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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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( ञ )

उसी को व्यापक जगदात्मा की सेवा समझ कर करता है। सदा शुभ विचारों
में रत रहता है। अपने में कभी भी किसी अपूर्णता को आने नहीं देता।
अपने उदार विचारों के अनुकूल अपनी जीवनचर्या बनाकर रखता है।
घटघटवासी नारायण के दर्शन सब जीवों में करने के कारण सब के साथ
निष्कपट बर्ताव करता है। अपने उदात्त विचारों को कभी भी काम क्रोध
आदि विकारों से दबने नहीं देता। सत्य की रक्षा में सर्वात्मना तत्पर
रहता है। अपकारक पर क्रोध करके कर्त्तव्यभ्रष्ट नहीं हो जाता है। अपनी
जीवनयात्रा के उपकरणों से स्नेहपाश में बँध कर नहीं रहता। दिव्यता का
आह्वान करने वाले इत्यादि सभी गुण उसमें आ बसते हैं। जब उसे मालूम
हो जाता है कि ये सम्पूर्ण उद्योग इसी व्यापक जीवनतत्व को खोज
निकालने के लिये हैं। अब तो वह जीवन के प्रत्येक अनुभव में सत्य के
दर्शन करने लगता है। उसके जीवन की प्रत्येक घटना उसे सत्य और ज्ञान
का पवित्र सन्देश ला ला कर सुनाने वाली बन जाती है। जब कोई प्राणी
अपने यज्ञिय उद्योगों से, किंवा यज्ञमय जीवन से, अथवा व्यापक जगदात्मा
को सर्वसाक्षी मान कर दिये गये कर्मों से जीवनतत्व को खोज चुकता है,
तब उसके उद्योग समाप्त हो जाते हैं। फिर तो देश और काल के अनन्त मैदान
पर अखण्ड शासन करने वाला जीवन ही जीवन शेष रह जाता है। जीवन
के लिये फिर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहजाता। कर्तव्य तो जीवनतत्व के
अज्ञान को जीवित रखने के लिए ही होते हैं या फिर जीवनतत्व का दर्शन
कराने के लिए ही होते हैं। फिर इस अनन्त जीवन को मैं की छोटी चादर
उड़ाने वाला कोई नहीं रह जाता। यह सत्य और ज्ञान रूप व्यापक जीवन-
तत्व हम किसी से भी भिन्न नहीं है। परन्तु इसका हमारे साथ कोई ऐसा
सम्बन्ध भी नहीं है कि इसे हम 'मैं' या 'मेरा' कह सकें। जैसा यह हमको
अपना आत्मा मालूम है, ऐसे ही यह औरों को भी अपना आत्मा-स्वरूप
मालूम होता है। हममें से कोई एक जैसे इस शरीर को 'मैं' कह देते हैं