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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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( ऊ )
का परिज्ञान होने पर जब मन में किसी भी प्रकार के सुख की इच्छा शेष
नहीं रह जाती तभी सच्चे सुख का आविर्भाव होता है। कूटस्थदीप में
चेतनाकार बनी हुई बुद्धियों की संधियों को भी और बुद्धियों के अभावों
को भी प्रकाशित करती रहने वाली सामान्य कूटस्थ चेतना का दर्शन कराया
गया है। जो लोग ब्रह्मतत्त्व का विचार नहीं कर सकते परन्तु उसके दर्शन
पर श्रद्धा रखते हैं उनके लिये उपासना किंवा योग की विधि बताने के
लिये ध्यानदीप नाम का प्रकरण है। नाटकदीप प्रकरण में कुतूहल वश
खेले गये इस जगन्नाटक के पटक्षेप करने की विधि पर विचार किया है।
पिछले पांचों प्रकरणों में अनेक द्वारों से आनन्द रूप का दर्शन कराते हुए
ब्रह्मतत्त्व का वर्णन किया है। यों इस ग्रन्थ में एक ही व्यापक जीवनतत्त्व
को पन्द्रह प्रकार से दिखाया गया है।
अब संक्षेप में ग्रन्थकार का थोड़ा सा परिचय देना भी आवश्यक
प्रतीत होता है—
पंचदशी के रचयिता श्री विद्यारण्य महामुनि अत्यन्त त्यागी अत्यन्त
बुद्धिमान व्यवहारचतुर कर्त्तव्यदक्ष और महाविभूतियुक्त पुरुष थे। इन्होंने
दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य की स्थापना युक राजा के द्वारा करायी थी
और उस साम्राज्य का संचालन भी ये स्वयं ही करते थे। ई० सन् १३३५
में हुकराय और बुकराय भाइयों ने सेना आदि जुटाकर इनकी सलाह से
विजयनगर राज्य की स्थापना की थी। उसके बाद विजयनगर
का साम्राज्य बढ़ने लगा और बड़े ठाट बाट से चलता रहा। ऐसे महान्
राज्य की स्थापना और संचालना जिस महापुरुष के द्वारा हुई थी उन
श्री विद्यारण्य मुनि का जन्म लगभग १३०० शालिवाहन में हुआ था।
कम से कम १३९१ तक ये जीवित रहे हैं। अपने सम्बन्ध में अपने ग्रन्थों
में इन्होंने जो लिखा है उससे मालूम होता है कि इनका पूर्वाश्रम का नाम
'माधवाचार्य' था, ये माधव मन्त्री के नाम से उसी समय प्रसिद्धि पा चुके