततमोबोधो भवेत् स्मृतिः ।
सा चावबुद्धविषयाऽवबुद्धं तत्तदा तमः ॥५॥
सोकर उठे हुए पुरुष को जब सुषुप्ति काल के अज्ञान का
बोध होता है तो वह उसकी स्मृति होती है, वह स्मृति जाने बूझे
विषय की ही होती है। [ जिसका मतलब वह है कि ] उसने
सोते समय तम अथवा अज्ञान को जाना था।

Page 22Permalink

४ पञ्चदशी
सोकर उठे हुए पुरुष को जो सुषुप्ति काल के अज्ञान का ज्ञान
है जिससे वह कहता है कि 'मैंने सोते समय कुछ भी जाना नहीं'
वह उसका एक स्मरण ही है । वह स्मरण तो अनुभव किये हुए
विषय का ही होता है । जो भी कोई स्मृति होती है उससे प्रथम
अनुभव का होना सर्वमान्य सिद्धान्त है । इससे यही सिद्ध होता
है कि सुषुप्ति में रहने वाले उस तम को अर्थात् अज्ञान को तत
उसने अनुभव किया था।
स बोधो विषयाद्भिन्नो न बोधात् स्वप्नबोधवत् ।
एवं स्थानत्रयेऽप्येका संवित् तद्वद्दिनान्तरे ॥६॥
मासाब्दयुगकल्पेषु गतागम्येष्वनेकधा ।
नोदेति नास्तमेत्येका संविदेषा स्वयंप्रभा ॥७॥
सुषुप्ति समय का वह ज्ञान अपने विषय [सुषुप्तिकाल के
अज्ञान] से तो भिन्न होता है परन्तु वह (स्वप्नबोध) के समान् ही
बोध से भिन्न कदापि नहीं होता । इस प्रकार एक दिन की जाग्र-
दादि तीनों अवस्थाओं में, दूसरे दिनों में, मास, वर्ष, युग तथा
कल्पों तक में, जो बीत चुके या आगे आयेंगे, एक ही ज्ञान बना
रहता है । इसका कभी उदय या विनाश नहीं होता । यह ज्ञान
एक स्वयंप्रकाश तत्व है ।
सुषुप्ति काल के अज्ञान का वह बोध [अनुभव] भी अपने
अज्ञान नाम के विषय से भिन्न तो होना ही चाहिये। परन्तु स्वप्नबोध
के समान दूसरे बोध से [उसके] भिन्न होने का कोई कारण ही
नहीं है । इस प्रकार एक दिन की जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं में
एक ही ज्ञान रहता है । इसी रीति से दूसरे दिन में भी ज्ञान की
अभिन्नता को समझ लेना चाहिये । जैसे एक दिन की तीनों अव-

Page 23Permalink

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ५
स्थाओं में एक ही ज्ञान बना रहता है, इसी प्रकार दूसरे दिन में
तथा अनेक प्रकार से बीते हुए तथा आगामी महीनों वर्षों युगों
और कल्पों तक में एक अभिन्न ज्ञान ही बना रहता है । ज्ञान के
विषय तो भिन्न भिन्न होते जाते हैं, परन्तु ज्ञान में भेद कभी नहीं
आता। दीपक के समान एक होने के कारण यह ज्ञान न तो उत्पन्न
होता है और न विनष्ट ही होता है । यदि इस ज्ञान के भी उत्पत्ति
और विनाश मानोगे, तो इन उत्पत्ति विनाशों को देखने वाला
[साक्षी] कौन होगा ? अपने उत्पत्ति विनाशों को स्वयं वह ज्ञान
ही देखे, यह बात भी संभव नहीं है । इन उत्पत्ति विनाशों को
ग्रहण करने वाला दूसरा कोई ज्ञान भी नहीं पाया जाता। इस
कारण इस ज्ञान को उदय अस्त से रहित तत्व माना जाता है ।
यह ज्ञान तो स्वयंप्रकाश है। स्वयंप्रकाश हो कर भासित होने
वाला यह ज्ञान ही, इस सकल जगत् का प्रकाश कर रहा है। इसी
कारण यह जगत् अन्धा होने से बच रहा है। यदि यह ज्ञान न
होता तो यह जगत् अन्धा होता।
इयमात्मा परानन्दः परप्रेमास्पदं यतः ।
मा न भूवं हि भूयासमिति प्रेमात्मनीक्ष्यते ॥८॥
(यह ज्ञान ही आत्मा है) और यह परमानन्द स्वरूप भी है ।
क्योंकि यह परमप्रेम का आस्पद है । "मैं न रहूँ ऐसा कभी न
हो किन्तु मैं सदा बना रहूँ" ऐसा प्रेम आत्मा से सभी करते हैं।
यह संवित् [ज्ञान] ही आत्मा है और यह परमानन्द स्वरूप
भी है क्योंकि यह परमप्रेम अथवा निरतिशय [सर्वाधिक] प्रेम
का विषय है । इसको सब से अधिक प्रेम किया जाता है । "मैं
कभी न रहूँ ऐसा कभी न हो किन्तु मैं सदा ही बना रहूँ" ऐसा

