Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 10 of 726

Read in context
Page 10

( ज )
नहीं है। सारे संसार में से खोज कर तिल भर स्थान भी तो ऐसा नहीं
निकाला जा सकता, जहाँ कि यह जीवनतत्व भरा न पड़ा हो—जहाँ सत्य
न हो, जहाँ ज्ञान न हो, या जहाँ आनन्द न हो ऐसा कोई स्थान है ही नहीं।
ऐसे स्थान का होना संभव है ही नहीं। सम्पूर्ण स्थान इसी आस्वान् ज्ञान-
रूप जीवनतत्व से लिपटे पड़े हैं और इसीकी ज्ञानमयी गोद में बैठ जाने
के कारण ही तो प्रकाशित हो रहे हैं। यह जीवनतत्व तो संसार भर में परि-
पूर्ण हो रहा है। कहना तो यों चाहिये कि सम्पूर्ण संसार पारावाररहित
इसी जीवनतत्व के एक क्षुद्र अज्ञात कोण में रह रहा है। यह लम्बा चौड़ा
संसार इसी देदीप्यमान जीवनतत्व का एक क्षुद्र बुद्बुद है। प्राणियों की
ओर से जितने भी अहर्निश उद्योग किये जा रहे हैं ये सब के सब तो इस
जीवनतत्व की व्यापकता को भुला डालने के लिये हैं और उसको अपने ही
शरीर में बन्दी बना डालने के लिये हैं तथा इसके परिणामस्वरूप अनन्त
आधियों और व्याधियों को अपने में निमन्त्रण दे देने के लिये हैं। यह प्राणी
जब तक अपने को उस व्यापक जीवन तत्व से पृथक् समझता रहेगा, तब
तक दूसरों को भी उस व्यापक तत्व से पृथक् ही समझा करेगा। जब यह
प्राणी जीवनतत्व को अपने ही शरीर में सीमित समझ लेता है, तब उसका
दुष्परिणाम यह होता है कि वह दूसरों के जीवन से और परिणाम में तो
अपने ही व्यापक जीवन से, प्रेमरहित बर्ताव खटकके कर पड़ता है। फिर
तो वह जो कुछ भी करता है, उसका कर्तव्याकर्तव्य, उसकी प्रवृत्ति निवृत्ति,
उसका आचार आदि सभी कुछ शरीर के लाभालाभ पर निर्भर हो जाते हैं।
यों इस विचार के परिणामस्वरूप प्राणी में आसुरी प्रवृत्ति बढ़ने लगती
है। संसार में जो बड़ी मार धाड़ जब तब होती रहती हैं वे ऐसे ही लोगों
के कारण होती हैं। ऐसे लोग किसी भी वहम में फँस जाने पर फिर उल्टा
सीधा कुछ भी नहीं देखते हैं; यह तो किसी भी प्रकार अपना काम बना
लेना चाहते हैं भले ही उसके लिये दूसरों के कितने ही प्राणों और स्वार्थों