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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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तत्त्वविवेकप्रकरणम् ५
स्थाओं में एक ही ज्ञान बना रहता है, इसी प्रकार दूसरे दिन में
तथा अनेक प्रकार से बीते हुए तथा आगामी महीनों वर्षों युगों
और कल्पों तक में एक अभिन्न ज्ञान ही बना रहता है । ज्ञान के
विषय तो भिन्न भिन्न होते जाते हैं, परन्तु ज्ञान में भेद कभी नहीं
आता। दीपक के समान एक होने के कारण यह ज्ञान न तो उत्पन्न
होता है और न विनष्ट ही होता है । यदि इस ज्ञान के भी उत्पत्ति
और विनाश मानोगे, तो इन उत्पत्ति विनाशों को देखने वाला
[साक्षी] कौन होगा ? अपने उत्पत्ति विनाशों को स्वयं वह ज्ञान
ही देखे, यह बात भी संभव नहीं है । इन उत्पत्ति विनाशों को
ग्रहण करने वाला दूसरा कोई ज्ञान भी नहीं पाया जाता। इस
कारण इस ज्ञान को उदय अस्त से रहित तत्व माना जाता है ।
यह ज्ञान तो स्वयंप्रकाश है। स्वयंप्रकाश हो कर भासित होने
वाला यह ज्ञान ही, इस सकल जगत् का प्रकाश कर रहा है। इसी
कारण यह जगत् अन्धा होने से बच रहा है। यदि यह ज्ञान न
होता तो यह जगत् अन्धा होता।
इयमात्मा परानन्दः परप्रेमास्पदं यतः ।
मा न भूवं हि भूयासमिति प्रेमात्मनीक्ष्यते ॥८॥
(यह ज्ञान ही आत्मा है) और यह परमानन्द स्वरूप भी है ।
क्योंकि यह परमप्रेम का आस्पद है । "मैं न रहूँ ऐसा कभी न
हो किन्तु मैं सदा बना रहूँ" ऐसा प्रेम आत्मा से सभी करते हैं।
यह संवित् [ज्ञान] ही आत्मा है और यह परमानन्द स्वरूप
भी है क्योंकि यह परमप्रेम अथवा निरतिशय [सर्वाधिक] प्रेम
का विषय है । इसको सब से अधिक प्रेम किया जाता है । "मैं
कभी न रहूँ ऐसा कभी न हो किन्तु मैं सदा ही बना रहूँ" ऐसा