Page 24Permalink

६ पंचदशी

एक सर्वाधिक प्रेम आत्मविषय में सभी का देखा जाता है। ऐसी
अवस्था में 'मुझको धिक्कार है' ऐसा जो एक द्वेष कभी कभी आत्मा
के विषय में पाया जाता है वह तो दुःख के सम्बन्ध के कारण से
दूसरी तरह से भी सिद्ध हो जाता है। इस कारण यह द्वेष आत्मा
की प्रेम-पात्रता को हटाने में असमर्थ रह जाता है। क्योंकि यह
प्रेम तो आत्मविषय में सब के अनुभव से सिद्ध हो रहा है।
तत्प्रेमात्मार्थमन्यत्र नैवमन्यार्थमात्मनि ।
अतस्तत् परमं तेन परमानन्दतात्मनः ॥९॥
वह प्रेम अपने लिए तो दूसरों से भी कर लिया जाता है,
परन्तु दूसरों के लिए अपने आपे से प्रेम करने की बात ठीक नहीं
जँचती। इस कारण आत्मप्रेम ही परमप्रेम है। इसीसे आत्मा की
परमानन्दता सिद्ध हो जाती है।
अपने से भिन्न पुत्र आदि में भी जब प्रेम दीख पड़ता हो तब
धोखे में आकर उसको स्वाभाविक प्रेम नहीं मान बैठना चाहिये।
क्योंकि वह प्रेम पुत्रादियों में आत्मार्थ ही होता है। उनमें स्वाभा-
विक प्रेम किसी को नहीं होता। इसके विपरीत लोगों को जो
आत्मा में प्रेम होता है वह प्रेम किसी दूसरे के लिए नहीं होता।
किन्तु वह अपने लिये ही होता है। यों निरुपाधिक [अथवा
निर्व्याज] होने के कारण यह आत्म-प्रेम ही परम [अर्थात् निर-
तिशय] प्रेम कहाता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि निर-
तिशय प्रेम का आस्पद होने से, आत्मा ही परमानन्द स्वरूप [किंवा
निरतिशय सुखरूप] है।
इत्थं सच्चित्परानन्द आत्मा युक्त्या, तथाविधम् ।
परं ब्रह्म, तयोरैक्यं श्रुत्यन्तेषूपदिश्यते ॥१०॥

Page 25Permalink

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ७
इस प्रकार युक्ति से आत्मा सच्चित् तथा परानन्दरूप सिद्ध
हो गया। वेदान्तों में परब्रह्म को भी सच्चिदानन्द स्वरूप ही बताया
गया है तथा उन वेदान्तों ने उन दोनों की एकता का उपदेश भी
कर दिया है।
इस प्रकार आत्मा की सत् चित् तथा परमानन्दता का सम-
र्थन युक्ति से हो गया। परब्रह्म भी वैसा ही सच्चिदानन्द स्वरूप है
वेदान्तों में आत्मा और ब्रह्म की [जिनको 'त्वं और तत्' भी कहते
हैं] एकता [किंवा अखण्ड एकरसता] का ही प्रतिपादन किया
गया है। इस एकता का प्रतिपादन करके ही वेदान्तों पर प्रामाण्य
आया है। आत्मा की सच्चिदानन्दरूपता का ज्ञान तो युक्ति से भी
हो जाता है, परन्तु आत्मा और ब्रह्म एक है इस बात का ज्ञान
वेदान्तों के सिवाय किसी और से होना संभव नहीं है।
अभाने न परं प्रेम, भाने न विषये स्पृहा।
अतो भानेऽप्यभातासौ परमानन्दतात्मनः ॥११॥
आत्मा की परमानन्दरूपता का अभान होने पर तो आत्मा
से परम प्रेम नहीं होना चाहिये, तथा भान होने पर विषयों की
इच्छा क्यों होनी चाहिये ? इस कारण यह मानना पड़ता है कि
परमानन्दरूपता, ज्ञात होने पर भी अज्ञात ही बनी हुई है।
आत्मा की परमानन्दरूपता के विषय में यह आक्षेप है किं
उसकी परमानन्दरूपता की उसे प्रतीति नहीं होती है अथवा हो
जाती है? यदि प्रतीति का होना नहीं मानते तो आत्मा से परम प्रेम
नहीं होना चाहिये। क्योंकि प्रेम तो विषय की सुन्दरता के ज्ञान से
उत्पन्न होने वाला एक पदार्थ है। यदि तो परमानन्दरूपता की
प्रतीति मानी जाय तो सुख के साधन स्रक्, चन्दन, वनिता आदि

