पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context( च )
यह तो हमें भली प्रकार मालूम है कि हमारी तपस्या में जिस अनुपात
से त्रुटियें हैं उसी अनुपात से हमारे मनन में और इसी अनुपात से मनन
के द्वारा इस टीका में भी उन त्रुटियों का रहना अनिवार्य तो है ही, फिर
भी अपनी ओर से तो यह ध्यान रक्खा ही है कि अनुभवानुमोदित बातें ही
टीका में रक्खी जांय । परन्तु अनुवाद में तो ऐसी बहुत सी बातें रह ही
गयी हैं कि जिनको कोरा ज्ञान ही ज्ञान कहा जा सकता है । विज्ञान किंवा
अनुभव नहीं कहा जा सकता । लगन जब होती है तब मनुष्य की अवस्था
और परिस्थितियें स्वयमेव ज्ञान का विज्ञान बनाती जाती हैं । इसके सिवाय
इनका और काम ही क्या है ? कहना चाहिये कि यह संपूर्ण संसार ज्ञान का
विज्ञान बनाने के लिये ही तो है । परन्तु सब ज्ञानों को अनुभवानुमोदित
कराने में जितना लम्बा समय अपेक्षित है उतना लम्बा धैर्य न रख सकने
के कारण शीघ्र ही इस टीका को प्रकाशनार्थ आना पड़ रहा है ।
पूज्य श्री अच्युतमुनि जी के शब्दों में "यह ग्रन्थ वेदान्त का प्रारम्भिक
ग्रन्थ भी है और सर्वमान्य होने से अन्तिम ग्रन्थ भी है । अद्वैत वेदान्त पर
अद्वैत सिद्धि नाम का जो प्रसिद्ध ग्रन्थ है उसको समग्र पढ़ लेने पर भी
उतना आनन्द नहीं आता जितना इसके एक एक श्लोक को पढ़ लेने से
आ जाता है ।" इसकी टीका को लिखते समय मूल ग्रन्थ के संस्कृत
टीकाकार रामकृष्ण विद्वान् की टीका से हमने बहुत सहायता ली है ।
इस ग्रन्थ की आवृत्ति करते समय जो जो सूक्ष्म विचार समझ में आये
हैं, उनको या तो टीका ही में या फिर संक्षेपों में जहाँ तहाँ लिख ही डाला
है । फिर भी हमारे समझे हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ के तात्पर्य को थोड़े से थोड़े
शब्दों वाले एक वाक्य में, यहां भूमिका के रूप में कह देना इस लिये
आवश्यक प्रतीत होता है कि इससे पाठकों को इस ग्रन्थ को पढ़ने का दृष्टि-
कोण हाथ आ जायगा और इस बहाने भूमिका लिखने के सदाचार का
पालन भी हो जायगा ।