पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextवैसे इस व्यापक आत्मा को 'मैं' नहीं कह सकते । साथ ही हममें से कोई
भी अपने को इस से भिन्न कहने का उचित दावा भी नहीं कर सकता, तब
तो केवल इसका दर्शन कर करके प्रमुदित रहना आ जाता है और इसी प्रमोद
में 'मैं' का रहा सहा अस्तित्व भी सदा के लिये मिट जाता है। इस सत्य
ज्ञान रूप व्यापक जीवनतत्व की बात जब मन और बुद्धि की समझ में
आ जाती है और मन के समझे को जब अहंकार अपना लेता है और अहंकार
के अपनाय चित्त की अखण्ड स्मृति पर जब चढ़ जाते हैं, तब संसार के
सम्पूर्ण जीव और समस्त पदार्थ एकतत्व बन जाते हैं। परेऽव्यये सर्व एकी
भवन्ति की पहेली यहाँ आकर समझ में आने लगती है।
परन्तु व्यापक जीवनतत्व की बात समझ में आने में इस तत्व के
आधार से प्रतीत होने वाली विश्वरचना ही सब से बड़ा विघ्न है। जैसे
सांप रस्सी को दीखने नहीं देता और देखने वाले के तथा रस्सी के बीच
में आकर खड़ा हो जाता है, इसी प्रकार इस व्यापक ज्ञानरूप जीवनतत्व
के और हमारे बीच में आकर खड़ी हो गयी हुई विश्वरचना ने हमारा सम्पूर्ण
ध्यान अपनी ओर खींच कर, जो अतत्व है उसी का दर्शन हमें करा रक्खा है
और तत्व की प्रतीति को रोक दिया है। इस ग्रन्थ में उस तत्व के दर्शन के
विघ्नों को हटाने की विधि को बताते हुए तत्व दर्शन करने की विधि तत्वविवेक
नाम के प्रथम प्रकरण में वर्णित है। दूसरे तीसरे और चौथे प्रकरणों में
तत्व दर्शन के जो तीन प्रधान विघ्न हैं उनको ही तत्वदर्शन का सहायक
बना लेने की विधि पर विचार किया है। पांचवें महाकाव्यविवेक नाम
के प्रकरण में आगम किंवा अनुभवप्रधान हो जाने पर अनुभूति का जो-जो
व्यावहारिक रूप हो जाता है उसका वर्णन है। छठे चित्रदीप नाम के प्रकरण
में अपनी ही अज्ञानतूलिका से लिखे हुए जगच्चित्र को अपने सत्यान्वेषी
प्रयत्नों से मिटा कर स्वयं अकेला शेष रह जाने की विधि पर प्रकाश डाला
है। तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में बताया है कि व्यापक जीवनतत्व के स्वरूप