Page 26Permalink

८ पञ्चदशी
भोगों की तथा उनसे उत्पन्न होने वाले सुखों की इच्छा ही प्राणी
को नहीं होनी चाहिये। क्योंकि जिसको साक्षात् फल प्राप्त होचुका
हो उसको साधनोंकी इच्छा ही कैसी? जिसको नित्य तथा निरति-
शय आनन्द का लाभ हो चुका हो उसे क्षणिक साधनों की पराधी-
नता आदि दोषों से दूषित, विषयसुखों की स्पृहा ही क्यों होनी
चाहिये ? इस कारण आत्मा की परमानन्दरूपता युक्तिसंगत
बात नहीं है। इस आक्षेप का समाधान यों करना चाहिये कि भान
और अभान दोनों पक्षों के दोषों को देखकर यों मानना पड़ता
है कि आत्मा की यह परमानन्दरूपता प्रतीत होने पर भी प्रतीत
नहीं होती है। जभी तो प्राणिवर्ग दो विरुद्ध कार्य एक साथ
करते हैं—वे अपने आप से परम प्रेम भी करते हैं और उन्हें
विषयों की इच्छा भी बनी ही रहती है। वे आत्मा को 'मैं' इस
रूप में तो जानते हैं परन्तु उन्हें यह मालूम नहीं होता कि 'मैं'
परमानन्दरूप हूँ ।
अध्येतृवर्गमध्यस्थपुत्राध्ययनशब्दवत् ।
भानेऽप्यभानं भानस्य प्रतिबन्धेन युज्यते ॥ १२ ॥
बहुत से पढ़ने वालों के बीच में बैठे हुए पुत्र के पढ़ने की
आवाज को जैसे उसका पिता जानता भी है और नहीं भी
जानता। इसी प्रकार आनन्द का भान होजाने पर भी अभान
हुआ रहता है। प्रतिबन्ध के कारण भान होना रुक जाता है
और ऊपर की बात युक्त हो जाती है।
बहुत से पढ़नेवालों के बीच में बैठे हुए पुत्र के पढ़ने का
शब्द जैसे उसके पिता को सामान्यतया भासमान होने पर भी
विशेष रूप से भासमान नहीं होता 'कि यह मेरे पुत्र का शब्द

Page 27Permalink

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ९
है। इसी प्रकार आनन्द का सामान्यतया भान रहने पर भी विशेष
रूप से अभान हो जाता है । उसका कारण यह है कि [जिस प्रति-
बन्ध का वर्णन हम अगले श्लोक में करेंगे उस] प्रतिबन्ध के प्रताप
से 'मैं हूँ' इस सामान्य रूप से आत्मा का भान होते रहने पर भी वह
विशेष रूप से [कि मैं सच्चिदानन्द हूँ] अप्रतीत रह ही जाता है ।
प्रतिबन्धोऽस्तिभातीतिव्यवहारार्हवस्तुनि ।
तन्निरस्य विरुद्धस्य तस्योत्पादनमुच्यते ॥१३॥
जिस आत्मवस्तु का व्यवहार 'है और प्रतीति भी हो रही है'
ऐसे स्पष्ट शब्दों में होना चाहिये था, उस आत्मवस्तु के उस
उचित व्यवहार को हटाकर उसके उलटे 'न तो है ही और न मुझे
प्रतीति ही हो रही है' ऐसे एक मिथ्या व्यवहार को उत्पन्न कर
देना ही 'प्रतिबन्ध' कहाता है ।
तस्य हेतुः समानाभिहारः पुत्रध्वनिश्रुतौ ।
इहानादिरविद्यैव व्यामोहै कनिबन्धनम् ॥१४॥
पुत्र शब्द-श्रवण [ वाले दृष्टान्त ] में तो उस प्रतिबन्ध का
कारण समानाभिहार [बहुतों के साथ मिलकर पढ़ना] होता है
तथा इस [दाष्टान्तिक] में तो समस्त विपरीत ज्ञानों का
एक मुख्य कारण अनादि [उत्पत्ति रहित] अविद्या ही प्रतिबन्ध
का कारण है [अनादि अविद्या का वर्णन आगे किया गया है] ।
चिदानन्दमयब्रह्मप्रतिबिम्बसमन्विता ।
तमोरजःसत्वगुणा प्रकृति र्द्विविधा च सा ॥१५॥
चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म के प्रतिबिम्ब से युक्त, तम रज तथा
सत्वगुण वाली, एक वस्तु 'प्रकृति' कहाती है । वह दो प्रकार की
होती है [जिनका कि कथन अगले श्लोक में किया जायगा]।