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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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( ङ )

थे । चतुर्थ आश्रम में इन का नाम 'विद्यारण्य' हो गया था । इनके पिता
का नाम 'मायण' और माता का नाम 'श्रीमती' था । 'सायण' और 'भोग-
नाथ' नामक दो छोटे भाई थे । 'सर्वज्ञविष्णु' तथा 'भारतीतीर्थ' नाम के
इनके दो गुरु थे । पूर्व आश्रम में राज्य के कार्य में परम प्रवीण रहते हुए
इन्होंने असाधारण योग्यता से उच्च कोटि के ग्रन्थ बनाकर वेद शास्त्रों की
प्रतिष्ठा भी बढ़ायी थी । फिर संसार से विरक्त होकर संन्यास दीक्षा लेकर
विद्यारण्य मुनि नाम से शृङ्गेरी मठ के शंकराचार्य बने थे ।
जिस कुटुम्ब में ये उत्पन्न हुए थे यह एक छोटा सा ब्राह्मणकुटुम्ब था ।
इस कुटुम्ब के सभी, बालक बड़े बुद्धिमान और कर्तृत्वशाली हुए । सायण
तो वेदभाष्यकार के नाते प्रसिद्ध ही हैं । भोगनाथ भी शीघ्र ही संन्यासी
हो गये थे । ये माधवाचार्य स्वयं पढ़ पढ़ाकर नयी अवस्था में ही तपस्या
के लिये वन चले गये थे । जब ये वन में तपस्या कर रहे थे तब हुक्क वुक्क
नाम के राजपुत्रों से भेंट होने के बाद सन् १३९१ तक इस महापुरुष का
सारा ही समय भारी राजनैतिक कारवार, अत्यन्त गहन और उपयुक्त ग्रन्थों
के निर्माण और शृंगेरी पीठ के स्वामी की हैसियत से धर्माधिकार चलाने में
बीता था। उन्होंने एक श्रेष्ठ कर्मयोगी की भाँति निष्काम बुद्धि से राज्यस्थापन
और धर्म रक्षण के कार्य करके आर्य संस्कृति को जीवित रक्खा था । वे
किस मनोभावना से अपना निष्काम कर्म करते थे यह इनके पंचदशी के---
"ज्ञानेनाचरितुं शक्य सम्यग् राज्यादि लौकिकम्"
"ज्ञानी लोग राज्य आदि लौकिक कामों को अच्छी तरह से चला सकते हैं ।
ज्ञानी का ज्ञान यदि परिष्कृत है सच्चा है तो राज्य के गहन कारबार भी
उसे दबा नहीं सकेंगे"इस वाक्य से बहुत ही स्पष्ट हो जाता है। इन्होंने उस
राज्य में किस प्रणाली से क्या क्या सुधार किये इसका ब्योरा अभी
तक भी इतिहासज्ञ लोग नहीं बता सके हैं।