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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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८ पञ्चदशी
भोगों की तथा उनसे उत्पन्न होने वाले सुखों की इच्छा ही प्राणी
को नहीं होनी चाहिये। क्योंकि जिसको साक्षात् फल प्राप्त होचुका
हो उसको साधनोंकी इच्छा ही कैसी? जिसको नित्य तथा निरति-
शय आनन्द का लाभ हो चुका हो उसे क्षणिक साधनों की पराधी-
नता आदि दोषों से दूषित, विषयसुखों की स्पृहा ही क्यों होनी
चाहिये ? इस कारण आत्मा की परमानन्दरूपता युक्तिसंगत
बात नहीं है। इस आक्षेप का समाधान यों करना चाहिये कि भान
और अभान दोनों पक्षों के दोषों को देखकर यों मानना पड़ता
है कि आत्मा की यह परमानन्दरूपता प्रतीत होने पर भी प्रतीत
नहीं होती है। जभी तो प्राणिवर्ग दो विरुद्ध कार्य एक साथ
करते हैं—वे अपने आप से परम प्रेम भी करते हैं और उन्हें
विषयों की इच्छा भी बनी ही रहती है। वे आत्मा को 'मैं' इस
रूप में तो जानते हैं परन्तु उन्हें यह मालूम नहीं होता कि 'मैं'
परमानन्दरूप हूँ ।
अध्येतृवर्गमध्यस्थपुत्राध्ययनशब्दवत् ।
भानेऽप्यभानं भानस्य प्रतिबन्धेन युज्यते ॥ १२ ॥
बहुत से पढ़ने वालों के बीच में बैठे हुए पुत्र के पढ़ने की
आवाज को जैसे उसका पिता जानता भी है और नहीं भी
जानता। इसी प्रकार आनन्द का भान होजाने पर भी अभान
हुआ रहता है। प्रतिबन्ध के कारण भान होना रुक जाता है
और ऊपर की बात युक्त हो जाती है।
बहुत से पढ़नेवालों के बीच में बैठे हुए पुत्र के पढ़ने का
शब्द जैसे उसके पिता को सामान्यतया भासमान होने पर भी
विशेष रूप से भासमान नहीं होता 'कि यह मेरे पुत्र का शब्द